भारत को अपनी आर्थिक स्थिति टिकाऊ और विश्वसनीय बनाने के लिए मजबूत करना होगा इसका मौलिक ढांचा
देवानंद सिंह
भारत सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2025–26 की दूसरी तिमाही के लिए जारी किए गए ताज़ा आर्थिक आंकड़े पहली नज़र में बेहद चमकदार दिखाई देते हैं। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि, वह भी ऐसे समय में, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी गति, अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है, किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है। पिछले वर्ष इसी अवधि में ग्रोथ दर 5.6 प्रतिशत थी, ऐसे में यह उछाल स्पष्ट रूप से बताता है कि घरेलू मांग में सुधार हुआ है, उत्पादन बढ़ा है और कई प्रमुख सेक्टर उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष उतना उजला नहीं है। 1 दिसंबर 2025 को भारतीय रुपया 89.63 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो इतिहास के न्यूनतम स्तर के बेहद करीब है। पिछले वर्ष यह 84.22 तक गिरा था, और यदि पिछले चार वर्षों की प्रवृत्ति देखें, तो यह गिरावट लगातार और संरचनात्मक दिखाई देती है। 2021 में जो रुपया 72 के आसपास था, वह अब 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ने की दहलीज पर है।
यह विरोधाभास, तेज़ GDP ग्रोथ और लगातार गिरता रुपया भारत की आर्थिक सेहत के बारे में कई गहरे प्रश्न खड़े करता है। क्या केवल उच्च विकास दर से यह निष्कर्ष निकाल लेना पर्याप्त है कि अर्थव्यवस्था मजबूत है? और यदि हां, तो फिर विदेशी निवेशक भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं? आईएमएफ़ ने भारत के आर्थिक डेटा को ‘सी’ ग्रेड क्यों दिया? और सबसे महत्वपूर्ण रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा क्यों बन गया?
इन सवालों के जवाब सतह से नीचे छिपे उन आर्थिक तत्वों में मिलते हैं, जो मिलकर भारत की मौजूदा जटिल तस्वीर बनाते हैं। वित्त वर्ष 2025–26 में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 6.19 प्रतिशत गिर चुका है। पिछले एक महीने में ही इसमें 1.35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। मुद्रा बाज़ार के विशेषज्ञ इसे केवल अस्थायी उतार-चढ़ाव नहीं मानते, बल्कि इसे संरचनात्मक कमजोरी का संकेत बताते हैं।
जानकारों का कहना है कि इस गिरावट की जड़ें भारत की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्वसनीयता में आई कमी से जुड़ी हुई हैं। जानकारों के अनुसार, भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। एफ़डीआई और एफआईआई का बहिर्प्रवाह तेज़ हुआ है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी आर्थिक नीति में संरक्षणवाद बढ़ गया है।
इसी वर्ष 16 अरब डॉलर से अधिक का इक्विटी आउटफ्लो दर्ज हुआ है, जो बताता है कि विदेशी निवेशक भारत के बाजार को वर्तमान परिस्थितियों में कम सुरक्षित मान रहे हैं। पूंजी का यह बाहरी दबाव सीधे रुपये को कमजोर करता है। इसके अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई व्यापार नीति ने स्थिति को और उलझा दिया है। कई भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए जाने से भारत के निर्यात को चोट पहुंची है। इससे भारत का चालू खाता घाटा बढ़ा है, और कमजोर चालू खाता हमेशा स्थानीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाता है। ऊर्जा आयात महंगा हुआ है, इलेक्ट्रॉनिक्स और पूंजीगत वस्तुओं का बिल बढ़ा है, और डॉलर के मुकाबले रुपये की मांग स्वाभाविक रूप से घटी है।
