लेखक: राष्ट्र संवाद
मुंबई/इंद्र यादव/महाराष्ट्र में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राज्यसभा सांसद संजय राउत ने उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक पत्र लिखकर पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका में स्कूली बच्चों के लिए खरीदे गए सामान में भारी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। इस गंभीर आरोप के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया है और विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है।
पिंपरी-चिंचवड में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
सांसद संजय राउत के अनुसार, पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका ने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के बच्चों के लिए गणवेश (यूनिफॉर्म), स्वेटर, मोजे, रेनकोट और स्कूल बैग खरीदे थे। आरोप है कि इस पूरी खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर धांधली हुई है। इस मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि गरीब बच्चों के लिए आवंटित धन का इस तरह से दुरुपयोग किया गया है।
संजय राउत ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि इस खरीद में नियमों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया। उन्होंने मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए ताकि दोषियों को सजा मिल सके। इस घोटाले की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, वैसे-वैसे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं, जो सीधे तौर पर बड़े राजनीतिक रसूखदारों की ओर इशारा करते हैं।
बिना टेंडर का खेल: नियमों का सरेआम उल्लंघन
बिना टेंडर का खेल: नियमों के अनुसार, अगर खरीद 3 लाख रुपये से अधिक की हो, तो ‘ई-टेंडर’ (ऑनलाइन निविदा) प्रक्रिया अपनाना जरूरी होता है। लेकिन यहाँ सोलापुर की ‘जगदंबा रेडिमेड ड्रेसेस’ नाम की सहकारी संस्था को बिना किसी टेंडर के सीधे काम दे दिया गया। इस प्रकार की अनियमितता सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है क्योंकि बिना किसी खुली प्रतिस्पर्धा के किसी एक विशेष संस्था को काम सौंपना पूरी तरह से गैरकानूनी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ई-टेंडरिंग प्रक्रिया को बायपास करना यह दर्शाता है कि पहले से ही तय रणनीति के तहत इस घोटाले को अंजाम दिया गया। पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका के इस कदम से पारदर्शी शासन व्यवस्था की धज्जियां उड़ गई हैं।
कीमतों में भारी अंतर और सरकारी खजाने की लूट
कीमतों में भारी अंतर: सुप्रीम कोर्ट ने स्कूली सामान के लिए प्रति छात्र 239 रुपये की दर तय की थी। इसके बावजूद, इस मामले में 814 रुपये प्रति छात्र के हिसाब से भुगतान किया गया। इस तरह, हर छात्र पर 575 रुपये अधिक वसूले गए, जिसे सीधे सरकारी खजाने की लूट बताया गया है। इतने बड़े पैमाने पर अतिरिक्त भुगतान करना बिना प्रशासनिक और राजनीतिक मिलीभगत के संभव नहीं हो सकता।
इस घोटाले की वजह से करदाताओं के पैसों का भारी नुकसान हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद इतनी अधिक दर पर भुगतान करना न्यायालय के आदेशों की भी खुली अवहेलना है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
कितना बड़ा है घोटाला! 400 करोड़ का भ्रष्टाचार
कितना बड़ा है घोटाला! संजय राउत के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में कुल 400 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई है। यह राशि कोई छोटी-मोटी राशि नहीं है, बल्कि यह उन गरीब बच्चों के हक का पैसा है जो नगर निगम के स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
सांसद ने आरोप लगाया है कि राज्य के मंत्रिमंडल में शामिल एक वरिष्ठ मंत्री ने पिंपरी-चिंचवड के पालिका आयुक्त पर दबाव डाला, जिसके चलते यह काम बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के संबंधित संस्था को दिया गया। इस आरोप से साफ है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाकर इस बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया है।
राउत का दावा है कि इस पूरे सौदे में लगभग 50 से 55 करोड़ रुपये का कमीशन मंत्रियों तक पहुँचा है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ वाले नारे का जिक्र करते हुए कहा कि यह सब शर्मनाक है! इस बयान ने भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के गठबंधन वाली सरकार को असहज कर दिया है क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार पर ही अब सीधे सवाल उठ रहे हैं।
उपमुख्यमंत्री से सख्त कार्रवाई की मांग
संजय राउत ने उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मांग की है कि.
इस मामले में शामिल संबंधित मंत्री और पालिका प्रशासन पर तुरंत सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक इस मामले में संलिप्त अधिकारियों और राजनेताओं पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक न्याय संभव नहीं है।
उन्होंने इस घोटाले से जुड़े सभी दस्तावेजी सबूत उपमुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दिए हैं। इन सबूतों में खरीद प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज, भुगतान की रसीदें और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की प्रति शामिल है। राउत का मानना है कि इन पुख्ता सबूतों के आधार पर सरकार को तुरंत कदम उठाना चाहिए और मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से करानी चाहिए।
सांसद ने साफ कहा है कि बच्चों के हक के सामान में ऐसा भ्रष्टाचार कतई स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका में हुई इस लूट ने पूरे महाराष्ट्र के प्रशासनिक ढांचे पर एक बड़ा दाग लगा दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विधानसभा सत्र में भी जोर-शोर से उठने की पूरी संभावना है।

