राष्ट्र संवाद नजरिया:डॉक्टर जब मौत के औजार थाम ले, तब समाज को अपने नैतिक मूल्यों का पुनर्जन्म करना पड़ता है
लाल किले के साए में धमाका, जब डॉक्टर बने मौत के सौदागर
देवानंद सिंह
दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के पास सोमवार की शाम हुआ आत्मघाती बम धमाका देश की राजधानी को झकझोर गया। अब तक 13 लोगों की मौत और 21 से अधिक घायल होने की पुष्टि हो चुकी है। यह सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं, बल्कि उस विश्वास पर हमला है, जो समाज ने शिक्षा, पेशे और नैतिकता के प्रतीकों पर किया था।
धमाके के पीछे जिस डॉ. उमर उन नबी नाम का खुलासा हुआ है, वह हमारे दौर की सबसे खतरनाक सच्चाई उजागर करता है। आतंकवाद अब सीमाओं या वर्दियों तक सीमित नहीं रहा। एक शिक्षित, डॉक्टर, जिसने मानव जीवन बचाने की शपथ ली थी, वही जीवन लेने का औजार बन कर टेरर लैब चलाने लगे तो आत्म मंथन करने की जरूरत आन पड़ती है
जांच में सामने आया है कि डॉ. उमर का संबंध हरियाणा के फरीदाबाद स्थित एक आतंकी मॉड्यूल से था, जहां से 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट बरामद किया गया, इतना विस्फोटक कि पूरी दिल्ली को तबाह कर सकता था। इस नेटवर्क में और भी डॉक्टर थे, जिनमें डॉ. मुज़म्मिल, डॉ. अदील अहमद डार और डॉ. शाहीन शामिल थे, जिन्हें हाल ही में पुलिस ने गिरफ्तार किया है। यह कोई साधारण संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है कि आतंक की नई ‘इंटेलेक्चुअल फ्रंट’ तैयार करने की कोशिश।
अल फलाह यूनिवर्सिटी को एक ‘कवर’ के रूप में इस्तेमाल किया गया। आतंकियों ने चिकित्सा और शिक्षा संस्थानों की आड़ में घृणा और विनाश की प्रयोगशाला खड़ी कर ली। सवाल यह है कि ऐसे तंत्र को पनपने का अवसर कैसे मिला? क्या हमारी खुफिया एजेंसियों के पास ऐसे स्लीपर सेल की पहचान करने की पर्याप्त व्यवस्था है?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों के साथ बैठक की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया है कि जो भी इस षड्यंत्र में शामिल हैं, उन्हें किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। यह सख्त संदेश जरूरी है, पर उतना ही जरूरी यह भी है कि हमारे सुरक्षा ढांचे में जो छेद हैं, उन्हें जल्द भरा जाए।
यह हमला हमें याद दिलाता है कि आतंकवाद का चेहरा बदल चुका है। अब यह पढ़े-लिखे, प्रतिष्ठित चेहरों के पीछे छिपा ज़हर है, जो विचारों की चरमपंथी खेती से जन्म लेता है। इससे निपटने के लिए सिर्फ बंदूक या कानून नहीं, बल्कि विचार और विवेक की लड़ाई भी जरूरी है।
आज जब देश झारखंड से लेकर जम्मू तक भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और जनजातीय गौरव दिवस मना रहा है, यह घटना हमें चेतावनी देती है कि स्वतंत्रता की सबसे बड़ी रक्षा दीवार राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव है।
इस हादसे में खोए गए निर्दोष जीवनों की पीड़ा को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता, लेकिन इस त्रासदी से सबक लिया जाना चाहिए कि जब डॉक्टर मौत के औजार थाम ले, तब समाज को अपने नैतिक मूल्यों का पुनर्जन्म करना पड़ता है।
देश अब जवाब मांग रहा है, न सिर्फ आतंकियों से, बल्कि उस व्यवस्था से भी, जो ऐसे राक्षसी विचारों को जन्म लेने देती है।

