न्यायिक स्वतंत्रता के साथ न्यायिक जवाबदेही भी हो पुनर्परिभाषित
देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र की नींव तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर टिकी हुई है। इनमें न्यायपालिका को सबसे अधिक गरिमा और स्वतंत्रता प्राप्त है, क्योंकि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह बाकी दो स्तंभों पर भी निगरानी रखे, लेकिन जब उसी न्यायपालिका के भीतर से अनियमितताओं, पक्षपात और नैतिक पतन के आरोप सामने आते हैं, तब क्या जवाबदेही की कोई ठोस व्यवस्था मौजूद है?

हाल ही में दो न्यायाधीशों जस्टिस यशवंत वर्मा और जस्टिस शेखर यादव के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप सामने आए हैं। वर्मा पर भ्रष्टाचार और बेहिसाब नक़दी रखने के आरोप हैं, जबकि यादव पर एक सांप्रदायिक वक्तव्य देने का आरोप है, जो उनकी न्यायिक निष्पक्षता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
इन दोनों मामलों में संसद के कुछ सदस्यों ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की है। जस्टिस यादव के मामले में 55 राज्यसभा सांसदों ने प्रस्ताव भेजा है, जबकि वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सौंपी है, लेकिन क्या इस प्रक्रिया के सफल होने की कोई संभावना है?

महाभियोग की प्रक्रिया की कठिनाई और राजनीतिक हस्तक्षेप को सबसे स्पष्ट रूप से जस्टिस वी. रामास्वामी के मामले में देखा गया था। 1993 में जब उनके ख़िलाफ़ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया, तो सभी तथ्यों और सबूतों के बावजूद वह प्रस्ताव गिर गया, क्योंकि कांग्रेस ने मतदान से दूरी बना ली थी। यह मामला भारत के इतिहास में न्यायिक जवाबदेही की विफलता का प्रतीक बन गया। रामास्वामी पर कार्यालय सज्जा में फिजूलखर्ची, आधिकारिक संसाधनों का दुरुपयोग, और नैतिक पतन जैसे बेहद गंभीर आरोप लगे थे, फिर भी वे अपने पद पर बने रहे और पूरे सम्मान के साथ रिटायर भी हुए, इससे यह प्रश्न उभरता है कि क्या न्यायपालिका के भीतर आत्म-शुद्धि का कोई यंत्र है?

भारत के संविधान निर्माताओं ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जानबूझकर महाभियोग की प्रक्रिया को कठिन बनाया ताकि न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव न पड़े, लेकिन इस संरक्षण का दुरुपयोग कर कुछ जज अपने पदों की गरिमा को ठेस पहुंचा चुके हैं। एक ओर, जहां जजों को कार्यपालिका से पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर उनका जवाबदेह न होना एक ‘न्यायिक निरंकुशता’ की ओर इशारा करता है। अगर, न्यायाधीश संविधान, विधि और नैतिकता से ऊपर महसूस करने लगें, तो वह लोकतंत्र की आत्मा के लिए घातक है।

जस्टिस शेखर यादव द्वारा तीन तलाक़ और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर दिए गए बयानों को राजनीतिक और सांप्रदायिक मानते हुए 55 सांसदों ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है। एक न्यायाधीश का किसी मंच पर इस तरह से भाषण देना निश्चित ही न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में सिर्फ नैतिक आलोचना पर्याप्त नहीं है; अगर, प्रणालीगत दंड नहीं होगा तो यह प्रवृत्ति बढ़ेगी। भारत में किसी जज को महाभियोग के ज़रिए हटाना लगभग असंभव है। प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि यह खुद एक ढाल बन जाती है। प्रस्ताव के लिए सदन के एक बड़े हिस्से का समर्थन, जांच समिति की स्थापना, फिर दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत, यह सब मिलकर न्यायिक जवाबदेही को एक असंभव कार्य बना देते हैं।

इसके अलावा, जब इस प्रक्रिया में राजनीतिक दलों के हित या सांप्रदायिक समीकरण घुस जाते हैं, तो मामला और जटिल हो जाता है, जैसा कि रामास्वामी के मामले में हुआ था। आगे की राह सही जाए तो समाधान की दिशा में काम होना चाहिए। इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीशों और नागरिक समाज के प्रतिष्ठित सदस्यों की एक स्थायी नैतिकता समिति बनाई जा सकती है, जो न्यायाधीशों पर लगे आरोपों की प्रारंभिक जांच करे।

दूसरा, न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को थोड़ा सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाना चाहिए। दो-तिहाई बहुमत जैसे प्रावधान को सुरक्षित रखते हुए अन्य बाधाओं को कम किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट को खुद अपने और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए एक स्पष्ट आचार संहिता लागू करनी चाहिए और उसके उल्लंघन पर स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। न्यायपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना ज़रूरी है लेकिन इसमें उनकी स्वतंत्रता बाधित न हो, इसके लिए प्रक्रिया में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाना होगा।

कुल मिलाकर, भारत में अब समय आ गया है, जब न्यायिक स्वतंत्रता के साथ न्यायिक जवाबदेही भी पुनर्परिभाषित हो। अगर, न्यायपालिका खुद को स्वशासी और निर्विवाद मानती रहेगी, तो वह धीरे-धीरे जनता का विश्वास खो देगी। महाभियोग की जटिल प्रक्रिया को केवल न्यायिक गरिमा की रक्षा के लिए बनाए रखना अब एक पुरानी सोच है। एक संवेदनशील, सक्रिय और उत्तरदायी न्यायपालिका ही लोकतंत्र को सशक्त बना सकती है।

