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    Home » रिश्ता दूरी से नहीं, याद से चलता है
    मेहमान का पन्ना संपादकीय साहित्य

    रिश्ता दूरी से नहीं, याद से चलता है

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 20, 2026No Comments4 Mins Read
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    रिश्ता दूरी से नहीं, याद से चलता है
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    लेखक: इंद्र यादव

    रिश्ता दूरी से नहीं, याद से चलता है, यह बात जीवन के अनुभवों से साबित होती है। अक्सर हम देखते हैं कि जो लोग शारीरिक रूप से दूर होते हैं, वे मानसिक रूप से अधिक निकट होते हैं। मनोविज्ञान भी यही मानता है कि भावनात्मक जुड़ाव ही रिश्ते की असली नींव है।

    रिश्ता दूरी से नहीं, याद से चलता है: गहराई से समझ

    कुछ लोग हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे होते हैं, फोन तक नहीं उठाते, स्टेटस भी नहीं देखते, फिर भी दिमाग में घूमते रहते हैं जैसे कोई पुराना गाना जो भूलने का नाम ही नहीं लेता। और कुछ लोग रोज सामने बैठे होते हैं, चाय-पानी साथ में, बातें करते हैं, हँसते हैं, फिर भी दिल में कहीं खालीपन सा लगता है। जैसे कोई किराए का मकान हो – रहते तो हैं, पर अपना नहीं लगता।

    ये दुनिया का सबसे बड़ा धोखा है यार। दूरी और नज़दीकी का। लोग सोचते हैं कि पास रहोगे तो रिश्ता मज़बूत हो जाएगा। अरे भूल जा! रिश्ता दिल से चलता है, किलोमीटर से नहीं। कोई शख्स शहर छोड़कर विदेश चला जाए, सालों बाद भी याद आए तो समझ ले वो तेरा अपना था। और जो रोज तेरे साथ कुर्सी पर बैठा हो, लेकिन बात करते वक्त उसकी आँखों में वो पुरानी गर्माहट न हो, तो वो सिर्फ उपस्थिति है, उपस्थिति नहीं।

    देख, जिंदगी में दो तरह के लोग आते हैं। एक वो जो दूर होकर भी यादों में ठहर जाते हैं – जैसे पुराना दोस्त जो कॉलेज छोड़ने के बाद कभी नहीं मिला, पर जब भी अकेला हो तो वही चेहरा याद आ जाता है। वो जिसने एक बार सही वक्त पर सही बात कही थी, या चुपचाप साथ दिया था। दूसरे वो जो पास होते हुए भी पराए लगते हैं – परिवार का कोई सदस्य जो रोज घर में रहता है, पर बातचीत सिर्फ जरूरत की होती है। या वो दोस्त जो पार्टी में सबसे आगे खड़ा रहता है, पर जब तेरी हालत खराब हो तो फोन काट देता है।

    ये कैसी विडंबना है भाई! पास वाले को अपना बनाने की कोशिश में हम थक जाते हैं, और दूर वाले को भूलने की कोशिश में भी थक जाते हैं। दिल का गणित बड़ा अजीब है। वो हिसाब नहीं लगाता कि कौन कितना पास है। वो सिर्फ ये देखता है कि किसकी याद आने पर सीने में हल्का सा दर्द होता है, या मुस्कान आती है।

    लोग कहते हैं “दूर के ढोल सुहावने”। लेकिन सच तो ये है कि कुछ दूर के ढोल ही असली होते हैं। जो पास बैठकर ढोल पीटते हैं, उनका शोर सिर्फ शोर होता है। असली धुन तो वो है जो चुपचाप यादों में बजती रहती है।

    रिश्तों की असली पहचान

    वास्तव में, रिश्तों की मजबूती इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितनी बार मिलते हैं, बल्कि इस पर कि आप एक-दूसरे को कितना याद करते हैं और कितना समझते हैं। जो रिश्ता दिल से जुड़ा हो, वह समय और दूरी की हर सीमा को पार कर जाता है।

    निष्कर्ष

    तो अब क्या करें! पास वाले को जबरदस्ती अपना बनाने की कोशिश मत कर। जो अपना है, वो दूर होकर भी याद आएगा। और जो नहीं है, वो सामने बैठा रहे तो भी पराया ही रहेगा। जिंदगी छोटी है यार। फालतू के लोगों को दिल में जगह देने से बेहतर है कि उन यादों को संजोए रख जो असली हैं – भले ही वो यादें दूर बैठे किसी की हों। अंत में, हमें यह समझना चाहिए कि सच्चे रिश्ते भौतिक दूरी के मोहताज नहीं होते। वे दिल की गहराइयों में बसते हैं और यादों की डोर से बंधे रहते हैं। इसलिए उन लोगों को महत्व दें जो आपकी यादों में बसते हैं, चाहे वे कितने भी दूर हों।

    जिंदगी दिल की बात दूरी यादें रिश्ते
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