‘वंदे मातरम्’ एक राजनीतिक आरोप-पत्र बना रहेगा या राष्ट्रीय स्मृति का गर्वपूर्ण गीत, यह तय करना आवश्यक
देवानंद सिंह
लोकसभा में सोमवार से शुरू हुई ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पर हुई बहस सिर्फ एक गीत की चर्चा नहीं थी, यह भारत की राजनीति, इतिहास और साम्प्रदायिक तनावों के कई परतदार प्रश्नों को सामने लाने वाली बहस थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण से इसकी शुरुआत की और चर्चा को सीधे उस ऐतिहासिक मोड़ तक पहुंचाया, जहां ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर विभिन्न दृष्टिकोण टकराते दिखे। विपक्ष ने भी इस अवसर को छोड़ नहीं दिया और आरएसएस की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका से लेकर वर्तमान आर्थिक-सामाजिक संकटों तक, कई सवाल उठाए। इस बहस ने साफ कर दिया कि 150 वर्षों पुराना गीत आज भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है और इतिहास की व्याख्याएं आज भी सत्ता और विपक्ष की दृष्टियों में बंटी हुई हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में तर्क दिया कि ‘वंदे मातरम्’ के साथ अन्याय हुआ, कि यह गीत जिसे महात्मा गांधी 1905 में नेशनल एंथम जैसा मानते थे, उस पर कांग्रेस ने दबाव में आकर समझौता कर लिया। मोदी के अनुसार, 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना के विरोध के बाद कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने न केवल प्रतिक्रिया में कड़े शब्दों का उपयोग नहीं किया बल्कि उल्टे ‘वंदे मातरम्’ की जांच शुरू कर दी।
पीएम ने नेहरू द्वारा सुभाष चंद्र बोस को लिखे पत्र का हवाला देते हुए कहा कि नेहरू ने माना कि ‘आनंद मठ’ की पृष्ठभूमि मुस्लिम समुदाय को उत्तेजित कर सकती है। मोदी के अनुसार, पांच दिन बाद 20 अक्टूबर नेहरू का यह पत्र आया और फिर 26 अक्टूबर को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में गीत के उपयोग की समीक्षा का निर्णय लिया गया। उनका दावा था कि यह निर्णय मुस्लिम लीग के दबाव में लिया गया समझौता था।
इतिहास की यह व्याख्या राजनीतिक रूप से सशक्त है, क्योंकि यह कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति वाले भाजपा के लंबे आरोप को पुनः पुष्ट करती है। प्रधानमंत्री ने इसे इतना आगे बढ़ाया कि कहा—कांग्रेस अगर मुस्लिम लीग के दबाव में ‘वंदे मातरम्’ के टुकड़े करने तक झुक सकती है, तो यह वही झुकाव था जिसने आगे चलकर भारत के बंटवारे को भी जन्म दिया। यह एक सीधी ऐतिहासिक रेखा खींचने का प्रयास था, जो राजनीतिक भाषा में प्रभावी भले हो, पर इतिहास की जटिलताओं को सरल भी कर देता है।
मोदी ने इंडियन ओपिनियन में 2 दिसंबर 1905 को प्रकाशित गांधी के लेख से उद्धरण दिया, जिसमें गांधी ने इसे नेशनल एंथम जैसा बताया था। गांधी के अनुसार यह गीत महान भावनाओं और देशभक्ति जगाने की क्षमता से भरा था। यह उद्धरण इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा अक्सर गांधी की नैतिक वैधता का उपयोग कर अपने राष्ट्रवादी तर्कों को बल देने की कोशिश करती है, भले ही आरएसएस और गांधी के रिश्ते इतिहास में जटिल रहे हों।
पर यह भी तथ्य है कि गांधी ने बाद में, 1930 और 1940 के दशक में, मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आपत्तियों को लेकर अधिक संवेदनशील रुख अपनाया था। उन्होंने स्वीकृति दी थी कि अगर गीत के कुछ हिस्सों को कुछ समूह आपत्तिजनक मानते हैं, तो इसे बलपूर्वक थोपना उचित नहीं। यह बात मोदी के भाषण में अनुपस्थित थी, लेकिन राजनीतिक रणनीति अक्सर चयनित इतिहास पर टिकी होती है।
मोदी ने आगे ‘वंदे मातरम्’ की 50वीं और 100वीं वर्षगांठ को क्रमशःगुलामी और आपातकाल से जोड़ते हुए कहा कि जब गीत अपनी शताब्दी पर था, तब देश संविधान का गला घोंटने वाले कालखंड से गुजर रहा था। यह बयान स्पष्ट रूप से इंदिरा गांधी और कांग्रेस को याद दिलाने का प्रयास था कि राष्ट्रवादी प्रतीकों का अपमान एक प्रकार की परंपरा रही है। भाजपा के अनुसार, जिसकी जड़ें कांग्रेस की सोच में छिपी हैं।
यह एक राजनीतिक ढांचा खड़ा करने का प्रयास था जिसमें ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि कांग्रेस की ‘कथित गलतियों’ का प्रतीक बना दिया गया। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद विपक्ष ने भी अपनी बात बेझिझक रखी। कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने साफ कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा कांग्रेस ने ही दिया था, और संविधान सभा में मुस्लिम लीग के प्रस्ताव को कांग्रेस ने ठुकराया था। गोगोई ने याद दिलाया कि राजेंद्र प्रसाद से लेकर मौलाना आजाद तक, विविध विचारों वाले नेताओं ने एक स्वर में निर्णय लिया था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय गीत।
