पत्रकारों की गरिमा पर हमला, सत्ता और विपक्ष दोनों जवाब दें!
*महिला पत्रकारों से कथित दुर्व्यवहार पर राजनीति नहीं, न्याय और पत्रकार बिरादरी की एकजुटता जरूरी*
देवानंद सिंह
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन जब इसी स्तंभ के प्रतिनिधियों की सुरक्षा और सम्मान पर सवाल उठने लगें, तो यह केवल पत्रकारों का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मुद्दा बन जाता है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कवरेज के दौरान तीन महिला पत्रकारों द्वारा पुलिसकर्मियों पर लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न के आरोप बेहद गंभीर हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
कांग्रेस ने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को घेरा है। सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा केवल सत्ता को घेरने का राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए। आज विपक्ष सवाल पूछ रहा है, कल उसे भी अपने शासन वाले राज्यों में पत्रकारों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर इसी गंभीरता से जवाब देना होगा। पत्रकारों की गरिमा सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक सुविधा से तय नहीं हो सकती।
गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस पर लगे आरोपों के संदर्भ में गृह मंत्री की जवाबदेही बनती है। शिकायतों पर निष्पक्ष जांच, उचित कानूनी कार्रवाई और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाना जरूरी है। वर्दी कानून से ऊपर नहीं हो सकती। साथ ही, आरोपों को बिना जांच के अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय कानून के अनुसार निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल पत्रकार बिरादरी की एकजुटता का है। यदि किसी महिला पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार पर पत्रकार राजनीतिक विचारधारा, मीडिया संस्थान या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर प्रतिक्रिया देंगे, तो पत्रकारिता की सामूहिक ताकत कमजोर होगी। आज दिल्ली में किसी महिला पत्रकार के साथ ऐसा होने का आरोप है, कल देश के किसी दूसरे हिस्से में किसी भी पत्रकार को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए देशभर के पत्रकार संगठनों, प्रेस क्लबों, संपादकों और मीडिया संस्थानों को एकजुट होकर निष्पक्ष जांच, पत्रकारों की सुरक्षा और जवाबदेही की मांग करनी चाहिए। पत्रकार की पहचान उसके सवालों और पेशे से होनी चाहिए, न कि उसकी राजनीतिक विचारधारा से।
महिला आरक्षण, महिला सुरक्षा और महिला सम्मान पर भाषण देने वाले राजनीतिक दलों को अपने आचरण से भी उदाहरण पेश करना होगा। महिलाओं का सम्मान केवल नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार और न्याय सुनिश्चित करने से स्थापित होता है।
सवाल सीधा है अगर सुरक्षा देने वाली व्यवस्था पर ही उत्पीड़न के आरोप लगें, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? सत्ता पक्ष को जवाब देना होगा, विपक्ष को दोहरे मापदंड छोड़ने होंगे और पत्रकारों को अपनी स्वतंत्रता तथा गरिमा की रक्षा के लिए एकजुट होना होगा।
याद रखिए, पत्रकारिता किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। पत्रकार न सत्ता का गुलाम है, न विपक्ष का प्रचारक। उसका दायित्व जनता के प्रति है। यदि पत्रकारों की आवाज दबेगी, तो लोकतंत्र में सवाल पूछने की ताकत कमजोर होगी। इसलिए यह लड़ाई किसी दल के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता, सम्मान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई है।

