
लेखक: मनीषा शर्मा
दीपावली — प्रकाश का पर्व और देवी काली की आराधना
दीपावली भारतवर्ष के अत्यंत जनप्रिय, आनंदमय और पवित्र उत्सवों में से एक है। इसे प्रकाश के पर्व के रूप में भी जाना जाता है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश की, असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस उत्सव के तात्पर्य और इतिहास की बात करें तो, हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास काटकर और रावण का वध कर अपनी पत्नी सीता एवं भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या नगरी लौटे थे। उनके लौटने की खुशी में अयोध्यावासियों ने घर-घर में मिट्टी के दीये जलाकर नगर को रोशन किया था। तभी से प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा, इस दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी तथा बुद्धि के देवता गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा विश्वास है कि जिन लोगों के घर साफ-सुथरे और जगमगाते रहते हैं, उन घरों में देवी लक्ष्मी का आगमन होता है। दीपावली केवल एक दिन का पर्व नहीं है, बल्कि यह कुछ दिनों तक चलने वाले आनंद का एक क्रम है।
धनतेरस और मुख्य दीपावली का उत्सव
इस दिन नए बर्तन, सोना, चांदी या मूल्यवान वस्तुएं खरीदना शुभ माना जाता है। मुख्य दीपावली अमावस्या की रात्रि को काली पूजा और माता लक्ष्मी की पूजा धूमधाम से संपन्न होती है। घरेलू साफ-सफाई और दीप प्रज्वलन: पर्व से कुछ दिन पहले ही लोग अपने घर-द्वार को साफ-सुथरा कर रंगों से सजाते हैं। संध्या होते ही मिट्टी के दीयों, मोमबत्तियों और बिजली की लड़ियों से पूरे घर को रोशन कर दिया जाता है। दीपावली और माता काली की पूजा का गहरा आध्यात्मिक महत्व भारत के विभिन्न प्रांतों में, विशेष रूप से असम, बंगाल और अन्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में दीपावली की अमावस्या तिथि जगत जननी महाकाली की पूजा का पवित्र लग्न होती है। बाहरी तौर पर भले ही दीपावली प्रकाश का पर्व हो, किंतु माँ काली की आराधना हमें एक गहरे आध्यात्मिक सत्य से अवगत कराती है। अमावस्या की अंधेरी रात में माँ काली की पूजा करने का एक विशेष दार्शनिक महत्व है। माँ काली काल या समय की नियंताओं हैं और हमारे भीतर के सभी अज्ञान, भय, अहंकार तथा खंड-विखंडित कामनाओं का नाश करने वाली शक्ति हैं। जिस प्रकार बाहरी अंधकार को दीये के प्रकाश से दूर किया जाता है, उसी प्रकार माँ काली की कृपा से हमारे भीतर का आंतरिक अंधकार भी दूर होता है।
माता काली की आराधना और आंतरिक अंधकार का नाश
माँ काली का भयानक मातृसुलभ रूप हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन की पुरानी, जीर्ण-शीर्ण और विनाशकारी वृत्तियों को विदा किए बिना नई चेतना या सत्य का उन्मेष नहीं हो सकता। उनके गले की मुंडमाला और हाथ में कटी तलवार हमारे अहंकार और संसार के मोह को काट डालने की प्रेरणा देती है। इसीलिए, दीपावली की रात माँ काली के चरणों में प्रणाम कर भक्तगण अपने भीतर के पशुत्व की बलि देकर एक पवित्र और प्रबुद्ध प्राणशक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। दीपावली परिवार और मित्रों के साथ मिलकर आनंद उठाने का समय है। इस दिन लोग एक-दूसरे को उपहार और मिठाइयाँ बाँटते हैं। छोटे-बड़े सभी आतिशबाजी (पटाखे, फुलझड़ी आदि) जलाकर आनंदित होते हैं। (यद्यपि वर्तमान में प्रदूषण नियंत्रण के लिए पर्यावरण-अनुकूल या कम आवाज़ वाले पटाखों के प्रयोग पर विशेष बल दिया जाता है।) यह पर्व धर्म-वर्ण के भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों के बीच प्रेम, सद्भाव और एकता का संदेश लेकर आता है। संक्षेप में कहें तो, दीपावली केवल दीये या लाइट जलाने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारे अंतःकरण के अंधकार, द्वेष, अहंकार और क्षुद्रता को दूर कर ज्ञान और प्रेम का प्रकाश फैलाने का एक पवित्र समय है। यह पर्व हमारे समाज में शांति, समृद्धि और आनंद लेकर आए—यही हमारी कामना है।

