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    आर्थिक शक्ति बढ़ रही है, पर बौद्धिक शक्ति सीमाएँ लाँघ रही है

    Devanand SinghBy Devanand SinghMay 14, 2026No Comments5 Mins Read
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    आर्थिक शक्ति बढ़ रही है, पर बौद्धिक शक्ति सीमाएँ लाँघ रही है

    प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

    जब दुनिया की अर्थव्यवस्था अदृश्य संबंधों से नई दिशा गढ़ती है, तब भारत वह धुरी बनकर उभरता है जहाँ प्रवासन केवल स्थानांतरण नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव की प्रक्रिया बन जाता है—यही चित्र विश्व प्रवासन रिपोर्ट 2026 प्रस्तुत करती है। 2024 में 138 अरब डॉलर (लगभग 11.5 लाख करोड़ रुपये) का रेमिटेंस सिर्फ आँकड़ा नहीं, बल्कि 19 मिलियन भारतीय प्रवासियों की प्रतिभा, परिश्रम और उनके योगदान का सशक्त प्रमाण है। यह पहली बार है जब किसी देश ने 100 अरब डॉलर की सीमा पार की है। अब गल्फ देशों से आगे बढ़कर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से आने वाले उच्च-कुशल भारतीय पेशेवरों का योगदान भारत की बदलती प्रवासन संरचना और उसकी तेजी से उभरती वैश्विक आर्थिक शक्ति को दर्शाता है।

    आज का भारतीय प्रवासन अब श्रम-आधारित नहीं, बल्कि तेज़ी से उच्च-कुशल वैश्विक गतिशीलता में बदल चुका है। आईटी विशेषज्ञ, डॉक्टर, इंजीनियर, शोधकर्ता और छात्र बेहतर वेतन, उन्नत शोध अवसरों और उच्च जीवन स्तर के लिए विदेश जा रहे हैं। विश्व बैंक और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार एच-1बी जैसी नीतियों ने भारतीय आईटी कौशल को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाया, लेकिन घरेलू प्रशिक्षण और रोजगार पर भी असर डाला है। आईआईटी जैसे संस्थानों के कई छात्र, खासकर टॉप रैंकर्स में एक तिहाई या अधिक विदेश जाते हैं, जिससे प्रतिभा का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाता है, हालांकि कुछ मामलों में यह ब्रेन सर्कुलेशन का रूप भी लेता है।

    रेमिटेंस आज भारतीय अर्थव्यवस्था की एक सशक्त वित्तीय धारा बन चुका है, जो परिवारों की आय को तुरंत सुदृढ़ कर शिक्षा, स्वास्थ्य और उपभोग व्यय को तेज़ी से बढ़ाता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी नई ऊर्जा, स्थिरता और क्रय शक्ति का विस्तार होता है। आरबीआई के अनुसार पश्चिमी देशों से आने वाला उच्च-मूल्य रेमिटेंस अब गल्फ देशों की तुलना में अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है और घरेलू मांग को निरंतर बल मिलता है। लेकिन यह विकास का पूर्ण आधार नहीं है, क्योंकि उच्च-कुशल प्रतिभा के बाहर जाने से दीर्घकाल में नवाचार, अनुसंधान एवं उत्पादकता पर दबाव भी बढ़ सकता है।

    यह प्रवासन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक बदलावों की परतें भी उकेरता है। ‘गल्फ वाइव्स’ और ‘एनआरआई पैरेंट्स’ जैसी नई पारिवारिक संरचनाएँ तेजी से आकार ले रही हैं, जहाँ परिवार का एक हिस्सा विदेश में और दूसरा देश में भावनात्मक दूरी के साथ जीवन जीने को मजबूर होता है। बुजुर्ग माता-पिता अकेलेपन और मानसिक तनाव से जूझते हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। युवा पीढ़ी में विदेश-गमन की आकांक्षा एक मजबूत सामाजिक प्रवृत्ति बन चुकी है, जिससे घरेलू शिक्षा और करियर के मानक भी विदेशी मॉडल की ओर झुकते जा रहे हैं। साथ ही, महिलाओं पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ने से उनके जीवन में सामाजिक और भावनात्मक दबाव और अधिक गहरा हो जाता है।

