पप्पू यादव–कन्हैया कुमार की अनदेखी महागठबंधन की मजबूरी या चुनौती ?
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों, व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व और गठबंधन की पेचीदगियों का अखाड़ा रही है। यहां हर चुनाव सिर्फ विकास बनाम पिछड़ेपन का प्रश्न नहीं होता, बल्कि यह तय करता है कि कौन-सा सामाजिक समूह किस दल के पीछे खड़ा है, और किस नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता चुनावी परिणामों को मोड़ सकती है। ऐसे परिदृश्य में जब पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव और कांग्रेस के युवा नेता कन्हैया कुमार जैसे दमदार नेताओं को महागठबंधन (राजद-कांग्रेस-लेफ्ट) में दरकिनार किया जाता है, तो यह केवल रणनीतिक चूक नहीं बल्कि सत्ता समीकरण की मजबूरी भी प्रतीत होती है। दरअसल, बिहार के वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में महागठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती है लालू प्रसाद यादव परिवार का वर्चस्व और कांग्रेस के अंदर पुराने बनाम युवा नेताओं की खींचतान। पप्पू यादव और कन्हैया कुमार, दोनों ही नेताओं में भीड़ खींचने और जनता से सीधा संवाद करने की वह क्षमता है, जो तेजस्वी यादव या कांग्रेस के परंपरागत नेतृत्व के लिए स्वाभाविक चुनौती पैदा करती है। यही वजह है कि महागठबंधन की राजनीति में इन दोनों की भूमिका लगातार हाशिए पर धकेली जाती रही है।

पूर्णिया सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प रही है। उन्होंने बिना किसी राजनीतिक वंश के सहारे अपनी जमीन बनाई।1990 में पहली बार सिंघेश्वर से निर्दलीय विधायक बने।
1991, 1996 और 1999 में निर्दलीय सांसद रहे। 2004 और 2014 में राजद और कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। 2024 में फिर एक बार निर्दलीय होकर पूर्णिया से संसद पहुंचे। यह राजनीतिक निरंतरता बताती है कि पप्पू यादव किसी भी दल के प्रतीक मात्र नहीं हैं, बल्कि उनकी जनाधार आधारित राजनीति ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। सीमांचल, मधेपुरा, कटिहार और सहरसा जैसे इलाकों में वे सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि संकट के समय जनता के संकटमोचक के तौर पर देखे जाते हैं। बाढ़, महामारी या सामाजिक अन्याय, हर स्थिति में पप्पू यादव सीधे जनता के बीच रहे। यही छवि राजद और कांग्रेस के परंपरागत नेतृत्व को असहज करती है। तेजस्वी यादव को लगता है कि अगर, पप्पू को गठबंधन में ज्यादा जगह दी गई तो उनका प्रभाव सीमांचल से पूरे बिहार में फैल सकता है, और यह राजद के नेतृत्व की धार को कुंद कर देगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को डर है कि पप्पू की सक्रियता से प्रदेश कांग्रेस पर उनका पकड़ ढीला पड़ जाएगा, क्योंकि पप्पू पहले ही अपनी पत्नी रंजीत रंजन के माध्यम से पार्टी में मजबूत कड़ी रखते हैं।

वहीं, दूसरी तरफ कन्हैया कुमार की पहचान एक छात्रनेता के तौर पर बनी। जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रहते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए। वामपंथी राजनीति की पृष्ठभूमि से आने वाले कन्हैया ने 2019 का बेगूसराय चुनाव भले ही हार दिया हो, लेकिन उस चुनाव में उन्होंने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बटोरी, उसने उनकी राजनीतिक हैसियत स्थापित कर दी। 2021 में जब वे कांग्रेस में शामिल हुए और उन्हें भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ का प्रभारी बनाया गया, तो यह साफ हो गया कि कांग्रेस उन्हें भविष्य का चेहरा बनाना चाहती है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें प्रभारी बनाकर कांग्रेस ने प्रयोग भी किया, लेकिन यह प्रयोग महागठबंधन की राजनीति में खटास पैदा कर गया।

