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    Home » लोकतंत्र में गरीबों की भूमिका
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    लोकतंत्र में गरीबों की भूमिका

    Devanand SinghBy Devanand SinghDecember 14, 2019Updated:December 17, 2019No Comments4 Mins Read
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    लोकतंत्र में गरीबों की भूमिका
    देवानंद सिंह
    झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 के तीसरे चरण का चुनाव संपन्न हो गया है। तीसरे चरण में 17 विधानसभा सीटों के लिए मतदान हुआ था और मतदान का औसत 62.35 प्रतिशत था, जो 2014 के चुनावों से लगभग 1.67 फीसदी कम था। 2014 में 64.02 फीसदी मतदान हुआ था। तीसरे चरण के चुनाव के लिए हुए मतदान का जो सबसे खास पहलू था, वह यह था कि शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान का औसत कहीं अधिक था। यानि जो लोग सुविधा संपन्न हैं, वे मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार को प्रयोग करने से कतराए, जबकि जो ग्रामीण क्षेत्रों में तमाम अभावों में जीने वाले लोग हैं, वो खुले तौर पर अपने मतदाधिकार का प्रयोग करने के लिए मतदान केंद्रों तक पहुंचे। वैसे यह झारखंड विधानसभा चुनावों की बात ही नहीं है, बल्कि लोकसभा व अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तस्वीर भी कुछ यूहीं रहती है।
    यह लोकतंत्र की बड़ी बिड़वंना है, क्योंकि जो शख्स इस पर्व में खुले तौर पर बिना डरे शामिल होता है, उसकी हालत आज भी वैसी ही है। न तो वह किसी प्रकार की सुविधा भोगने की स्थिति में है और न ही वह शैक्षिक तौर पर अपनी स्थिति सुधार पाया है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि सरकारें उनके जीवन स्तर को सुधारने की तरफ कोई भी ध्यान नहीं देती हैं। उनके नाम पर योजनाएं व परियोजनाएं तो निश्चित तौर पर बनाईं जाती हैं, लेकिन उस पर अमल कितना होता है, यह सबके सामने है। केंद्र व राज्य में सरकारें भले ही किसी भी पार्टी ही रही हों, लेकिन हमेशा से ही गरीबों के साथ अन्याय होता रहा है। यही वजह है कि देश का अमीर तो अमीर हो रहा है और गरीब गरीब होता जा रहा है।
    झारखंड चुनाव की बात करें तो प्रदेश के अधिकांश जिले नक्सल प्रभावित हैं। खासकर, ग्रामीण क्षेत्र। शहरी क्षेत्रों में नक्सलियों का उतना खतरा नहीं है। फिर भी, ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता बेखौफ, बिना डरे अपना वोट डालने के लिए घरों से बाहर निकल रहे हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोग ग्रामीणों क्षेत्र के मतदाताओं के मुकाबले कम बाहर निकले। विधानसभा के लिए हुए तीसरे चरण के चुनाव के तहत राजधानी रांची में हुआ सबसे कम मतदान इस बात का बड़ा उदाहरण है। जहां महज 49.1० फीसदी ही मतदान हुआ, जबकि किसी भी प्रदेश व देश की राजधानी अति सुरक्षित जोन में आती है। चाहे वह सुरक्षा के लिहाज से हो या फिर संपन्नता के लिहाज से। इसके बाद भी अगर सुविधा संपन्न लोग लोकतंत्र के पर्व में शामिल नहीं होते हैं तो यह बात चितिंत अवश्य करती है, क्योंकि सरकारें भी ऐसे ही लोगों के लिए काम करती हैं, जबकि गरीबों को सिर्फ मोहरा बनाया जाता है। राज्य में शुरूआती दो चरणों में भी यही स्थिति रही और चुनाव के आगामी दो चरण और बचे हैं, उम्मीद है कि ग्रामीणों क्षेत्रों के मतदाता शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं के मुकाबले अधिक संख्या में मतदान करने के लिए घरों से बाहर निकलेंगे।
    काश, इस बात को हमारे राजनेता समझते तो आज देश की तस्वीर कुछ अलग होती। राजनेता अमीरों की टोली के बीच में राजनीति नहीं कर पाते हैं, लेकिन गरीबों की टोली में उनकी राजनीति यूं चलती है कि वह धर्म-जाति, सम्प्रदाय व गरीबी हटाने के नाम खूब वोट बटोर लेता है, इससे वह तो चुनाव जीत जाता है, लेकिन गरीब लोग धर्म-जाति व सम्प्रदाय के नाम पर मारकाट पर उतर आते हैं, उनके बीच तनाव की खाई गहरी बनती जाती है। यही हाल गरीबी हटाने के संबंध में भी है। देश में आजादी के बाद से ही गरीबी हटाने के नारे दिए जाते रहे हैं, लेकिन क्या देश से गरीबी हट गई है। दशकों बाद भी देश से गरीबी हटाने की बात की जा रही है। अगर, सही मायनों में राजनीतिक पार्टियां गरीबी हटाने को लेकर गंभीर होती तो निश्चित ही भारत में आज तक गरीबी का ग्रॉफ समा’ हो गया होता।

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