बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पुलिस स्टेशन में वीडियो बनाना ‘जुर्म’ नहीं, अब नहीं चलेगी खाकी की मनमानी!
राष्ट्र संवाद संवाददाता
मुंबई (इंद्र यादव) नागपुर,क्या पुलिस स्टेशन के अंदर मोबाइल से वीडियो बनाना आपको सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है? बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने इस पर एक ऐसा फैसला सुनाया है जो देशभर के आम नागरिकों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पुलिस स्टेशन के भीतर वीडियो रिकॉर्डिंग करना ‘आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम’ के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
वर्धा के एक आम नागरिक ने झुका दिया सिस्टम
यह पूरी कानूनी लड़ाई वर्धा निवासी रवींद्र शीतलराव उपाध्याय की हिम्मत का नतीजा है। दरअसल, रवींद्र के खिलाफ सांवगी (मेघे) पुलिस स्टेशन में एक मामला दर्ज किया गया था। उनका ‘गुनाह’ सिर्फ इतना था कि उन्होंने पुलिस स्टेशन के कामकाज की वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली थी। पुलिस ने उन पर गोपनीयता भंग करने और सरकारी काम में बाधा डालने जैसी गंभीर धाराओं के तहत केस ठोक दिया था।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी: पुलिस स्टेशन कोई ‘प्रतिबंधित इलाका’ नहीं
न्यायमूर्ति मनीष पिटाले और न्यायमूर्ति वाल्मीकि सा मेनेजेस की खंडपीठ ने इस मामले की जड़ तक जाते हुए कानून की नई व्याख्या पेश की। कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं:
परिभाषा का हवाला: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम’ के तहत केवल उन्हीं जगहों पर फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी प्रतिबंधित है जिन्हें सरकार ने विशेष रूप से ‘प्रतिबंधित स्थान’ घोषित किया हो। पुलिस स्टेशन इस सूची में नहीं आता।
पारदर्शिता बनाम जासूसी: अदालत ने कहा कि अगर कोई नागरिक पुलिस की कार्यप्रणाली को रिकॉर्ड करता है, तो उसे ‘जासूसी’ नहीं कहा जा सकता। यह पारदर्शिता की ओर एक कदम है।
एफआईआर रद्द: कोर्ट ने रवींद्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही न्यायसंगत नहीं है।
“कानून आम आदमी को सुरक्षा देने के लिए है, डराने के लिए नहीं। पुलिस स्टेशन कोई गोपनीय सैन्य अड्डा नहीं है जहाँ मोबाइल का उपयोग अपराध मान लिया जाए।” – एड.राकेश सरोज
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत: जागरूकता की जीत
इस मामले को उजागर करने में अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की भूमिका भी अहम रही है। संस्था का उद्देश्य नागरिकों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति सचेत करना है। इस फैसले के बाद अब पुलिसकर्मी किसी भी नागरिक को वीडियो बनाने के नाम पर धमका नहीं पाएंगे।
आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है
अक्सर देखा जाता है कि पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराते समय या पुलिस की बदसलूकी के दौरान लोग सबूत के तौर पर वीडियो बनाना चाहते हैं, लेकिन पुलिस केस दर्ज करने की धमकी देकर उन्हें रोक देती है। इस फैसले ने अब आम आदमी के हाथ में एक कानूनी ढाल दे दी है।
सावधान: हालांकि वीडियो बनाना अपराध नहीं है, लेकिन इसका उद्देश्य पुलिस के काम में बाधा डालना या हिंसा भड़काना नहीं होना चाहिए। यदि आप अपनी सुरक्षा या पारदर्शिता के लिए रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, तो कानून आपके साथ खड़ा है।

