पाकिस्तान और बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकियों को हल्के में न ले भारत देवानंद सिंह
दक्षिण एशिया की राजनीति में इतिहास कभी बीता हुआ अध्याय नहीं होता, बल्कि समय-समय पर वह नए रूप में वर्तमान के सामने खड़ा हो जाता है। बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्ते इसी ऐतिहासिक स्मृति के बोझ तले दशकों से दबे रहे हैं। 1971 का मुक्ति युद्ध केवल एक भू-राजनीतिक विभाजन नहीं था, बल्कि वह विचारधाराओं, पहचान और राष्ट्रवाद के टकराव की परिणति था। यही कारण है कि बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान ने पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार के संबंध को मान्यता, पश्चाताप और राजनीतिक स्वीकार्यता से जोड़ा।
शेख़ मुजीब-उर रहमान का रुख़ पाकिस्तान को लेकर अत्यंत कठोर था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि जब तक पाकिस्तान औपचारिक रूप से बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं करता, तब तक संवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, जो उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति और बाद में प्रधानमंत्री बने, मुजीब से संवाद चाहते थे, लेकिन मान्यता के प्रश्न पर पाकिस्तान वर्षों तक टालमटोल करता रहा।
यह स्थिति 1974 में अचानक बदली, जब लाहौर में ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। भुट्टो ने न केवल मुजीब-उर रहमान को आमंत्रण भेजा, बल्कि सम्मेलन के दौरान ही बांग्लादेश को मान्यता देने की घोषणा कर दी। यह घोषणा धार्मिक भावनाओं से लिपटी हुई थी, लेकिन इसके पीछे रणनीतिक विवशता भी साफ़ झलकती थी। इस्लामी दुनिया में अलग-थलग पड़ चुका पाकिस्तान बांग्लादेश को नज़रअंदाज़ करने की स्थिति में नहीं था। फिर भी, इस औपचारिक मान्यता के बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ़ कभी पूरी तरह नहीं पिघली। 1971 की स्मृतियां, युद्ध अपराधों का प्रश्न और वैचारिक टकराव लगातार रिश्तों पर साया बने रहे।
आज, क़रीब पांच दशक बाद, वही इतिहास एक नए मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। शेख़ हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में जो शून्य पैदा हुआ है, उसने न केवल आंतरिक सत्ता संतुलन को बदला है, बल्कि क्षेत्रीय समीकरणों को भी झकझोर दिया है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच अचानक बढ़ती सरगर्मियां इसी बदले हुए राजनीतिक माहौल की उपज हैं।
शेख़ हसीना का जाना सिर्फ़ एक सरकार का अंत नहीं था, बल्कि वह उस राजनीतिक विचारधारा के कमजोर पड़ने का संकेत था, जिसने 1971 के मुक्ति युद्ध को बांग्लादेशी राष्ट्रवाद की केंद्रीय धुरी बनाए रखा था। इसके बाद जो उभार देखने को मिला, उसमें इस्लामी दलों की भूमिका लगातार मज़बूत होती चली गई।
इंक़लाब मंच के युवा नेता उस्मान हादी की हत्या, ढाका में एक हिंदू मज़दूर की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या, और इन घटनाओं के बाद फैली अफ़वाहों ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को और अधिक विषाक्त बना दिया। हालात यहां तक पहुंच गए कि दोनों देशों ने वीज़ा सेवाओं को अस्थायी रूप से रोक दिया। इन घटनाओं के बीच पाकिस्तान की प्रतिक्रियाएं भी अनदेखी नहीं की जा सकतीं। जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान के पूर्व अमीर सिराज-उल हक़ द्वारा बांग्लादेशी युवाओं की खुले तौर पर प्रशंसा करना और अखंड भारत के विचार को ध्वस्त करने की बात कहना महज़ एक बयान नहीं था, बल्कि बदलते वैचारिक गठजोड़ का संकेत था।
अफ़वाहें, आक्रोश और कूटनीतिक दरार उस्मान हादी की हत्या के बाद यह अफ़वाह फैलना कि हमलावर बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के भारत भाग गए हैं, यह इस बात को दर्शाता है कि बांग्लादेशी समाज में भारत को लेकर संदेह और असंतोष किस हद तक गहराता जा रहा है। भारतीय राजनयिक मिशनों के सामने हुए प्रदर्शन इस असंतोष की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति थे। भारत ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए अंतरिम सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाए, लेकिन ढाका-दिल्ली के बीच संवाद की कमी ने हालात को और उलझा दिया। विश्वास का वह ढांचा, जो वर्षों तक शेख़ हसीना और अवामी लीग के माध्यम से कायम था, उनके सत्ता से हटते ही ढह गया।