जानकारों के अनुसार, रुपये की कमजोरी भारत की आर्थिक असंतुलनों की सीधी अभिव्यक्ति है, चाहे वह निर्यात हो, आयात, पूंजी प्रवाह हो या अमेरिका की व्यापार नीति। नवंबर 2025 में आईएमएफ़ ने भारत के डेटा सिस्टम को सी ग्रेड दिया, जो किसी भी बड़े अर्थतंत्र के लिए बहुत गंभीर चेतावनी है। इस ग्रेड का सरल अर्थ है डेटा अपूर्ण, असंगत और आर्थिक निगरानी के लिए अनुपयुक्त है।
जीडीपी का आधार वर्ष 2011–12 है, और इसे अद्यतन किए हुए लगभग 14 वर्ष हो चुके हैं। असंगठित क्षेत्र, जो भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा है, उसके आंकड़े बेहद सीमित और अप्रत्यक्ष तरीकों से प्राप्त होते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और श्रम बाजार के आंकड़ों में भी अद्यतन की कमी है। राज्य और स्थानीय निकायों के वित्तीय आंकड़े 2019 के बाद से उपलब्ध नहीं हैं।
उत्पादन आधारित और व्यय आधारित जीडीपी के बीच गंभीर असंगति है। आईएमएफ़ की चिंता यह है कि यदि डेटा विश्वसनीय नहीं है, तो भारत की आर्थिक स्थिति का सटीक मूल्यांकन संभव नहीं है। यह स्थिति विदेशी निवेशकों, रेटिंग एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के विश्वास को कमजोर करती है। यही कारण है कि भारत के 8.2 प्रतिशत की तेज़ वृद्धि दर का दावा भी संदिग्ध नज़र आता है। जब डेटा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न हो, तो किसी भी आंकड़ा की चमक फीकी पड़ जाती है।
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि घरेलू संकेतक, विशेषकर उपभोग और उत्पादन, मजबूत नज़र आ रहे हैं। अर्थशास्त्री कहते हैं कि महंगाई में कमी, विवेकाधीन खर्च में वृद्धि, ग्रामीण और शहरी मांग में सुधार, इन सभी कारकों ने भारत की विकास दर को मजबूती दी है। इसी कारण क्रिसिल ने 2025–26 के लिए भारत की ग्रोथ का अनुमान 6.5% से बढ़ाकर 7% कर दिया है, लेकिन विदेशी निवेशक भारत में बने रहने के बजाय पैसा निकाल रहे हैं, जो विरोधाभासी लग सकता है। इसका उत्तर भारत की आंतरिक स्थिति में नहीं, बल्कि बाहरी वातावरण में छिपा है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची हैं, जैसे ही अमेरिकी बॉण्ड अधिक प्रतिफल देने लगते हैं, वैश्विक पूंजी उभरते बाज़ारों से निकलकर अमेरिका लौट जाती है। यह फ्लाइट टू सेफ्टी का क्लासिक पैटर्न है।
ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियां, भारत सहित एशिया के कई देशों के लिए जोखिम बढ़ गया है।भारत–अमेरिका व्यापार समझौता लटका हुआ है,
अनिश्चितता विदेशी निवेशकों को असहज करती है।
वैश्विक जोखिम धारणा कमजोर हुई है। युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला बाधाएं, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, इन सबने निवेशक भावना को प्रभावित किया है। नतीजतन, भारत के पूंजी बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा, रुपया दबाव में आया, भारतीय बांडों की आकर्षण क्षमता घटी, विदेशी निवेशक सुरक्षा की खोज में अमेरिका, जापान और यूरोप के बांडों की ओर मुड़ रहे हैं।
यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। सिद्धांत रूप से कमजोर रुपया निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाता है, लेकिन भारत की संरचना ऐसी नहीं है कि इसका फायदा बहुत व्यापक हो सके। भारत कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी,
खाद्य तेल, कई तरह के उपभोक्ता उत्पाद का आयात करता है। कमजोर रुपया इन सभी को महंगा बनाता है, जिससे आयातित मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा रहता है।
हालांकि वर्तमान तिमाही में महंगाई कम रही, लेकिन इसका एक नकारात्मक पक्ष यह है कि नाममात्र जीडीपी केवल 8.7 प्रतिशत रही, जो वास्तविक और नॉमिनल ग्रोथ के बीच 2020 के बाद सबसे कम अंतर है। इसका सीधा असर सरकार के कर राजस्व, कंपनियों के मुनाफे,
