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    Home » दुुनिया में मंदीः भारत में आर्थिक मजबूती की रोशनी – ललित गर्ग
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    दुुनिया में मंदीः भारत में आर्थिक मजबूती की रोशनी – ललित गर्ग

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 11, 2026No Comments6 Mins Read
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    दुुनिया में मंदीः भारत में आर्थिक मजबूती की रोशनी – ललित गर्ग

    वैश्विक चुनौतियों, भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों, महामारी के पश्चात् बनी अस्थिरताओं, ऊर्जा संकट, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और महँगाई के दबावों के बीच जब दुनिया की अनेक बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ लड़खड़ा रही हैं, तब भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़े आँकड़े आशा, भरोसे और आत्मविश्वास की एक सशक्त किरण बनकर उभरे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नए आंकड़ों से स्पष्ट है लगभग 7.4 प्रतिशत की विकास दर पर कायम रहना केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई आर्थिक नीतियों की दृढ़ता, दूरदर्शिता, पारदर्शिता और संतुलन का प्रमाण है। जिसमें विनिर्माण, सेवाएं और सरकारी व्यय वृद्धि को गति मिलेगी। जाहिर है, इसका असर नौकरी, महंगाई, आमदनी, कर्ज, कर और सरकारी सुविधाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण इलाकों में कृषि से जुड़े रोजगार में बढ़ोतरी हो सकती है, जो यह संकेत देता है कि भारत न केवल वैश्विक अस्थिरताओं से स्वयं को बचाने में सक्षम रहा है, बल्कि अवसरों को साधकर अपनी विकास-यात्रा को निरंतर गति भी दे रहा है।

    आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाएँ मंदी और ऋण संकट से जूझ रही हैं, चीन की विकास गति में स्पष्ट सुस्ती दिखाई दे रही है, और अनेक विकासशील देशों पर ऋण, महंगाई तथा बेरोजगारी का बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसे वातावरण में भारत का अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक प्रदर्शन यह दर्शाता है कि बीते एक दशक में अपनाई गई नीतियां केवल तात्कालिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। मोदी सरकार ने आर्थिक सुधारों को केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करने का प्रयास किया, चाहे वह कर प्रणाली में सुधार हो, बुनियादी ढाँचे में निवेश हो या डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार। जिससे कर संग्रह और राजकोषीय घाटे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। व्यापक अर्थव्यवस्था और आगामी केंद्रीय बजट दोनों के दृष्टिकोण से यह अच्छी बात है। जीडीपी दर के समांतर महंगाई काबू में रहे तो केंद्रीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटा सकता है, जिसका सीधा असर कर्ज की किस्त पर पड़ सकता है। साथ ही, सरकार को मिलने वाला कर राजस्व बढ़ सकता है, जिससे ढांचागत और समाज कल्याण की योजनाओं पर खर्च बढ़ाया जा सकता है। शेयर बाजार में तेजी से म्यूचुअल फंड, भविष्य निधि आदि पर सकारात्मक असर हो सकता है। जीडीपी की दर 2024-25 में 6.5 फीसद की तुलना में अधिक है और यह मुख्य रूप से विनिर्माण और सेवाओं में वृद्धि के सुधार का नतीजा है।

     

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक दृष्टि का मूल आधार ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ रहा है। वस्तु एवं सेवा कर जैसे बड़े सुधारों ने भारतीय बाज़ार को एकीकृत किया, व्यापार को सुगम बनाया और कर-संग्रह की पारदर्शिता बढ़ाई। प्रारंभिक चुनौतियों के बावजूद, आज जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थायी आधार बन चुका है। इसके साथ ही दिवालियापन एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की स्थिति को मजबूत किया, जिससे फंसे हुए ऋणों की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगा। बैंकिंग प्रणाली की यह मजबूती ही है, जिसने निवेश और उद्यमिता को नई ऊर्जा दी है। मोदी सरकार की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि उसने घरेलू मांग को सशक्त बनाने पर विशेष ध्यान दिया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि क्षेत्र और मध्यम वर्ग को सहारा देने वाली योजनाओं ने उपभोग को बनाए रखा। बुनियादी ढाँचे में बड़े पैमाने पर निवेश ने न केवल रोज़गार के अवसर पैदा किए, बल्कि दीर्घकाल में उत्पादन और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने में भी मदद की। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क-इन सभी क्षेत्रों में हुए विस्तार ने भारत को एक अधिक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित किया है।

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक मजबूती का एक बड़ा कारण उसकी संतुलित विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ व्यावहारिक संबंध भी हैं। जहां एक ओर भारत ने विकसित देशों के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को सुदृढ़ किया, वहीं दूसरी ओर पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया। यह संतुलन भारत को बाहरी झटकों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रखता है। ऊर्जा, रक्षा, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए कदमों ने भी भारत की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत किया है। डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों ने भारत की अर्थव्यवस्था में नवाचार और उद्यमिता की नई लहर पैदा की। आज भारत दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल है। फिनटेक, हेल्थटेक, एग्रीटेक और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में हुए नवाचार न केवल घरेलू बाज़ार को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत की पहचान बना रहे हैं। डिजिटल भुगतान प्रणाली ने वित्तीय समावेशन को बढ़ाया, जिससे आर्थिक गतिविधियों का दायरा विस्तृत हुआ और पारदर्शिता में सुधार आया।

    महत्त्वपूर्ण यह भी है कि मोदी सरकार ने आर्थिक विकास को सामाजिक कल्याण से अलग नहीं किया। गरीबों, महिलाओं, युवाओं और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने वाली योजनाओं ने सामाजिक स्थिरता को बनाए रखा, जो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य होती है। सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति ने एक ऐसी नींव तैयार की, जिस पर टिकाऊ विकास संभव हो सका। यही कारण है कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारत की आंतरिक मांग और विश्वास कमजोर नहीं पड़ा। आज भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। यह स्थिति केवल वर्तमान उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का संकेत है। वर्ष 2047, जब भारत अपनी आज़ादी के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब दुनिया की सर्वाेच्च अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य अब केवल एक सपना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित यात्रा का परिणाम प्रतीत होता है। जनसांख्यिकीय लाभ, युवा शक्ति, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक स्थिरताकृये सभी तत्व भारत को इस लक्ष्य के करीब ले जा रहे हैं।

    निस्संदेह चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। वैश्विक परिस्थितियां कभी भी अचानक बदल सकती हैं, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक तनाव नई कठिनाइयां पैदा कर सकते हैं। लेकिन जिस आत्मविश्वास, अनुशासन और दूरदर्शिता के साथ भारत ने अब तक इन चुनौतियों का सामना किया है, वह यह भरोसा देता है कि देश आगे भी संतुलन बनाए रखते हुए प्रगति करता रहेगा। 7.4 प्रतिशत की विकास दर केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस उजली तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। निर्णायक नेतृत्व, दीर्घकालिक सोच और सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता ने भारत को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां संभावनाएं अनंत हैं। वैश्विक असंतुलन और अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूत बने रहना न केवल देशवासियों के लिए गर्व का विषय है, बल्कि दुनिया के लिए भी एक संदेश है कि स्थिरता, संतुलन और आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलकर कोई भी राष्ट्र वैश्विक चुनौतियों को अवसरों में बदल सकता है। यही भारत की आर्थिक यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और आने वाले दशकों की सबसे बड़ी आशा की किरण है। इन सब सकारात्मक स्थितियों के बावजूद जरूरत इस बात की भी है कि अर्थव्यवस्था की ठोस मजबूती के लिए उन पहलुओं पर भी गौर किया जाए, जिनकी अनदेखी हो रही है।

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