आतंकवाद के खिलाफ बतौर राष्ट्र अपनी सतर्कता और संवेदनशीलता पुनर्जीवित करना आवश्यक
देवानंद सिंह
गत दिनों लाल किले के पास हुए विस्फोट ने न केवल सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है, बल्कि इसने उस सवाल को फिर से जीवित कर दिया, जो हर कुछ वर्षों में भारत की राष्ट्रीय चेतना को झकझोर देता है कि क्या आतंकवाद एक बार फिर लौटने की कोशिश कर रहा है?
सरकार ने अभी तक इस घटना को आतंकी वारदात घोषित नहीं किया है, लेकिन प्रारंभिक संकेत और घटनाक्रम की श्रृंखला यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मामला महज़ एक दुर्घटना नहीं हो सकता। मंगलवार को इस जांच को राष्ट्रीय जांच एजेंसी के हवाले कर दिया गया है, जो दर्शाता है कि केंद्र इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रहा है।
घटना से जुड़े जो प्रारंभिक सूत्र सामने आए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। बताया जा रहा है कि इस विस्फोट का लिंक पुलवामा से जुड़ रहा है, वही पुलवामा, जिसने 2019 में भारत को अपने सबसे भीषण आतंकी घावों में से एक दिया था। सूत्रों के अनुसार, इस बार भी नेटवर्क की जड़ें जम्मू-कश्मीर से शुरू होकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैली थीं।
मुख्य संदिग्ध के रूप में पुलवामा निवासी उमर मोहम्मद का नाम सामने आ रहा है, जो कथित तौर पर उसी कार को चला रहा था, जिसमें धमाका हुआ। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि आतंकी नेटवर्क अब दिल्ली जैसे उच्च-सुरक्षा क्षेत्र तक पहुंचने में सक्षम हो गए हैं, और यह भारत की खुफिया प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती है।
सुरक्षा एजेंसियों ने हाल ही में जिस टेरर मॉड्यूल का खुलासा किया था, वह दरअसल इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि बनता दिख रहा है। शुरुआती जांच से यह संकेत मिला था कि इस मॉड्यूल का संचालन जम्मू-कश्मीर से हो रहा था, लेकिन इसके सक्रिय सदस्य उत्तर भारत के कई राज्यों में फैले हुए थे।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस मॉड्यूल से जुड़ी गिरफ्तारियों में उच्च शिक्षित लोग, जिनमें डॉक्टर और इंजीनियर शामिल हैं, पाए गए हैं। यह प्रवृत्ति अत्यंत खतरनाक है। आमतौर पर माना जाता है कि आतंकी संगठन समाज से कटे, बेरोजगार या असंतुष्ट युवाओं को अपना निशाना बनाते हैं, लेकिन जब पढ़े-लिखे लोग भी इस वैचारिक अंधेरे में उतरने लगें, तो यह केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की भी विफलता का संकेत है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियां इतनी तकनीकी रूप से सशक्त हैं, तब भी जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े लोग राजधानी के आस-पास साजिश रचने में सफल कैसे हो गए?
रिपोर्टों के अनुसार, इस नेटवर्क के पास लगभग 2900 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री मौजूद थी। कल्पना कीजिए, यदि इस साजिश का समय पर पर्दाफाश न हुआ होता, तो देश शायद एक भयावह त्रासदी से गुजर रहा होता, जिसकी तुलना 2008 के मुंबई हमलों या 2011 के दिल्ली हाईकोर्ट विस्फोट से की जा सकती थी।
यह बात फिर से उजागर होती है कि हमारे खुफिया तंत्र में इंटेलिजेंस गैप मौजूद है। घटनाएं अक्सर तब सामने आती हैं, जब आतंकी या तो पकड़े जाते हैं या योजना का कोई हिस्सा असफल हो जाता है। इसका अर्थ है कि हमारा सिस्टम रिएक्टिव है, प्रो-एक्टिव नहीं।
दिल्ली में आखिरी बड़ा आतंकी हमला सितंबर 2011 में हुआ था, जब हाई कोर्ट के बाहर हुए धमाके में 11 लोगों की मौत हो गई थी। उसके बाद से राजधानी में कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ, केवल छिटपुट घटनाएं हुईं, जिनमें जान का नुकसान नहीं हुआ। पिछले एक दशक में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है। ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स के अनुसार, भारत में आतंकी घटनाओं की संख्या में निरंतर कमी आई है। आतंकवाद से सबसे अधिक प्रभावित देशों की सूची में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ है, जबकि पाकिस्तान अब भी दुनिया में दूसरे स्थान पर बना हुआ है।
यह सुधार दर्शाता है कि भारत की सुरक्षा रणनीति ने पिछले वर्षों में कई स्तरों पर सफलता पाई है, चाहे वह सीमा सुरक्षा हो, डिजिटल निगरानी हो, या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को अलग-थलग करने की कूटनीति, लेकिन यह स्थिरता तभी टिकाऊ रह सकती है, जब हम लगातार सतर्क रहें।
एनआईए को जांच सौंपे जाने का अर्थ यह है कि केंद्र सरकार अब इस घटना को राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में देख रही है। एजेंसी को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी गुनहगार न बच सके, और यह जांच केवल अपराधी तक सीमित न रहे, बल्कि उस वैचारिक और आर्थिक तंत्र तक पहुंचे, जो इस तरह की घटनाओं को जन्म देता है।