राजद के लिए यह असहज स्थिति थी कि बिहार में युवा राजनीति का चेहरा केवल तेजस्वी न रहकर कन्हैया भी बनें। खासकर, इसलिए कि कन्हैया कुमार भूमिहार ब्राह्मण जैसे सवर्ण समुदाय से आते हैं, जो पारंपरिक तौर पर राजद से दूरी रखता रहा है। अगर, यह समुदाय कन्हैया के नेतृत्व में कांग्रेस की ओर आकर्षित होता है तो राजद की जातीय राजनीति की पकड़ ढीली पड़ सकती है। यही वजह है कि कन्हैया को भी महागठबंधन के बड़े मंचों से दूर रखा जाता रहा है। राजद सुप्रीमो लालू यादव की राजनीति का केंद्रीय बिंदु हमेशा से सामाजिक न्याय और यादव-मुस्लिम गठजोड़ रहा है, लेकिन पप्पू यादव और कन्हैया कुमार दोनों ही इस समीकरण से बाहर निकलकर व्यापक जनाधार बनाने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि लालू यादव और उनके परिवार को लगता है कि इन नेताओं की मजबूती सीधे-सीधे तेजस्वी यादव की राजनीति को चुनौती देगी। दूसरी ओर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सोच भी लगभग वैसी ही है। उन्हें डर है कि कन्हैया कुमार को आगे बढ़ाने से प्रदेश कांग्रेस उनके हाथ से निकल जाएगी, और नई पीढ़ी के नेता पार्टी पर हावी हो जाएंगे। यही डर पप्पू यादव को कांग्रेस में लाने की संभावना को भी कमजोर करता है। महागठबंधन की यह रणनीति कि पप्पू और कन्हैया को हाशिए पर रखकर केवल पारंपरिक नेतृत्व पर भरोसा किया जाए, वास्तव में एनडीए के लिए अवसर पैदा करती है।

सीमांचल क्षेत्र में पप्पू यादव का दबदबा है। अगर, उन्हें दरकिनार किया गया तो वे स्वतंत्र रूप से या किसी अन्य रणनीति के तहत चुनाव लड़कर महागठबंधन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कन्हैया कुमार की भाषण कला और वैचारिक स्पष्टता का आकर्षण खासकर पढ़े-लिखे युवाओं और शहरी मतदाताओं पर है। इन्हें अलग-थलग करने से कांग्रेस का आधार कमजोर होता है। भूमिहार और अन्य सवर्ण समुदाय, जो सामान्यतः बीजेपी की ओर झुकते हैं, कन्हैया की वजह से कांग्रेस के करीब आ सकते थे। लेकिन उनके साइड लाइनिंग से यह संभावना कमजोर हो जाती है। अगर, महागठबंधन इन नेताओं की उपेक्षा करता रहा तो एनडीए को सीधा फायदा मिलेगा। सीमांचल और कोसी इलाके में पप्पू यादव का वोटबैंक अगर, महागठबंधन से अलग हुआ तो यहां एनडीए की जीत आसान हो सकती है। कन्हैया कुमार को किनारे करने से बेगूसराय, लखीसराय, मुंगेर और समस्तीपुर जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस की पकड़ कमजोर होगी। इसका लाभ बीजेपी उठा सकती है, क्योंकि इन इलाकों में सवर्ण और युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

ऐसे में, महागठबंधन अगर, वाकई सत्ता परिवर्तन का गंभीर विकल्प बनना चाहता है तो उसे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठना होगा। पप्पू यादव को सीमांचल में महागठबंधन का चेहरा बनाना चाहिए। कन्हैया कुमार को युवाओं और सवर्ण वोटरों के बीच कांग्रेस का ब्रांड एंबेसडर बनने का मौका देना चाहिए। लालू यादव और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को यह समझना होगा कि नेतृत्व सिर्फ वंशवाद या परंपरा से नहीं आता, बल्कि जनता से सीधे संवाद करने की क्षमता से आता है। अगर, ऐसा नहीं हुआ तो महागठबंधन केवल जातीय समीकरणों और अतीत की विरासत के भरोसे रह जाएगा, जबकि बीजेपी लगातार संगठन, संसाधन और मोदी फैक्टर के सहारे अपना जनाधार मजबूत कर रही है।

कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति इस समय दो ध्रुवों में बंटी हुई है। एक ओर एनडीए है, जो अपने जातीय समीकरणों और केंद्र सरकार की नीतियों पर सवार है। दूसरी ओर महागठबंधन है, जो सामाजिक न्याय और विपक्षी एकता की बात करता है, लेकिन महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह अपने ही दमदार नेताओं को स्वीकार करने से डर रहा है। पप्पू यादव की जमीनी पकड़ और कन्हैया कुमार की बौद्धिक अपील को नजरअंदाज करना महागठबंधन के लिए राजनीतिक आत्मघात जैसा होगा। सत्ता परिवर्तन की संभावना तभी मजबूत होगी जब गठबंधन व्यक्तिगत असुरक्षा और वर्चस्व की राजनीति से ऊपर उठकर इन नेताओं को अपनी ताकत के रूप में देखे। वरना आने वाले चुनावों में यह रणनीतिक भूल सीधे-सीधे एनडीए के पक्ष में जाएगी और महागठबंधन केवल आंतरिक खींचतान में उलझा रह जाएगा।

