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    Home » राजनीति के नाम पर संस्थानों की मर्यादा और लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति कमजोर करना चिंताजनक
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    राजनीति के नाम पर संस्थानों की मर्यादा और लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति कमजोर करना चिंताजनक

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 8, 2025No Comments7 Mins Read
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    राजनीति के नाम पर संस्थानों की मर्यादा और लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति कमजोर करना चिंताजनक

    देवानंद सिंह

    पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही देश के लोकतांत्रिक विमर्श का केंद्र रही है। यहां का सामाजिक ताना-बाना, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक राजनीतिक परंपराएं इस राज्य को अन्य राज्यों से अलग पहचान देती हैं, लेकिन गुरुवार को विधानसभा में जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या राजनीति के नाम पर संस्थानों की मर्यादा और लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति लगातार कमजोर होती जा रही है?

    विशेष सत्र के आखिरी दिन विधानसभा का दृश्य किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की गरिमा के अनुकूल नहीं था। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई कि सदन का मुख्य उद्देश्य सार्थक चर्चा और बहस कहीं पीछे छूट गया। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के विधायकों ने वेल में पहुंचकर हंगामा किया, और स्थिति यहां तक बिगड़ी कि स्पीकर को भाजपा के चीफ व्हिप शंकर घोष को निलंबित करना पड़ा। जब मार्शलों को उन्हें सदन से बाहर निकालना पड़ा, तो इस धक्का-मुक्की के बीच घोष बेहोश होकर गिर पड़े। यह दृश्य न केवल दुखद था बल्कि यह भी दर्शाता है कि बंगाल की राजनीति किस हद तक टकराव और अविश्वास की चपेट में आ चुकी है।

     

    इस विवाद की पृष्ठभूमि समझने के लिए हमें उस विषय पर ध्यान देना होगा, जिस पर सदन में चर्चा होनी थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा-शासित राज्यों में रहने वाले पश्चिम बंगाल के प्रवासी बंगालियों को निशाना बनाया जा रहा है। यह मुद्दा सीधे-सीधे बांग्ला अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ता है, जिस पर तृणमूल ने हमेशा अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश की है।

    ममता बनर्जी कई बार यह कह चुकी हैं कि जो बंगाली दूसरे राज्यों में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, वे वापस लौट आएं, राज्य सरकार उनका पूरा ध्यान रखेगी। इस तरह की बातें भले ही जनसंवेदना को छूती हों, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह संदेश भाजपा के खिलाफ एक व्यापक नैरेटिव गढ़ने का प्रयास है कि केंद्र और उसके शासित राज्य बंगालियों के साथ भेदभाव कर रहे हैं।

     

    सिर्फ प्रवासी बंगालियों का सवाल ही नहीं, कुछ ही दिन पहले जब कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस का अस्थायी मंच सेना द्वारा हटाया गया, तो भी सियासी बवंडर खड़ा हो गया। सेना का कहना था कि पार्टी ने अनुमति खत्म होने के बाद भी मंच नहीं हटाया, इसलिए कार्रवाई करनी पड़ी। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने इसे सीधे राजनीतिक हस्तक्षेप और अपमान से जोड़ दिया।

    यहां सवाल उठता है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाइयों को भी राजनीतिक षड्यंत्र के चश्मे से देखना सही है? या फिर वास्तव में ऐसा माहौल बन चुका हैं, जिसमें हर कार्रवाई पर संदेह होना स्वाभाविक है? यह स्थिति बताती है कि राज्य और केंद्र, सत्ता पक्ष और विपक्ष, सभी के बीच भरोसा लगभग खत्म हो चुका है। पश्चिम बंगाल लंबे समय से केंद्र-राज्य टकराव का मैदान बना हुआ है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच तनातनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। केशरीनाथ त्रिपाठी से लेकर जगदीप धनखड़ और मौजूदा राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस तक, किसी के साथ भी ममता बनर्जी के रिश्ते सहज नहीं रहे। त्रिपाठी ने जाते-जाते ममता सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया, धनखड़ ने तो यहां तक कह दिया कि राज्य में लोकतांत्रिक हालात ठीक नहीं हैं। वहीं ममता का लगातार यह आरोप रहा कि राजभवन केंद्र सरकार का औजार बनकर काम कर रहा है और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल देता है।

     

    यह स्थिति केवल संवैधानिक शिष्टाचार की कमी नहीं, बल्कि भारतीय संघीय ढांचे के लिए भी चुनौती है। संविधान ने राज्यपाल को सीमित भूमिका दी है, लेकिन व्यवहार में वे अक्सर केंद्र की राजनीतिक इच्छा के विस्तारक की तरह कार्य करते दिखाई देते हैं। खासकर, उन राज्यों में जहां विपक्षी दल की सरकार है, वहां टकराव और भी गहरा हो जाता है। बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस संघर्ष की एक और जड़ है 2021 का विधानसभा चुनाव। उस चुनाव में भाजपा ने पहली बार पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल का स्थान पाया। हालांकि सत्ता में नहीं आ पाई, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि वह तृणमूल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। तब से भाजपा लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

     

