ईरान अमेरिका संबंध हमेशा से पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध इसके ऐतिहासिक उदाहरण हैं।
देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया में हालिया सैन्य टकराव और ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन की चर्चाओं के बीच इतिहास के वे पन्ने फिर से खुल रहे हैं, जिनका संबंध सीधे तौर पर दक्षिण एशिया की राजनीति और भारत-पाकिस्तान संबंधों से रहा है। आज जब अमेरिका और ईरान आमने-सामने दिखते हैं, तब यह तथ्य चौंकाता है कि एक दौर ऐसा भी था जब वॉशिंगटन और तेहरान रणनीतिक साझेदार थे और उसी साझेदारी का प्रभाव 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में स्पष्ट रूप से देखा गया।
1941 से 1979 तक ईरान पर शासन करने वाले शाह मोहम्मद रजा पहलवी अमेरिका के करीबी सहयोगी माने जाते थे। शीत युद्ध के दौर में ईरान अमेरिका के लिए पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्तंभ था। सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ने ईरान को सैन्य और आर्थिक सहायता दी, जिसके बदले में ईरान ने अमेरिकी नीतियों के अनुरूप क्षेत्रीय भूमिका निभाई। इसी संदर्भ में पाकिस्तान के साथ ईरान की निकटता भी समझी जानी चाहिए।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान को पश्चिमी देशों से सैन्य उपकरण प्राप्त करने में कठिनाई आने लगी। प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ईरान ने एक ‘आर्म्स परचेजिंग एजेंट’ की भूमिका निभाई। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, ईरान ने पश्चिम जर्मनी के माध्यम से लड़ाकू विमान, मिसाइलें, तोपखाना और गोला-बारूद खरीदे, जिन्हें बाद में पाकिस्तान तक पहुंचाया गया। इस प्रक्रिया में ईरान ने न केवल पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को बनाए रखने में मदद की, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय अलगाव से उबारने का भी प्रयास किया।
1971 का युद्ध तो और भी निर्णायक था। पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक असंतोष, दमन और उसके बाद भारत के हस्तक्षेप ने हालात को तेजी से बदल दिया। भारतीय सेना की निर्णायक बढ़त और कराची बंदरगाह पर हमलों ने पाकिस्तान की सैन्य स्थिति को कमजोर कर दिया था। ऐसे समय में अमेरिका की चिंता बढ़ी, क्योंकि पाकिस्तान शीत युद्ध में उसका सहयोगी था। अमेरिकी प्रशासन के उच्च स्तर पर हुई चर्चाओं से संकेत मिलता है कि पाकिस्तान को सहायता पहुंचाने के लिए ईरान को एक माध्यम के रूप में देखा गया।
बताया जाता है कि अमेरिका ने ईरान को आश्वस्त किया कि यदि वह पाकिस्तान को सैन्य सहायता उपलब्ध कराएगा, तो उसकी भरपाई वॉशिंगटन करेगा। ईरान ने हेलीकॉप्टर और अन्य सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने पर सहमति जताई, हालांकि वह सीधे तौर पर अपने विमान और पायलट भेजने के जोखिम को लेकर सतर्क था। उस समय भारत और सोवियत संघ के बीच मैत्री संधि हो चुकी थी, और शाह सोवियत संघ से टकराव नहीं चाहते थे। यह संतुलन साधने की कूटनीति थी एक ओर अमेरिकी अपेक्षाएं, दूसरी ओर क्षेत्रीय जोखिम।
इन घटनाओं का विश्लेषण करते समय यह समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति स्थायी मित्रता या स्थायी शत्रुता पर नहीं, बल्कि स्थायी हितों पर आधारित होती है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। अमेरिका के साथ उसके संबंध शत्रुतापूर्ण हो गए और दक्षिण एशिया में उसका रुख भी बदला। भारत और ईरान के बीच ऊर्जा, व्यापार और सामरिक सहयोग के नए आयाम खुले। चाबहार बंदरगाह जैसे प्रकल्प इसका उदाहरण हैं।
आज की परिस्थितियों में जब पश्चिम एशिया फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है या उसकी विदेश नीति में बड़ा बदलाव आता है, तो क्या दक्षिण एशिया के समीकरण भी बदलेंगे? क्या पाकिस्तान फिर किसी नए या पुराने गठजोड़ के जरिए सामरिक संतुलन साधने की कोशिश करेगा? और भारत के लिए इसके क्या निहितार्थ होंगे?
इतिहास यह संकेत देता है कि पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की राजनीति अलग-अलग नहीं चलती। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्ग, सामरिक गठजोड़ और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ये सभी कारक दोनों क्षेत्रों को आपस में जोड़ते हैं। 1965 और 1971 के युद्धों में ईरान की भूमिका यह दर्शाती है कि क्षेत्रीय संघर्षों में बाहरी शक्तियों का प्रभाव कितना गहरा हो सकता है।
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इतिहास को भावनात्मक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा जाए। किसी भी देश की उस समय की नीतियां उसके तत्कालीन भू-राजनीतिक दबावों और रणनीतिक हितों का परिणाम होती हैं। शाह का ईरान अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में था; इस्लामी गणराज्य ईरान एक अलग विचारधारा और प्राथमिकताओं के साथ काम करता है। इसी प्रकार पाकिस्तान और भारत की आंतरिक व बाहरी परिस्थितियां भी समय के साथ बदली हैं।
वर्तमान परिदृश्य में भारत के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता संतुलित और बहु-आयामी कूटनीति की है। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और संपर्क परियोजनाएं इन दोनों के बीच संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण अवश्य है, परंतु अनिवार्य भी। दक्षिण एशिया की स्थिरता केवल द्विपक्षीय समीकरणों से नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय संतुलन से तय होगी।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि शक्ति संतुलन और गठजोड़ समय के साथ बदलते रहते हैं। जो देश आज विरोधी दिखते हैं, वे कभी सहयोगी रहे होते हैं, और जो आज सहयोगी हैं, वे कल अलग राह पकड़ सकते हैं। इसलिए वर्तमान की नीति-निर्माण प्रक्रिया में अतीत की समझ तो आवश्यक है, परंतु उससे बंधे रहना नहीं। बदलती वैश्विक राजनीति में विवेकपूर्ण, व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों पर आधारित दृष्टिकोण ही स्थिरता और सम्मान की गारंटी दे सकता है।

