मानगो नगर निगम चुनाव: दलीय आधार न होने से एक ही पार्टी के समर्थक आमने-सामने, अंदरूनी कलह से सियासी माहौल गरम
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर। झारखंड नगर निकाय चुनाव दलीय आधार पर नहीं होने के कारण मानगो नगर निगम चुनाव में राजनीतिक दलों से जुड़े प्रत्याशी आमने-सामने आ गए हैं। स्थिति यह है कि भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों से जुड़े समर्थक प्रत्याशी भी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं, जिससे राजनीतिक माहौल काफी गरमा गया है। पुराने नेताओं को पार्टी समर्थन नहीं मिलने से नाराजगी खुलकर सामने आ रही है और पूरे मामले की जानकारी शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाई गई है।

झारखंड में हो रहे नगर निकाय चुनाव के तहत पूर्वी सिंहभूम जिले में मानगो नगर निगम, जुगसलाई नगर परिषद और चाकुलिया नगर परिषद में चुनाव हो रहे हैं। गैर-दलीय आधार पर हो रहे इस चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मानगो नगर निगम में मेयर पद के लिए कुल 13 महिला प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं।

कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता को पार्टी का समर्थन प्राप्त है, जबकि कांग्रेस नेता फिरोज खान की पत्नी जेबा खान भी मेयर पद की प्रत्याशी हैं। वहीं भाजपा खेमे में पूर्व जिला अध्यक्ष राजकुमार श्रीवास्तव की पत्नी कुमकुम श्रीवास्तव और भाजपा नेता नीरज सिंह की पत्नी संध्या सिंह चुनाव लड़ रही हैं। भाजपा ने संध्या सिंह को एनडीए समर्थित प्रत्याशी घोषित किया है। एक ही पार्टी से जुड़े दो-दो प्रत्याशियों के आमने-सामने होने से सियासी समीकरण पूरी तरह उलझ गए हैं।

इधर, पार्टी समर्थन नहीं मिलने से भाजपा नेता राजकुमार श्रीवास्तव और कांग्रेस नेता फिरोज खान ने खुलकर नाराजगी जताई है। दोनों नेताओं का कहना है कि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वालों की अनदेखी हुई है और इसका असर मतदान के दिन दिखाई दे सकता है।
चुनावी चर्चा के बीच जेबा खान और कुमकुम श्रीवास्तव को लेकर अपने-अपने दलों के भीतर सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस खेमे में यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि जेबा खान फिरोज खान के नहीं, बल्कि डॉक्टर अजय के इशारे पर चुनाव मैदान में उतरी हैं, जिससे पार्टी के अंदर असंतोष और गहराता जा रहा है। वहीं भाजपा में भी कुमकुम श्रीवास्तव की उम्मीदवारी को लेकर अंदरूनी नाराजगी सामने आ रही है।
मानगो नगर निगम चुनाव में इस तरह की अंदरूनी कलह और गैर-दलीय व्यवस्था ने चुनाव को और रोचक व तनावपूर्ण बना दिया है। अब देखना होगा कि इन समीकरणों का असर 23 फरवरी को होने वाले मतदान पर किस रूप में सामने आता है।