    तृणमूल के सामने चुनौती है अपनी पारंपरिक पकड़ को बनाए रखना। ग्रामीण इलाकों, खासकर दक्षिण बंगाल में जहां उसकी मजबूत पकड़ है, वहां भाजपा धीरे-धीरे सेंध लगा रही है। दूसरी ओर भाजपा का प्रयास है कि उत्तरी बंगाल और आदिवासी इलाकों में अपनी जड़ें गहरी की जाएं। यह प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से विधानसभा के अंदर भी झलकती है, जहां संवाद और बहस की जगह आरोप-प्रत्यारोप और हंगामा हावी हो जाते हैं।

    अगले साल मार्च-अप्रैल में राज्य में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। चुनाव नजदीक आते ही यह टकराव और तेज होगा। दोनों पक्ष इस संघर्ष को अपने-अपने तरीके से भुनाना चाहते हैं। तृणमूल इसे बाहरी ताकतों बनाम बंगाल की अस्मिता की लड़ाई के रूप में पेश करना चाहती है, जबकि भाजपा भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और कुशासन के खिलाफ अपनी मुहिम को धार देना चाहती है, लेकिन इस बीच सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक मर्यादा का हो रहा है। विधानसभा, जो कि विचार-विमर्श का सर्वोच्च मंच है, वहां शारीरिक धक्का-मुक्की और बेहोशी जैसे दृश्य लोकतंत्र की आत्मा को ठेस पहुंचाते हैं। विपक्ष की भूमिका सवाल उठाने और सत्ता पक्ष को जवाबदेह बनाने की होती है, जबकि सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना को जगह दे और बहस के लिए माहौल बनाए। परंतु बंगाल की राजनीति में यह संतुलन कहीं खो गया है।

     

     


    बंगाल की राजनीति ऐतिहासिक रूप से वैचारिक तीखेपन और आंदोलनों के लिए जानी जाती रही है। कभी यह वामपंथ का गढ़ था, जहां 34 साल तक वाम मोर्चा सत्ता में रहा, लेकिन 2011 में ममता बनर्जी ने उस किले को ढहाकर इतिहास रच दिया। तृणमूल के उदय के बाद से बंगाल की राजनीति में “केंद्र बनाम राज्य” का आयाम और भी गहरा हो गया।

    ममता ने खुद को दिल्ली की सत्ता के खिलाफ बंगाल की आवाज के रूप में पेश किया। यही कारण है कि हर बार जब केंद्र और राज्य के बीच टकराव होता है, ममता उसे संघीय ढांचे पर हमले के रूप में पेश करती हैं। दूसरी ओर, भाजपा इसे भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ केंद्र का दायित्व बताती है। इस द्वंद्व ने राजनीतिक विमर्श को बेहद ध्रुवीकृत कर दिया है। सवाल यह है कि इस पूरे संघर्ष में जनता कहां खड़ी है? विधानसभा में जो दृश्य सामने आए, क्या वे आम नागरिक की उम्मीदों से मेल खाते हैं? लोगों की अपेक्षा होती है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि उनकी समस्याओं पर चर्चा करें, समाधान निकालें। लेकिन अगर सदन में केवल राजनीतिक प्रदर्शन हो और वास्तविक मुद्दे गायब हो जाएं, तो जनता का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं से डगमगाने लगता है।

     

    प्रवासी बंगालियों की सुरक्षा, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, ये ऐसे विषय हैं, जिन पर गंभीर चर्चा की जरूरत है, लेकिन राजनीतिक दल अगर इन्हें केवल चुनावी नैरेटिव गढ़ने के लिए इस्तेमाल करेंगे, तो असली समाधान कहीं नहीं निकलेगा। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। यह संवाद, सहमति और असहमति की स्वस्थ परंपरा पर टिका हुआ है। अगर, विधानसभा में ही विपक्ष को सुना नहीं जाएगा, तो वह सड़क पर हंगामा करेगा, और अगर सत्ता पक्ष केवल बहुमत के दम पर विपक्ष की आवाज दबाएगा, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ जाएगा। आगामी चुनाव निस्संदेह टकराव को और गहरा करेंगे। लेकिन इस दौर में ही सभी दलों को यह दिखाना होगा कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखने में सक्षम हैं। सत्ता पक्ष को धैर्य और समावेशिता दिखानी होगी, जबकि विपक्ष को भी अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभानी होगी।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा में गुरुवार को जो कुछ हुआ, वह केवल एक दिन का हंगामा नहीं था। यह एक गहरी प्रवृत्ति का संकेत है कि राजनीति अब संवाद से ज्यादा टकराव और प्रदर्शन पर केंद्रित हो चुकी है। प्रवासी बंगालियों का सवाल हो, मंच हटाने का विवाद हो, या राज्यपाल-सरकार की तनातनी हर घटना चुनावी रणनीति की भेंट चढ़ रही है। आने वाले महीनों में चुनावी सरगर्मी और बढ़ेगी। ऐसे में, जरुरी है कि सभी राजनीतिक दल यह समझें कि चुनाव तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और संवैधानिक परंपराएं ही इस पूरे तंत्र की आत्मा हैं। अगर, इन्हें बार-बार तार-तार किया गया, तो नुकसान केवल बंगाल का ही नहीं, पूरे भारतीय लोकतंत्र का होगा।

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