
लेखक: देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले की नीयत पर हमला करना राजनीतिक संस्कृति बनती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की खुली बहस की चुनौती और उसके जवाब में भाजपा नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं इसी राजनीतिक मानसिकता का उदाहरण हैं। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को किसी भी मंच पर बहस करने की चुनौती दी है। यहां तक कि उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को बहस का निर्णायक बनाने की बात कहकर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
सवाल यह है कि क्या आरोपों का जवाब आरोपों से देना ही राजनीति का नया चरित्र बन गया है? यदि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें भी प्रमाण और तथ्यों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। लेकिन यदि प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ दल विपक्ष पर विदेशी मदद लेकर देश को अस्थिर करने जैसे गंभीर आरोप लगाते हैं, तो उन आरोपों का आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए। लोकतंत्र में किसी को भी केवल राजनीतिक विरोध के कारण देशद्रोही ठहराने की छूट नहीं दी जा सकती।
भाजपा नेताओं को कांग्रेस के आपातकाल की याद दिलाने का पूरा अधिकार है, क्योंकि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय था। लेकिन इतिहास की गलतियां वर्तमान की जवाबदेही से बचने का कवच नहीं बन सकतीं। उसी तरह राहुल गांधी को भी यह समझना होगा कि केवल सरकार को कठघरे में खड़ा करने से विपक्ष की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। विपक्ष का काम सवाल पूछना ही नहीं, बल्कि जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना भी है।
आज देश को मोदी और राहुल के बीच राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन से अधिक जरूरत गंभीर राष्ट्रीय बहस की है। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक असमानता, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते, उद्योगपतियों से जुड़े विवाद और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे विषय किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे देश के मुद्दे हैं। इन पर संसद में भी चर्चा होनी चाहिए और जनता के सामने भी तथ्य रखे जाने चाहिए।
मोहन भागवत को जज बनाने का प्रस्ताव भी अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है, लेकिन लोकतंत्र में किसी राजनीतिक या सामाजिक संगठन के प्रमुख को निर्णायक बनाने से अधिक महत्वपूर्ण है निष्पक्ष तथ्यों और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति विश्वास। बहस का मंच कोई भी हो, उसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता सर्वोपरि होनी चाहिए।
बहरहाल प्रधानमंत्री को सवालों से बचना नहीं चाहिए और विपक्ष को भी आरोपों की राजनीति से ऊपर उठना चाहिए। सत्ता में बैठा व्यक्ति जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता और विपक्ष में बैठा व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि असहमति को सम्मान मिले, आरोपों की जांच हो और तथ्यों के आधार पर जवाब दिए जाएं।
आखिर प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की राजनीतिक प्रतिष्ठा से कहीं बड़ा देश का लोकतंत्र है। जनता को नेताओं की जुबानी जंग नहीं, अपने जीवन से जुड़े सवालों के जवाब चाहिए।
सवाल सीधा है मोदी हों या राहुल, क्या दोनों देश के सामने बैठकर बेरोजगारी, महंगाई, अर्थव्यवस्था, चुनावी पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों पर खुली बहस करने का साहस दिखाएंगे? या लोकतंत्र के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?