    ब्रेन ड्रेन और ब्रेन गेन का विमर्श आज वैश्विक विकास की सबसे निर्णायक बहसों में बदल चुका है। अनेक अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि विदेश जाने की संभावना घरेलू स्तर पर कौशल उन्नयन को भी गति देती है, जैसा कि फिलीपींस के नर्सिंग क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखा गया। भारत में भी यह प्रभाव आईटी सेक्टर में दिखाई देता है, जहाँ वैश्विक मांग ने प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धा दोनों को नई ऊँचाई दी है। साथ ही ब्रेन गेन के रूप में रिवर्स माइग्रेशन भी बढ़ा है—2023-24 में लाखों प्रोफेशनल्स भारत लौटे, जिन्होंने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और स्टार्टअप्स को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की। फिर भी स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा जैसे क्षेत्रों में डॉक्टरों और प्रोफेसरों की कमी आज भी एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण स्थिति बनी हुई है।

    जब देश के भीतर अवसर सीमित और संरचनात्मक बाधाएँ स्पष्ट होती हैं, तब युवाओं का रुझान विदेश की ओर बढ़ता है। सीमित रोजगार, अनुसंधान में अपर्याप्त फंडिंग, असंतुलित वर्क-लाइफ और जटिल नौकरशाही उन्हें बाहर जाने के लिए प्रेरित करती है। उद्योग विशेषज्ञ श्रीधर वेम्बू इसे केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमता और दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती को प्रभावित करने वाली प्रवृत्ति मानते हैं, जो रुपये की स्थिरता और तकनीकी आत्मनिर्भरता की गति को भी धीमा करती है। साथ ही, विदेश शिक्षा पर होने वाला भारी व्यय देश से पैसा बाहर जाने की मात्रा बढ़ाता है, जिससे भारत के वित्तीय संतुलन पर दबाव पड़ता है।

    नीति स्तर पर प्रतिभा को देश में बनाए रखना अब एक अनिवार्य और निर्णायक आवश्यकता बन चुका है। यदि भारत को अपने विदेशों में कार्यरत उच्च-कुशल भारतीयों के लाभ को संतुलित करना है, तो अनुसंधान एवं विकास में निवेश को बढ़ाकर इसे कम से कम जीडीपी के 0.64 प्रतिशत से ऊपर ले जाना होगा। इसके साथ कर प्रोत्साहन, स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन को तेज़ करना आवश्यक है। शिक्षा प्रणाली को भी वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत करना होगा, ताकि प्रतिभा को देश के भीतर ही अवसरों की व्यापक संभावनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई दें। केवल आर्थिक प्रोत्साहन ही नहीं, बल्कि प्रभावी और दूरगामी संस्थागत सुधार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

    जब वैश्विक प्रवासन की वास्तविक तस्वीर सामने आती है, तो 138 अरब डॉलर का रेमिटेंस भारत की आर्थिक शक्ति और व्यापक प्रवासी नेटवर्क की मजबूत पुष्टि करता है, लेकिन यह केवल एक पक्ष है। इसके भीतर प्रतिभा के निरंतर पलायन और सामाजिक ढांचे में हो रहे सूक्ष्म लेकिन गहरे परिवर्तन छिपे हैं। उच्च-कुशल प्रवासी भारत को दुनिया से जोड़ते हैं, पर देश के भीतर संतुलन स्थापित करना अब अनिवार्य हो गया है। ब्रेन ड्रेन को ब्रेन गेन में बदलने के लिए शिक्षा, नवाचार और जीवन-गुणवत्ता में ठोस सुधार जरूरी हैं। विश्व प्रवासन रिपोर्ट 2026 स्पष्ट करती है कि प्रवासन अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय परिवर्तन की जटिल प्रक्रिया है, जिसे समझना और संतुलित करना भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है।

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