गोगोई का प्रतिवाद इतिहास की दूसरी धारा को रेखांकित करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने राष्ट्रीय प्रतीकों को काफी संतुलन के साथ आगे बढ़ाया और वह विभाजनकारी राजनीति के शोर में नहीं बह गई। प्रियंका गांधी ने इस बहस की टाइमिंग पर सवाल उठाया। उनके अनुसार, यह बहस देश का ध्यान वास्तविक संकटों बेरोज़गारी, महंगाई, पेपर लीक, महिलाओं की सुरक्षा, आरक्षण में हस्तक्षेप से भटकाने का प्रयास है।
उन्होंने पीएम मोदी की तुलना नेहरू से करते हुए कहा कि नेहरू जितने साल देश के प्रधानमंत्री नहीं रहे, उससे ज्यादा साल जेल में रहे, और यदि आज इसरो, डीआरडीओ, IITs, AIIMS मौजूद हैं तो उसके पीछे नेहरू की दूरदर्शिता है। प्रियंका के शब्दों में यह इतिहास का पुनर्स्मरण था जो विपक्ष आज के राजनीतिक विमर्श में लगातार स्थापित करना चाह रहा है कि आधुनिक भारत की नींव कांग्रेस ने रखी। असदुद्दीन ओवैसी का भाषण इस बहस को एक नए धार्मिक-संवैधानिक स्तर पर ले गया। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का अनिवार्य गायन संविधान के खिलाफ है, क्योंकि भारत मदर इंडिया की अवधारणा से नहीं बल्कि हम भारत के लोग से शुरू होता है।
ओवैसी ने दावा किया कि बाबा साहेब आंबेडकर ने भी ‘मदर इंडिया’ जैसी प्रतीकात्मक राष्ट्र-उपमाओं को खारिज किया था। उनकी दलील थी कि किसी नागरिक की राष्ट्रभक्ति का मापदंड धार्मिक अनुष्ठान जैसे प्रतीकों में नहीं बंधा होना चाहिए। इस तर्क से बहस एक गीत से आगे जाकर भारतीय राष्ट्रवाद और संवैधानिक नागरिकता की प्रकृति पर छू गई। यह प्रश्न बेहद गंभीर और आधुनिक है कि क्या राष्ट्र की एकमात्र परिभाषा सांस्कृतिक-भावनात्मक प्रतीकों से तय होती है, या संविधान आधारित नागरिकता से? संसद के बाहर और भीतर, कई नेताओं, विशेषकर प्रमोद तिवारी और इमरान मसूद ने सवाल किया कि स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की भूमिका क्या थी? प्रमोद तिवारी ने पूछा कि जब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था, तब आरएसएस की मातृ संस्था ने युवाओं से अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने की अपील क्यों की? यह आरोप लंबे समय से कांग्रेस और वाम दल लगाते रहे हैं कि आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया। मसूद ने टैगोर की भूमिका का हवाला देकर कहा कि वंदे मातरम् के दो पैरा टैगोर ने ही चुने थे, और यदि मोदी ऐतिहासिक बहस छेड़ना चाहते हैं तो उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि आधा-अधूरा इतिहास प्रस्तुत करने से एक वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ता है, सत्य नहीं।
‘वंदे मातरम्’ की 150वीं जयंती पर बहस होना स्वाभाविक था, पर जिस रूप में यह हुई, उसमें यह स्पष्ट था कि यह महज़ सांस्कृतिक चर्चा नहीं बल्कि राजनीति का विस्तार थी। प्रधानमंत्री का उद्देश्य इस गीत को राष्ट्रीय आत्मगौरव से जोड़ते हुए कांग्रेस पर ऐतिहासिक “विश्वासघात” का आरोप स्थापित करना था। विपक्ष ने इसे पलटकर यह प्रश्न खड़ा किया कि राष्ट्रवाद की व्याख्या का एकाधिकार किसी एक पार्टी के पास नहीं हो सकता। साथ ही यह भी कि वर्तमान की असल चुनौतियों को इतिहास की बहस के पीछे छिपाना लोकतांत्रिक विमर्श के साथ न्याय नहीं।
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास उतना ही जटिल है जितना भारत स्वयं। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंद मठ’ में उसका उद्भव, स्वदेशी आंदोलन में उसकी केंद्रीय भूमिका, 1905 से 1947 तक उसका राजनीतिक-धार्मिक संघर्ष, संविधान सभा में उसके सम्मानजनक लेकिन संतुलित स्थान का निर्धारण—यह सब किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं था। आज जब यह गीत फिर से देश की संसद में बहस का विषय बना, तब मूल प्रश्न यही रहा कि क्या हम इतिहास को समझने के लिए चर्चा कर रहे हैं, या इतिहास को हथियार बनाकर वर्तमान राजनीति को तेज़ करने के लिए?
‘वंदे मातरम्’ भारत की आत्मा में है, पर आत्मा को कभी किसी एक विचारधारा का निजी क्षेत्र नहीं बनने दिया जा सकता। इसके 150 वर्ष पूरे होने पर सबसे जरूरी यह था कि हम उन संघर्षों को याद करते जिनसे होकर भारतीय राष्ट्रवाद की विविधता बनी, लेकिन संसद की बहस में यह अवसर फिर से राजनीति की तेज़ धूप में पिघल गया। देश को यह तय करना है कि ‘वंदे मातरम्’ एक राजनीतिक आरोप-पत्र बना रहेगा या राष्ट्रीय स्मृति का गर्वपूर्ण गीत।

