गुरुजी शिबू सोरेन को नाला झामुमो कार्यालय में दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि
राष्ट्र संवाद सं
जामताड़ा: नाला प्रखंड अंतर्गत नेताजी स्टेडियम में दो मिनट का मौन धारण कर एक भव्य श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जिसमें झारखंड आंदोलन के पुरोधा, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत गुरुजी शिबू सोरेन को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग उमड़े और गुरुजी के योगदान को याद करते हुए उन्हें नम आंखों से श्रंद्धांजली दी गयी।
कार्यक्रम का नेतृत्व झामुमो प्रखंड अध्यक्ष उज्ज्वल भट्टाचार्य और प्रखंड सचिव बासुदेव हांसदा ने किया। इस मौके पर बीस सूत्री कार्यक्रम के सदस्य भबसिनधु लायक, जनार्दन भंडारी, राजू दास, गोपीन सोरेन, दीनबंधु दास, दयामय घोष, तूफान पाल, विधान गोस्वामी, बहादुर सोरेन, कृष्ण टुडू, और सानंद माजी समेत कई वरिष्ठ नेता मंच पर उपस्थित रहे।
सभा की शुरुआत दो मिनट के मौन श्रद्धांजलि से हुई। इसके बाद वक्ताओं ने गुरुजी के संघर्षों और उपलब्धियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा थे। उन्होंने आदिवासी, गरीब, और वंचित समुदाय के लिए जो संघर्ष किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगा।
प्रखंड अध्यक्ष उज्ज्वल भट्टाचार्य ने कहा, “गुरुजी का जीवन एक आंदोलन था। उन्होंने जिस तरह से झारखंड राज्य की मांग को लेकर आवाज उठाई, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। उनके निधन से प्रदेश ने एक युग पुरुष को खो दिया है।”
प्रखंड सचिव बासुदेव हांसदा ने गुरुजी के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि पार्टी और समाज को अब उनके सपनों के झारखंड के निर्माण में जुटना होगा।
सभा में आए भारी भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि गुरुजी आमजन के दिलों में कितनी गहराई से बसे थे। उपस्थित लोगों ने पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
युवाओं ने हाथों में पोस्टर और बैनर लेकर “गुरुजी अमर रहें” के नारे लगाए, जिससे पूरा स्टेडियम गूंज उठा।
सभा का समापन सभी नेताओं और उपस्थित जनसमूह के द्वारा सामूहिक रूप से गुरुजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया।
इस श्रद्धांजलि सभा ने स्पष्ट कर दिया कि गुरुजी शिबू सोरेन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका विचार, संघर्ष और समर्पण हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेगा। उनका जीवन आदिवासी अस्मिता, आत्मसम्मान और अधिकार की लड़ाई का प्रतीक बना रहेगा।

