लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर के मानगो थाना क्षेत्र के चर्चित सहारा सिटी सामूहिक दुष्कर्म मामले में अदालत ने सभी 21 आरोपियों को बरी कर दिया है। विशेष पॉक्सो अदालत ने साक्ष्य के अभाव में यह फैसला सुनाया। इस मामले में पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता के भाई गुड्डू गुप्ता, तत्कालीन डीएसपी अजय केरकेट्टा और तत्कालीन थाना प्रभारी इमदाद अंसारी समेत कई लोगों के नाम आरोपियों में शामिल थे।
सहारा सिटी सामूहिक दुष्कर्म मामले में अदालत का फैसला
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला 18 जनवरी 2019 को मानगो थाने में दर्ज कराया गया था। सहारा सिटी की एक महिला ने अपनी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया था। आरोपियों पर घटना का वीडियो बनाकर वायरल करने का आरोप भी लगाया गया था। मामले में शुरुआत में तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 25 वर्ष की सजा सुनाए जाने की जानकारी सामने आई थी। बाद में मामले में आरोपियों की संख्या बढ़ाकर 21 कर दी गई।
अदालती कार्यवाही के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता गौरव पाठक, प्रमोद सिंह बुंदेला और संजय मुखर्जी ने आरोपियों का पक्ष रखा। बचाव पक्ष की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने सभी 21 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
मामले में शाहिद और लंगड़ा मकसूद के अब भी फरार होने की बात सामने आई है। बताया गया है कि इन दोनों के मामले की सुनवाई अलग से हुई थी।
कानूनी प्रक्रिया और पॉक्सो एक्ट के तहत कार्यवाही
यह मामला यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था। विशेष पॉक्सो अदालतों की स्थापना नाबालिगों के साथ होने वाले यौन अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए की गई है। इस मामले में अभियोजन पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा, जिसका लाभ आरोपियों को मिला। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पॉक्सो मामलों में साक्ष्य का भार अभियोजन पक्ष पर होता है, और उचित संदेह से परे अपराध साबित करना आवश्यक होता है।
समाज पर प्रभाव और आगे की राह
इस फैसले से जमशेदपुर और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक चर्चा है। पीड़ित पक्ष के पास ऊपरी अदालत में अपील करने का विकल्प खुला है। झारखंड उच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी जा सकती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले में जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और निष्पक्ष जांच की मांग की है। अधिक जानकारी के लिए झारखंड उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।
इस मामले ने एक बार फिर आपराधिक न्याय प्रणाली में साक्ष्य संग्रहण और गवाहों की सुरक्षा की चुनौतियों को उजागर किया है। भविष्य में ऐसे मामलों में फोरेंसिक साक्ष्य और डिजिटल सबूत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी।