निवेश की क्षमता पर पड़ सकता है। आईआईएफ से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अत्यधिक कम महंगाई के कारण डिफ्लेशन जैसे जोखिम की ओर बढ़ रहा है। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी स्थिति नहीं होती, क्योंकि यह मांग के कमजोर होने का संकेत दे सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि दिसंबर का महीना वैश्विक बैलेंस शीट क्लोजिंग का होता है। निवेशक अक्सर लाभ बुक करते हैं और पूंजी वापस ले जाते हैं, ताकि उनकी घरेलू रिपोर्टिंग बेहतर दिखे। इसलिए दिसंबर में आउटफ्लो कुछ हद तक मौसमी भी होता है, लेकिन यह दलील अधूरी है, क्योंकि रुपये की गिरावट पिछले पांच वर्षों से लगातार जारी है। यह सिर्फ एक महीने या एक तिमाही की समस्या नहीं है, बल्कि एक व्यापक, दीर्घकालिक आर्थिक चुनौती है।
इतनी तेज़ जीडीपी ग्रोथ के बाद सामान्यतः शेयर बाजार में उछाल आता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसका कारण स्पष्ट हैं कि विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वैश्विक वातावरण अनिश्चित है,
आईएमएफ़ द्वारा डेटा पर सवाल उठाने से भरोसा कमजोर हुआ, और कमजोर रुपया आयात-निर्भर कंपनियों की लागत बढ़ा सकता है। भारतीय बाजार लंबे समय से विदेशी पूंजी पर निर्भर रहे हैं। जब एफआईआई बेचते हैं, बाजार गिरना स्वाभाविक है।
डोनाल्ड ट्रंप के पुनः राष्ट्रपति बनने से अमेरिका की आर्थिक नीति में संरक्षणवाद तेजी से सामने आया है। इसका प्रत्यक्ष असर भारत पर पड़ रहा है। भारतीय उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ, वीज़ा नियम सख्त होने की संभावना, वैश्विक आपूर्ति श्रंखलाओं का राजनीतिक ध्रुवीकरण, इन सभी ने भारत के भुगतान संतुलन को और कमजोर किया है। कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि जनवरी–मार्च तिमाही में भी रुपया और दबाव में रह सकता है।
तो क्या 8.2% ग्रोथ वास्तविक स्थिति को दर्शाती है? यह वह प्रश्न है जो पूरे विमर्श का केंद्र है। जानकारों के अनुसार, इसे भारत की मज़बूती का संकेत मानती हैं। कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक आधार वर्ष अपडेट नहीं होता, असंगठित क्षेत्र का सही मूल्यांकन नहीं होता,
राज्यों के वित्तीय आंकड़े उपलब्ध नहीं होते, जीडीपी विधियों में संगति नहीं आती, तब तक किसी भी तेज़ वृद्धि की व्याख्या अधूरी रहेगी।
कुल मिलाकर, भारत की 8.2% विकास दर निस्संदेह प्रभावशाली है। यह बताती है कि भारतीय उपभोग वापस पटरी पर है, निवेश में सुधार हो रहा है, और घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही है, लेकिन इसके समानांतर कई गहरी चिंताए भी मौजूद हैं। रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बन चुका है, विदेशी निवेशक तेजी से बाहर जा रहे हैं, आईएमएफ़ ने डेटा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, ट्रंप प्रशासन की नीतियां भारत के लिए जोखिम पैदा कर रही हैं। कम नॉमिनल ग्रोथ सरकारी राजस्व को सीमित कर सकती है,
कमजोर मुद्रा आयातित महंगाई बढ़ा सकती है, यह विरोधाभासी स्थिति बताती है कि भारत का विकास वास्तविक है, पर टिकाऊ नहीं है, तेज़ी है, लेकिन असंतुलन भी उतने ही गहरे हैं।
भारत यदि, वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक विश्वसनीयता बढ़ाना चाहता है, तो उसे तुरंत आर्थिक डेटा का आधुनिकीकरण, निवेशकों का विश्वास बहाल करना, निर्यात नीति में स्थिरता और दीर्घकालिकता, भुगतान संतुलन को मजबूत करना, वैश्विक व्यापार समझौतों में स्पष्टता और पारदर्शिता में सुधार करने होंगे। भारत की विकास कहानी बड़ी है, आकर्षक है, और संभावनाओं से भरी है, लेकिन इसे टिकाऊ और विश्वसनीय बनाने के लिए इसके मौलिक ढांचे को मजबूत करना अनिवार्य है।

