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    Home » राजनीति में विरोध हो, चरित्र हनन नहीं: लोकतंत्र की मर्यादा पर गंभीर सवाल
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    राजनीति में विरोध हो, चरित्र हनन नहीं: लोकतंत्र की मर्यादा पर गंभीर सवाल

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 15, 2026No Comments4 Mins Read
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    चरित्र हनन
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    लेखक: देवानंद सिंह

    लोकतंत्र की आत्मा मतभेद में बसती है, मनभेद में नहीं। राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच वैचारिक संघर्ष लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन जब यह संघर्ष व्यक्तिगत अपमान, चरित्र हनन और अशोभनीय हरकतों में बदलने लगे, तब यह केवल किसी एक नेता का नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान बन जाता है।

    जमशेदपुर की राजनीति में बढ़ती चिंता

    हाल के दिनों में जमशेदपुर की राजनीति में जो घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने यही चिंता बढ़ा दी है। एक ओर विधायक सरयू राय की तस्वीर पर थूकने और उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का मामला सामने आया। यदि यह कृत्य वास्तव में कांग्रेस के किसी समर्थक ने किया है, तो इसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। विचारों से असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी व्यक्ति का इस प्रकार सार्वजनिक अपमान करना राजनीतिक संस्कृति को शर्मसार करता है। ऐसे मामलों में संबंधित दल को बिना किसी संकोच के कार्रवाई करनी चाहिए।

    लेकिन इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के खिलाफ विधायक सरयू राय के कुछ समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल किया गया, जिसमें व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें निशाना बनाने का प्रयास किया गया। यह भी किसी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक विरोध का अर्थ किसी व्यक्ति के चरित्र पर प्रहार करना नहीं होता। लोकतंत्र में आरोप तथ्यों और मुद्दों के आधार पर लगने चाहिए, न कि किसी की छवि धूमिल करने या व्यक्तिगत सम्मान को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से।

    चरित्र हनन नहीं, मुद्दों पर हो राजनीति

    यह याद रखना होगा कि बन्ना गुप्ता और सरयू राय राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, व्यक्तिगत शत्रु नहीं। दोनों अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और जनता के बीच अपने-अपने मुद्दों के साथ जाते हैं। चुनाव में मुकाबला होना, एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना करना और सरकार या विपक्ष पर सवाल उठाना पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। लेकिन समर्थकों द्वारा मर्यादा की सीमाएं लांघना किसी भी नेता की गरिमा के अनुरूप नहीं है।

    आज सोशल मीडिया ने राजनीति को नई ताकत दी है, लेकिन इसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आई है। दुर्भाग्य से कई बार समर्थक लाइक, शेयर और वायरल होने की होड़ में ऐसी सामग्री प्रसारित कर देते हैं, जो समाज में कटुता बढ़ाती है। तस्वीरों का अपमान हो या किसी नेता के खिलाफ व्यक्तिगत वीडियो बनाकर प्रसारित करना—दोनों ही लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए नुकसानदेह हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए भारत निर्वाचन आयोग जैसे संस्थान निरंतर प्रयासरत हैं।

    राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली और पानी होने चाहिए। जनता नेताओं से इन सवालों के जवाब चाहती है, न कि यह देखना चाहती है कि किसने किसका अपमान किया या किसने किसके खिलाफ अभद्र वीडियो वायरल किया। दुर्भाग्य से जब राजनीति मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत हमलों तक पहुंच जाती है, तब सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास का होता है।

    लोकतांत्रिक मर्यादा की जिम्मेदारी

    इस पूरे घटनाक्रम से सभी राजनीतिक दलों को सीख लेने की आवश्यकता है। यदि कांग्रेस के किसी समर्थक ने विधायक सरयू राय का अपमान किया है, तो कांग्रेस को कार्रवाई करनी चाहिए। उसी तरह यदि सरयू राय के किसी समर्थक ने पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता के खिलाफ व्यक्तिगत चरित्र हनन करने वाला वीडियो वायरल किया है, तो उसे भी गलत मानते हुए रोकने की जिम्मेदारी निभाई जानी चाहिए। किसी भी दल के लिए दोहरे मापदंड लोकतंत्र के हित में नहीं हो सकते।

    नेताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश दें कि विरोध पूरी ताकत से करें, लेकिन मर्यादा के भीतर रहकर करें। लोकतंत्र में बहस हो, तीखी आलोचना हो, लेकिन किसी के सम्मान और चरित्र पर हमला न हो। राजनीतिक लाभ के लिए समाज में वैमनस्य और नफरत का माहौल बनाना अंततः लोकतंत्र को ही कमजोर करता है।

    राजनीति में जीत और हार आती-जाती रहती है। सरकारें बदलती हैं, सत्ता बदलती है, लेकिन संस्कार, शालीनता और लोकतांत्रिक मर्यादा कभी नहीं बदलनी चाहिए। विरोध कीजिए, सवाल पूछिए, जवाब मांगिए, लेकिन व्यक्तिगत अपमान और चरित्र हनन की राजनीति से हर कीमत पर बचिए। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है और यही एक सभ्य समाज का वास्तविक संस्कार भी।

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