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    Home » इधर सूखे की आहट और उधर राहत की हरियाली!
    झारखंड सरायकेला-खरसावां

    इधर सूखे की आहट और उधर राहत की हरियाली!

    Aman OjhaBy Aman OjhaJune 28, 2026No Comments3 Mins Read
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    राष्ट्र संवाद संवाददाता मृत्युंजय बर्मन

     

    झारखंड में इस वर्ष मानसून की रफ्तार अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही है। अब तक राज्य में सामान्य औसत की तुलना में लगभग 60 से 62 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, लेकिन सूखे की चर्चा खेतों से पहले सरकारी गलियारों में पहुंच गई है। अल नीनो का नाम लेते ही मौसम वैज्ञानिकों से ज्यादा सक्रिय वे लोग दिखाई देने लगे हैं, जिन्हें राहत कार्यों का वर्षों का अनुभव है। किसान अभी आसमान देख रहा है, मगर कुछ विभागों की नजर पहले ही राहत मद की फाइलों पर टिक चुकी है।

     

    सूखा घोषित होना किसानों के लिए संकट का संकेत होता है, लेकिन सरकारी तंत्र के कुछ खिलाड़ियों के लिए यह किसी “त्योहार” से कम नहीं माना जाता। जैसे ही सूखे की घोषणा होती है, बैठकों का मौसम शुरू हो जाता है। सर्वे होंगे, सूचियां बनेंगी, प्रस्ताव आएंगे, टेंडर निकलेंगे, वाहन चलेंगे, निरीक्षण होंगे और अंत में राहत भी पहुंचेगी …कागजों पर सबसे पहले।

     

    झारखंड का इतिहास गवाह है कि प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा चर्चा कई बार राहत वितरण की अनियमितताओं की हुई है। कभी लाभुकों की सूची में अपात्रों के नाम, कभी बिना नुकसान वाले क्षेत्रों को राहत, तो कभी वास्तविक किसानों के नाम ही गायब। कई मौकों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा मीडिया रिपोर्टों में राहत योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठे। यानी बारिश कम हो या ज्यादा, विवादों की फसल खूब लहलहाई।

     

    व्यवस्था का अपना दर्शन है। खेत में धान नहीं उगे तो कोई बात नहीं, लेकिन फाइलों में योजनाओं की हरियाली बनी रहनी चाहिए। गांव का किसान बादलों की ओर देखता है, जबकि कुछ लोग बजट की ओर। किसान प्रार्थना करता है कि पानी बरस जाए, और कुछ कार्यालयों में यह प्रार्थना होती है कि राहत मद बरस जाए।

     

    बेशक, यदि मौसम विभाग के पूर्वानुमान सही साबित होते हैं और राज्य में वर्षा सामान्य से कम होती है, तो सरकार का पहले से तैयारी करना स्वागतयोग्य कदम है। समय रहते सिंचाई, पेयजल, बीज, चारा और रोजगार की व्यवस्था करना शासन का दायित्व भी है। लेकिन तैयारी और पारदर्शिता साथ-साथ चलें, तभी जनता का विश्वास मजबूत होगा। इस बार उम्मीद यही होनी चाहिए कि सूखे की मार केवल किसानों तक सीमित न रहे और राहत की मलाई केवल फाइलों तक न पहुंचे। राहत राशि खेतों तक पहुंचे, गोदामों तक नहीं; किसान के खाते तक पहुंचे, बिचौलियों की जेब तक नहीं।

     

    आखिर सूखा प्रकृति की देन हो सकता है, लेकिन राहत में सूखा पड़ना पूरी तरह मानवीय व्यवस्था की देन होता है। इसलिए इस बार प्रार्थना केवल अच्छी बारिश की नहीं, बल्कि ईमानदार राहत व्यवस्था की भी होनी चाहिए। ताकि इतिहास दोहराया न जाए और झारखंड में सूखा पड़े तो केवल धरती पर पड़े, सरकारी नीयत पर नहीं।

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