पिछले वर्षों में एनआईए ने आतंकवाद से जुड़ी कई बड़ी साजिशों का पर्दाफाश किया है, जैसे हिजबुल नेटवर्क, पीएफआई की आतंकी फंडिंग, या आईएसआईइस से जुड़े मॉड्यूल्स, लेकिन इस बार चुनौती कहीं अधिक जटिल है, क्योंकि मामला न केवल राजधानी से जुड़ा है, बल्कि इसके तार कई राज्यों में फैले हैं।
इसके अलावा, इस घटना के राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर भी नजर रखनी होगी। ऐसे मामलों में ज़रा-सी लापरवाही या अपुष्ट बयानबाज़ी न केवल जांच को प्रभावित कर सकती है, बल्कि सामाजिक असंतोष भी भड़का सकती है।
यह भी समझना आवश्यक है कि आज आतंकवाद केवल सीमाओं या हथियारों के जरिए नहीं, बल्कि सूचना और विचारधारा के माध्यम से भी फैलता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे उपकरण बन चुके हैं, जिनसे आतंकी संगठन युवाओं तक अपनी विचारधारा पहुंचा रहे हैं।
कई रिपोर्टों ने दिखाया है कि कैसे ऑनलाइन प्रोपेगैंडा के जरिए युवाओं को जिहाद या धार्मिक कर्तव्य के नाम पर बहकाया जाता है। यही कारण है कि साइबर सुरक्षा और डिजिटल मॉनिटरिंग आज आतंकवाद विरोधी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुके हैं।
दिल्ली धमाके के संदर्भ में भी जांच एजेंसियां अब इस दिशा में काम कर रही हैं कि कहीं यह नेटवर्क डिजिटल माध्यम से तो नहीं जुड़ा था, क्योंकि हाल में गिरफ्तार कुछ लोग सोशल मीडिया के ज़रिए ही कट्टरपंथी समूहों से प्रभावित हुए पाए गए हैं। इस पूरे प्रकरण का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसमें शामिल कुछ लोग डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पेशेवर वर्ग से हैं। यह दिखाता है कि शिक्षा अकेले कट्टरपंथ को समाप्त नहीं कर सकती।
दरअसल, चरमपंथ केवल आर्थिक या सामाजिक वंचना का परिणाम नहीं है, बल्कि वह मानसिक और वैचारिक असंतुलन का भी नतीजा है। जब व्यक्ति अपने धर्म, समुदाय या राजनीतिक विचारधारा को मानवीयता से ऊपर रख देता है, तब वह आतंकवाद के रास्ते पर उतर आता है, इसलिए, सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ समाज को भी यह जिम्मेदारी निभानी होगी कि युवाओं के भीतर संवाद, सहिष्णुता और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा दिया जाए।
ऐसे हर हमले के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो जाती है—कौन ज़िम्मेदार है, किसकी सरकार थी, किसकी चूक थी, लेकिन सच्चाई यह है कि आतंकवाद किसी राजनीतिक दल या राज्य की विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की परीक्षा है। जब तक सभी संस्थान सरकार, विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज एकजुट होकर आतंकवाद के विरुद्ध खड़े नहीं होंगे, तब तक यह जंग अधूरी रहेगी।
सुरक्षा विशेषज्ञों का भी कहना है कि खुफिया एजेंसियों के बीच रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग को और मज़बूत करने की ज़रूरत है। राज्य पुलिस, आईबी, एनआईए और रॉ के बीच बेहतर समन्वय से ही इस तरह के मॉड्यूल्स को समय रहते निष्क्रिय किया जा सकता है।
भारत को अब अपनी सुरक्षा रणनीति को टेक्नोलॉजी-ड्रिवन बनाना होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, फेस रिकग्निशन, ड्रोन सर्विलांस, और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकें अब केवल विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं। इसके साथ ही, नागरिकों का सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुरक्षा केवल एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं, यह एक सामाजिक अनुशासन भी है। संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्टिंग, स्थानीय स्तर पर सामुदायिक निगरानी और साइबर जागरूकता इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है।
लाल किले के पास हुआ यह धमाका केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि आतंकवाद भले कमजोर पड़ा हो, समाप्त नहीं हुआ है। बीते वर्षों में भारत ने आतंकवाद के खिलाफ उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन यह जंग अभी पूरी नहीं हुई। यह तभी संभव है जब सुरक्षा एजेंसियां निरंतर सजग रहें, खुफिया नेटवर्क चुस्त हो, और समाज में कट्टरपंथ के लिए कोई स्थान न बचे।
एनआईए की जांच से यह स्पष्ट होगा कि दिल्ली धमाका एक स्थानीय घटना थी या किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा, लेकिन इससे पहले कि जांच का निष्कर्ष सामने आए, यह आवश्यक है कि हम बतौर राष्ट्र अपनी सतर्कता और संवेदनशीलता दोनों को पुनर्जीवित करें, क्योंकि आतंकवाद का मकसद केवल जान लेना नहीं होता, उसका लक्ष्य देश की आत्मा को डराना होता है, और जब कोई देश डरना छोड़ देता है, तो आतंकवाद की हार तय हो जाती है।