पाकिस्तान-बांग्लादेश की नई नजदीकियां इन राजनीतिक घटनाओं के समानांतर पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच व्यावहारिक रिश्तों में भी तेज़ी से बदलाव आया। 1971 के बाद पहली बार दोनों देशों के बीच सीधा समुद्री संपर्क स्थापित हुआ। कराची से चटगांव पहुंचा पाकिस्तानी कार्गो पोत केवल व्यापारिक घटना नहीं थी, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी था कि दोनों देश अतीत की बाधाओं को दरकिनार करने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेशी नागरिकों के लिए वीज़ा प्रक्रिया को सरल बनाना, जमात-ए-इस्लामी के वैचारिक मेल और राजनीतिक समर्थन, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती आपसी बातचीत, ये सभी संकेत बताते हैं कि यह नज़दीकी आकस्मिक नहीं है।
जमात-ए-इस्लामी और इतिहास की पुनर्व्याख्या
सबसे अहम प्रश्न यह है कि बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी के उभार का क्या अर्थ है। यह वही संगठन है जिसने 1971 में मुक्ति युद्ध का विरोध किया था और पाकिस्तान की सेना के साथ सहयोग के आरोप झेले थे। आज वही संगठन मुक्ति युद्ध के इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।
जमात-ए-इस्लामी के नेता शफ़ीक़ुर रहमान के बयान इस वैचारिक बदलाव को स्पष्ट करते हैं कि जहां 1971 को ‘भारत के हित में हुई आज़ादी’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और भाषायी राष्ट्रवाद पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
यही वह बिंदु है, जहां बांग्लादेश की राष्ट्रीय पहचान एक नए संघर्ष से गुज़र रही है। बांग्ला राष्ट्रवाद, जिसने इस देश को जन्म दिया, अब इस्लामी पहचान के दबाव में है। यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है।
भारतीय विश्लेषकों के अनुसार, भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ता तनाव सीधे तौर पर भारत की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा है। 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा, सीमा-पार घुसपैठ की आशंका, और भारत-विरोधी तत्वों के लिए संभावित सुरक्षित ठिकाने, ये सभी जोखिम एक साथ उभर रहे हैं। पाकिस्तान और चीन की सक्रियता इस चिंता को और बढ़ा देती है। कुनमिंग में हुई त्रिपक्षीय बैठक और पाकिस्तानी नौसेना की चटगांव यात्रा इस बात का संकेत हैं कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के लिए अनुकूल दिशा में नहीं बढ़ रहा।
इस पूरे परिदृश्य में भारत की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्या भारत ने बांग्लादेश को केवल शेख़ हसीना और अवामी लीग के चश्मे से देखा? क्या उसने अन्य राजनीतिक और सामाजिक ताक़तों से संवाद स्थापित करने की कोशिश की? यह आलोचना केवल ढाका से नहीं, बल्कि भारतीय अकादमिक जगत से भी आ रही है। चीन का उदाहरण सामने है, जो सरकार बदलने के बावजूद अपने हितों और संपर्कों को बनाए रखता है।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश का निर्माण भाषायी राष्ट्रवाद की बुनियाद पर हुआ था, लेकिन वह राष्ट्रवाद कभी इस्लाम विरोधी नहीं था। आज जो संकट दिखाई दे रहा है, वह उसी संतुलन के टूटने का परिणाम है। इतिहास गवाह है कि जब पहचान के प्रश्न पर राजनीति हावी होती है, तो उसके परिणाम दूरगामी होते हैं। बांग्लादेश में चल रही वैचारिक खींचतान केवल उसका आंतरिक मामला नहीं है। इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, दक्षिण एशिया की स्थिरता और क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ेगा। सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश करीब आ रहे हैं या नहीं। सवाल यह है कि किस विचारधारा के आधार पर यह नज़दीकी आकार ले रही है। इतिहास ने एक बार दक्षिण एशिया को बांटा था। आज वही इतिहास चेतावनी दे रहा है कि अगर, सबक़ नहीं लिए गए, तो भूगोल भले न बदले, लेकिन अस्थिरता की रेखाएं और गहरी हो सकती हैं।

