राष्ट्र संवाद नजरिया : क्या योगी के गढ़ यूपी में केजरीवाल के काम आ पाएगा दिल्ली मॉडल ?
देवानंद सिंह
अपनी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी समीकरणों को साधने का राजनीतिक पार्टियों द्वारा प्रयास शुरू हो गया है। राज्य में मुख्य रूप से टक्कर बीजेपी और सपा की दिख रही है। पर तैयारियों में आम आदमी पार्टी भी जुट गई है। भले ही, चुनावों को लेकर कांग्रेस और
बसपा में बहुत ज्यादा हलचल नहीं दिखाई दे रही हो, लेकिन आम आदमी पार्टी योगी के गढ़ में ताल ठोंकने को लेकर काफी उत्साहित दिख रही है और पार्टी की तरफ से गत दिनों में नोएडा में आयोजित की गई तिरंगा यात्रा के दौरान यूपी की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान भी किया जा चुका है। इससे पहले लखनऊ में पार्टी ‘तिरंगा संकल्प यात्रा’ निकाल चुकी है और 14 सितंबर को इस यात्रा के राम जन्म भूमि अयोध्या में भी निकाले जाने की तैयारी हो रही है। इस यात्रा के जरिए पार्टी बीजेपी के खिलाफ हुंकार भर रही है। प्रदेश के मुख्य शहरों में तिरंगा यात्रा निकालने के अलावा पार्टी ने सभी 75 जिलों में सदस्य बनाए जाने का अभियान भी चलाया हुआ है। एक करोड़ सदस्य बनाए जाने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रचंड बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी के अलावा राज्य में तीन बड़ी पार्टियों, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के रहते आम आदमी पार्टी कितना कमाल कर पाएगी ? राज्य में भी छोटी पार्टियां हैं, जिनका अपना जनाधार है। आप सभी को याद होगा कि पिछले दिनों ही उत्तर प्रदेश में ज़िला पंचायत सदस्य के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 3,000 से ज़्यादा उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया था। पार्टी ने बाकायदा उम्मीदवारों की सूची जारी की और नेतृत्व ने दावा किया कि 85 से ज़्यादा आम आदमी पार्टी समर्थित प्रत्याशी ज़िला पंचायत सदस्य चुन कर आए हैं और पार्टी के नाम पर कुल 40 लाख वोट मिले हैं।
पार्टी ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े ज़िले लखीमपुर खीरी से पार्टी समर्थित छह प्रत्याशी विजयी हुए हैं। आम आदमी पार्टी के समर्थन से जीतने वाले प्रत्याशियों का सोशल मीडिया पर कार्यकर्ताओं ने प्रचार भी किया। इस पोस्ट में लखीमपुर के देवकली गांव के यासीन मोहम्मद नाम का शख्स भी नजर आया जो 2500 हजार वोटों से चुनाव जीते हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते हैं और यासीन मोहम्मद ने भी यह चुनाव निर्दलीय लड़ा और जहां तक पार्टी से जुड़ाव का सवाल है, उसमें यही बात सामने आई कि वह समाजवादी पार्टी के सदस्य हैं। इस परिस्थिति में आम आदमी पार्टी के दावे पर हैरानी जरूर होती है। क्योंकि एक ही शख़्स अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से कैसे ताल्लुक़ रख सकता है। आम आदमी पार्टी का दावा कितना सच है, यह तो वही बता सकती है, लेकिन वह बीजेपी को घेरने में बिलकुल भी पीछे नहीं है। पार्टी ने
जून महीने में राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण से जुड़ी ज़मीन ख़रीद में मंदिर ट्रस्ट के घोटाले की बात भी उठाई थी, बाकायदा इसी मुद्दे को उठाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में दस्तक दी थी।
पार्टी ने राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने के लिए तहरीर भी दी, लेकिन कोई एफ़आईआर दर्ज़ नहीं हुई। पार्टी के नेता संजय सिंह ने ट्वीट में दावा किया था कि मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के नाम पर इतना बड़ा घोटाला सुनकर आपके पैरों के नीचे ज़मीन खिसक जाएगी। ये मुद्दा गरमाया और इसके साथ आम आदमी पार्टी भी सुर्ख़ियों में कई दिनों तक दिखी। ऐसा लगने लगा था कि राम मंदिर के निर्माण में भ्रष्टाचार आम आदमी पार्टी के लिए आस्था से जुड़े आंदोलन का रूप लेगा, लेकिन यह आंदोलन सड़कों पर नहीं उतर पाया और सिर्फ़ मीडिया और सोशल मीडिया पर ही दिख पाया। इस घोटाले का मुद्दा समाजवादी पार्टी ने भी उठाया, लेकिन कुछ दिनों के बाद उसने भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली थी। इसके बाद
तीन जुलाई को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह के बीच ‘शिष्टाचार भेंट’ भी हुई, तब अटकलें लगने लगीं थी कि सपा-आप का गठबंधन होने जा रहा है, लेकिन यह मुद्दा भी बीच में ही अटक गया। इस मुलाक़ात के ठीक दो दिन बाद सीबीआई ने प्रदेश के 13 ज़िलों में 40 ठिकानों पर व्यापक छापेमारी की और 1,600 करोड़ के गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट में अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ऐसे में, उस वक्त सवाल उठा कि क्या भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से खड़ी हुई आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सपा के साथ गठबंधन करेगी? फिलहाल, गठबंधन को लेकर क्या तस्वीर उभरती है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन आम आदमी पार्टी ने जिस तरह सभी 403 सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करने की बात की है, उससे तो यही लगता है कि वह खुद को छोटे दल के खांचे में फ़िट नहीं मान रही है।
2022 में उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। उत्तराखंड और पंजाब में अरविन्द केजरीवाल खुद सामने आ रहे हैं।
लेकिन अब तक केजरीवाल उत्तर प्रदेश नहीं आए हैं। ये भी है कि पंजाब, उत्तराखंड और गोवा जैसे छोटे राज्यों में पार्टी को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है तो केजरीवाल उन राज्यों के चुनावी दौरे पर हैं, पर योगी के गढ़ यूपी में उन्होंने अभी तक इस तरह का जोखिम नहीं उठाया है। इससे भी साफ होता है कि अन्य राज्यों के मुकाबले कहीं न कहीं वह यूपी में अच्छे प्रदर्शन को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। आपको याद होगा कि 2014 में केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बनारस से चुनाव लड़ कर 3.7 लाख वोटों से हार चुके हैं, हालांकि केजरीवाल को भी दो लाख वोट मिले थे। उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोग कहते हैं कि “यूपी बहुत बड़ा राज्य है और यहां आम आदमी पार्टी के पास दिल्ली के स्तर का कोई संगठन और मिशन भी नहीं है। काम करने का तरीक़ा बहुत शहरी है और उत्तर प्रदेश एक बड़ा ग्रामीण राज्य है, इसीलिए दिल्ली का मॉडल यूपी में सफल नहीं हो सकता है। ऐसे में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आम आदमी पार्टी अपने ही बल पर बीजेपी को टक्कर देने के लिए चुनावी मैदान में उतरेगी या फिर सपा के साथ हाथ मिलाएगी।