स्वार्थ, वर्चस्व और शांति का मार्ग
देवानंद सिंह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का यह कथन कि “दुनिया में संघर्षों की जड़ स्वार्थ और वर्चस्व की चाह है” केवल एक विचार नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य का सटीक विश्लेषण भी है। आज जब विश्व के विभिन्न हिस्सों में युद्ध, धार्मिक तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक प्रभुत्व की होड़ जारी है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि आखिर मानव सभ्यता इतने विकास के बावजूद शांति का स्थायी मार्ग क्यों नहीं खोज पाई।
इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि अधिकांश संघर्षों के पीछे मूल कारण संसाधनों पर नियंत्रण, विचारधारा की श्रेष्ठता स्थापित करने की इच्छा या सत्ता विस्तार की महत्वाकांक्षा रही है। चाहे वह प्राचीन साम्राज्यों का विस्तार हो, औपनिवेशिक युग का शोषण हो या आधुनिक समय के भू-राजनीतिक तनाव हर जगह स्वार्थ और वर्चस्व की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। भागवत का यह कहना कि पिछले 2000 वर्षों में विभिन्न विचारों के प्रयोग के बावजूद विश्व को स्थायी समाधान नहीं मिला, इस ऐतिहासिक सच्चाई को रेखांकित करता है।
धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्म परिवर्तन जैसे मुद्दे आज भी कई क्षेत्रों में संघर्ष का कारण बने हुए हैं। “श्रेष्ठता” और “हीनता” की मानसिकता समाज को विभाजित करती है और संवाद के स्थान पर टकराव को जन्म देती है। ऐसे में भागवत द्वारा “सभी जुड़े हुए हैं और एक हैं” जैसे भारतीय दर्शन के मूल विचार की ओर लौटने की बात महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। भारतीय संस्कृति का यह दृष्टिकोण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सिर्फ एक आदर्श नहीं, बल्कि वैश्विक शांति की दिशा में एक व्यावहारिक आधार भी बन सकता है।
हालांकि, यह भी समझना आवश्यक है कि केवल दार्शनिक विचार पर्याप्त नहीं होते। उन्हें व्यवहार में उतारना ही असली चुनौती है। भागवत ने सही कहा कि धर्म केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि वह व्यक्ति के आचरण में झलकना चाहिए। आज की दुनिया में नैतिकता और अनुशासन का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है चाहे वह राजनीति में हो, व्यापार में या सामाजिक जीवन में। जब तक व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक हित के बारे में नहीं सोचेगा, तब तक किसी भी बड़े परिवर्तन की उम्मीद करना कठिन है।
आधुनिक विज्ञान भी अब परस्पर जुड़ाव की अवधारणा को स्वीकार करने लगा है चाहे वह पर्यावरण के संदर्भ में हो या वैश्विक अर्थव्यवस्था के। जलवायु परिवर्तन, महामारी और आर्थिक संकट जैसे मुद्दे यह साबित करते हैं कि कोई भी देश या समाज पूरी तरह अलग-थलग नहीं रह सकता। इस संदर्भ में भागवत का यह कथन कि “दुनिया को संघर्ष नहीं, बल्कि सौहार्द की जरूरत है” एक व्यावहारिक चेतावनी भी है।
हालांकि, उनके इस विचार पर बहस भी हो सकती है कि “केवल भारत ही युद्धों को समाप्त कर सकता है।” यह कथन प्रेरणादायक जरूर है, लेकिन इसे एक जिम्मेदारी के रूप में समझना अधिक उचित होगा, न कि एकमात्र समाधान के रूप में। भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत निश्चित रूप से शांति, सह-अस्तित्व और संतुलन की शिक्षा देती है, लेकिन वैश्विक शांति के लिए सभी देशों की सामूहिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। किसी एक राष्ट्र पर पूरी जिम्मेदारी डालना यथार्थवादी नहीं होगा।
भारत की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण जरूर हो सकती है—एक ऐसे देश के रूप में जो विविधता में एकता का उदाहरण प्रस्तुत करता है, और जिसने सदियों से विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और विचारधाराओं को साथ लेकर चलने की कोशिश की है। लेकिन इसके लिए भारत को अपने भीतर भी उन मूल्यों को और मजबूत करना होगा जिनकी वह दुनिया को सीख देना चाहता है। आंतरिक सामाजिक सद्भाव, आर्थिक समानता और न्यायपूर्ण व्यवस्था के बिना कोई भी देश वैश्विक नेतृत्व का दावा प्रभावी ढंग से नहीं कर सकता।
अंततः, भागवत के विचार हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम वास्तव में शांति चाहते हैं, या केवल अपने-अपने हितों की रक्षा करते हुए शांति का दिखावा कर रहे हैं। स्वार्थ और वर्चस्व की भावना को पूरी तरह समाप्त करना शायद संभव न हो, लेकिन उसे नियंत्रित करना और सामूहिक हित के साथ संतुलित करना जरूर संभव है।
दुनिया को आज आवश्यकता है एक ऐसे दृष्टिकोण की, जो प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग को बढ़ावा दे, विभाजन के बजाय एकता को प्राथमिकता दे और शक्ति के बजाय नैतिकता को महत्व दे। यदि मानव समाज इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास करे, तो शायद वह दिन दूर नहीं जब संघर्षों की जगह सौहार्द और संतुलन ले लेगा।

