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    Home » साकची गुरुद्वारा विवाद: हाई कोर्ट के फैसले से उलझा मामला
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    साकची गुरुद्वारा विवाद: हाई कोर्ट के फैसले से उलझा मामला

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 25, 2026Updated:March 26, 2026No Comments4 Mins Read
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    साकची गुरुद्वारा विवाद
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    झारखंड हाई कोर्ट के आदेश के बाद ‘साकची गुरुद्वारा विवाद’ और उलझ गया है। अदालत ने पीड़ित पक्ष को सिविल कोर्ट जाने की सलाह दी है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

    राष्ट्र संवाद संवाददाता
    जमशेदपुर। झारखंड हाई कोर्ट के एक फैसले ने साकची गुरुद्वारा कमेटी के चुनाव प्रकरण को अब और उलझा दिया है। इस आदेश को साकची और सेंट्रल कमेटी दोनों ही अपने पक्ष में बता रहे हैं। यहां आलम यह है कि ना तो कोई हारा है ना कोई जीता है।
    झारखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद सेन ने अपने आदेश में लिखा है कि दोनों पक्ष अर्थात याचिकाकर्ता साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान सरदार निशान सिंह और प्रतिवादी सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान सरदार भगवान सिंह के अनुसार चुनाव हो चुके हैं। ऐसे में इस याचिका में निर्णय के लिए कुछ भी नहीं है।
    चुनाव से पीड़ित कोई भी व्यक्ति कानून के अनुसार उचित सिविल न्यायालय में जा सकता है।
    यहां बताना उचित होगा कि साकची गुरुद्वारा कमेटी ने चुनाव प्रक्रिया शुरू करते हुए सत्येंद्र सिंह रोमी को चुनाव कमेटी का संयोजक चुना था। एसडीओ धालभूम के समक्ष हरविंदर सिंह मंटू एवं अन्य द्वारा शिकायत की गई कि चुनाव संयोजक का चुना जाना और प्रक्रिया सही नहीं है और इसके बाद एसडीओ ने 28 मई 2025 को आदेश जारी किया था कि सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के निगरानी में चुनाव होंगे।
    निशान सिंह ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में सिविल रिट 2704 /2025 दाखिल किया। इसकी पहली सुनवाई में एसडीओ के आदेश पर रोक लगा दी गई और उसके उपरांत चुनाव संयोजक सतिंदर सिंह रोमी ने चुनावी प्रक्रिया पूरी की और निशान सिंह को प्रधान घोषित कर दिया।
    वहीं सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी चुनावी प्रक्रिया पूरी की ओर सरदार हरविंदर सिंह मंटू को प्रधान घोषित कर दिया है।
    साकची एवं केंद्रीय कमेटी ने इसी तथ्य को हाई कोर्ट में रखा। इसी के मद्देनजर हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि दोनों पक्ष के अनुसार चुनाव हो चुके हैं और ऐसे में जो पीड़ित व्यक्ति है कानून के अनुसार सिविल न्यायालय की शरण ले सकता है।
    यहां उल्लेखनीय है कि सरदार निशान सिंह की टीम गुरुद्वारा कमेटी के प्रबंधन में काबिज है तो स्वाभाविक रूप से पीड़ित सरदार हरविंदर सिंह मंटू हैं। अब ऐसे में देखना होगा कि सिख समाज आपस में बैठक कर इस मामले को सुलझाता है या मामले सुलझाने को सिविल कोर्ट की शरण में जाता है।
    यदि सिविल कोर्ट की शरण में जाते हैं तो अदालती कार्रवाई में कई साल लगना तय है।

    साकची गुरुद्वारा विवाद
     पार्टी की बजाए पंच बनें भगवान सिंह: कुलबिंदर

    जमशेदपुर। क़ौमी सिख मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता कुलबिंदर सिंह ने गुरुद्वारा कमेटी की राजनीति करने वालों को झारखंड हाई कोर्ट के आदेश से सबक लेने की सलाह दी है। अब आलम यह है कि झारखंड हाई कोर्ट ने भी मान लिया है कि साकची गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के दो प्रधान निर्वाचित हैं। दोनों की प्रक्रिया को ना तो सही माना गया है ना गलत ठहराया गया है। हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद सेन ने साफ कह दिया है कि जो पीड़ित पक्ष है वह सिविल कोर्ट की शरण ले सकता है।
    कुलबिंदर सिंह के अनुसार वे चाहते तो बारीडीह में भी यही होता? सोनारी में भी यही होगा और मानगो में भी यही होगा यदि कोई पक्ष झारखंड हाई कोर्ट की शरण ले लेता है?
    अधिवक्ता के अनुसार भगवान सिंह को गलत सलाह देने वाले लोग अगल-बगल बैठे हैं और वह अहंकारी बन गए हैं और इसलिए मनमाने फैसले ले रहे हैं।
    भगवान सिंह शायद समझे ही नहीं है कि वह सेंट्रल गुरुद्वारा कमेटी के प्रधान है और ऐसे में उनकी निष्पक्ष और न्याय पूर्ण भूमिका होनी चाहिए। लेकिन हर जगह वे पार्टी के तौर पर नजर आए हैं और ऐसे में उनके पास एक अच्छा अवसर है साकची के मामले में अच्छे पंच बने और न्याय पूर्ण सर्वमान्य फैसला लें।जिसे सरदार निशान सिंह और हरविंदर सिंह मंटू तथा साकची की संगत सहर्ष स्वीकार करें।

     

    साकची गुरुद्वारा विवाद: हाईकोर्ट के फैसले के बाद निशान सिंह पद पर बरकरार

    जमशेदपुर: साकची गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के चुनाव विवाद पर झारखंड हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रधान सरदार निशान सिंह अपने पद पर बरकरार रहेंगे। बुधवार को आयोजित प्रेस वार्ता में निशान सिंह ने इसे सत्य और संविधान की जीत बताया।
    वरीय अधिवक्ता केएम सिंह ने कहा कि विपक्ष द्वारा फ्रेश चुनाव को लेकर भ्रामक जानकारी फैलायी गई, जबकि हाईकोर्ट ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव पहले ही संपन्न हो चुके हैं और यदि कोई असंतुष्ट है तो वह सिविल न्यायालय जा सकता है।
    इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चल रहा विवाद समाप्त हो गया है।

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