दवा पर भरोसा टूटा तो इलाज का आधार भी डगमगाएगा
जमशेदपुर में भी सवाल: क्या सिविल सर्जन और ड्रग इंस्पेक्टर करेंगे सख्त कार्रवाई?
अमन कुमार शांडिल्य
केंद्र सरकार की औषधि गुणवत्ता जांच एजेंसियों की हालिया रिपोर्ट ने पूरे देश में चिंता बढ़ा दी है। शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रॉल, बुखार, खांसी, एसिडिटी और ओआरएस जैसी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए हैं। यह मामला केवल दवा कंपनियों का नहीं, बल्कि करोड़ों मरीजों के स्वास्थ्य और भरोसे का है।
मरीज डॉक्टर के पर्चे और दवा कंपनी के नाम पर विश्वास करके दवा खरीदता है। यदि वही दवा गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मरीज के जीवन से खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में कठोर और पारदर्शी कार्रवाई ही जनता का विश्वास बनाए रख सकती है।
पूर्वी सिंहभूम में भी जरूरी है सतर्कता
जमशेदपुर और पूर्वी सिंहभूम में भी यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सिविल सर्जन कार्यालय और ड्रग इंस्पेक्टर केंद्र सरकार की रिपोर्ट के आधार पर संबंधित दवाओं के बैच की जांच करेंगे? क्या मेडिकल दुकानों और स्टॉकिस्टों का निरीक्षण होगा? यदि संबंधित दवाएं बाजार में उपलब्ध हैं, तो क्या उन्हें तत्काल हटाने और दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी? जनता को इन सवालों के स्पष्ट जवाब चाहिए।
दवा का कारोबार मुनाफे का नहीं, भरोसे का विषय है। यदि गुणवत्ता पर समझौता होगा तो सबसे बड़ी कीमत मरीज चुकाएगा। इसलिए केंद्र और राज्य की एजेंसियों के साथ-साथ पूर्वी सिंहभूम का औषधि प्रशासन भी सक्रियता दिखाए। कार्रवाई निष्पक्ष, समयबद्ध और सार्वजनिक हो, ताकि लोगों का यह विश्वास कायम रहे कि उनकी जान से जुड़ी दवाओं के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं होने दिया जाएगा।

