गांधी इतिहास नहीं वर्तमान की जरूरत
लेखिका – मारसिदा खातून, पाकुड़, झारखंड
पाकुड़: प्रति वर्ष 2 अक्टूबर की तारीख़ कैलेंडर पर केवल ‘गांधी जयंती’ बनकर नहीं आती, बल्कि यह हमें कुछ पल ठहरकर इतिहास की ओर देखने और उस शख्सियत को याद करने का अवसर देती है, जिसका भारत की आज़ादी की लड़ाई में योगदान इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और जन-आंदोलनों के माध्यम से महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संघर्ष को ऐसी दिशा दी, जिसने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने और देश को आज़ादी की मंज़िल तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज की भागती-दौड़ती दुनिया से जब हम इतिहास के गलियारों में पीछे लौटते हैं, तो एक बेहद साधारण-सी आकृति दिखाई देती है दुबली देह, गोल चश्मा, हाथ में लाठी और तन पर मामूली-सा कपड़ा। न शानो-शौकत, न हथियारों का तामझाम और न सत्ता का गुरूर। हथियार के नाम पर सत्य, रास्ते के नाम पर अहिंसा और अन्याय के सामने न झुकने का दृढ़ संकल्प। यही साधारण दिखाई देने वाला इंसान ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता को बार-बार चुनौती देता नजर आया। उनकी पुकार धीरे-धीरे किसानों, मजदूरों, महिलाओं, विद्यार्थियों और लाखों आम हिंदुस्तानियों की आवाज़ बनती चली गई। उस व्यक्ति का नाम था मोहनदास करमचंद गांधी। दुनिया ने उन्हें ‘महात्मा’ के नाम से जाना, लोगों ने प्यार से ‘बापू’ पुकारा और भारतीय जनमानस में वे ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में स्मरण किए गए। सत्य, अहिंसा और जनसेवा के उनके आदर्शों ने उनके व्यक्तित्व को भारत ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर भी एक अलग पहचान दी। महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी रियासती प्रशासन में दीवान थे और माता पुतलीबाई धार्मिक एवं संयमी स्वभाव की थीं। वर्ष 1888 में गांधी कानून की शिक्षा के लिए लंदन गए और बैरिस्टर बनकर 1891 में भारत लौटे। भारत लौटकर उन्होंने वकालत शुरू करने की कोशिश की। इसी बीच 1893 में एक मुकदमे के सिलसिले में वे दक्षिण अफ्रीका पहुँचे। वहाँ उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन की घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी। प्रथम श्रेणी का वैध टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया। इस अपमान ने उनके भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष का संकल्प मजबूत किया। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को संगठित किया, नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की और ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से भारतीयों की आवाज़ उठाई। इसी संघर्ष के दौरान ‘सत्याग्रह’ की अवधारणा को मजबूती मिली अन्याय के सामने झुकना नहीं, लेकिन उसके विरोध में हिंसा का सहारा भी नहीं लेना। 9 जनवरी 1915 को गांधी भारत लौटे। अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर उन्होंने पहले भारत को समझने का प्रयास किया। देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की और आम लोगों की समस्याओं को करीब से देखा। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के जरिए उन्होंने नील की जबरन खेती और तीनकठिया प्रथा से परेशान किसानों की आवाज़ उठाई। इसके बाद 1918 में खेड़ा में किसानों के साथ लगान में राहत की मांग को लेकर सत्याग्रह किया। इन आंदोलनों ने गांधी को भारतीय जनमानस के बीच एक प्रभावशाली जननेता के रूप में स्थापित किया। 1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध और जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश शासन के प्रति देश में आक्रोश और गहरा हुआ। इसके बाद 1920 में गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ। सरकारी संस्थानों और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के साथ स्वदेशी और खादी को बढ़ावा दिया गया। फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। उनके इस फैसले से कई नेता और कार्यकर्ता असहमत हुए, लेकिन गांधी के लिए स्वतंत्रता की मंज़िल के साथ संघर्ष के साधन भी महत्वपूर्ण थे। 1930 में नमक कानून के विरोध में गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक ऐतिहासिक यात्रा की और 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ा। दांडी मार्च ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक मुट्ठी नमक के जरिए गांधी ने स्वतंत्रता के बड़े सवाल को आम आदमी के जीवन से जोड़ दिया। इसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक चरण में पहुँचा दिया। गांधी ने ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया और देशवासियों को ‘करो या मरो’ का संदेश दिया। इसके बाद गांधी सहित कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में जारी रहा। आजादी के संघर्ष के दौरान गांधी को निजी दुखों का भी सामना करना पड़ा। उनकी जीवनसंगिनी कस्तूरबा गांधी ने 22 फरवरी 1944 को आगा खान पैलेस में अंतिम सांस ली। दशकों तक गांधी के संघर्ष में साथ चलने वाली कस्तूरबा का निधन उनके जीवन की बड़ी व्यक्तिगत क्षति थी। फिर आया 15 अगस्त 1947 वह दिन जिसका देश को लंबे समय से इंतज़ार था। भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन आज़ादी के साथ विभाजन का गहरा दर्द भी सामने आया। सांप्रदायिक हिंसा के बीच गांधी शांति स्थापित करने के प्रयास में जुटे रहे। जब देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, गांधी कलकत्ता में थे और उन्होंने 15 अगस्त का दिन उपवास में बिताया। 30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा के लिए जाते समय नाथूराम गोडसे ने गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी। जिस व्यक्ति ने जीवन भर हिंसा के सामने अहिंसा का रास्ता अपनाने का संदेश दिया, उसकी जीवन-यात्रा हिंसा की गोली से समाप्त हो गई। गांधी के निधन के बाद भी उनके विचारों पर बहस जारी रही। उनके योगदान जितने व्यापक रहे, उनके कुछ विचारों और फैसलों पर उतने ही गंभीर मतभेद भी रहे। उनके समकालीन कई नेता और विचारक भी उनसे असहमत थे। इसलिए गांधी को समझने का अर्थ न तो उन्हें हर सवाल से ऊपर रखना है और न उनके योगदान को नकारना, बल्कि उनकी उपलब्धियों, विचारों और आलोचनाओं तीनों को समझना है।आज दुनिया बदल चुकी है। हाथ में स्मार्टफोन है और सूचनाएं पल भर में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाती हैं। लेकिन इसी रफ्तार के साथ झूठ, नफरत और सामाजिक-धार्मिक तनाव भी तेजी से फैलते हैं। ऐसे दौर में सत्य की राह और अहिंसा का संदेश आज भी प्रासंगिक दिखाई देता है। गांधी की इस विरासत की वैश्विक अहमियत का एक प्रमाण यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2007 में 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य शिक्षा और जन-जागरूकता के माध्यम से अहिंसा के संदेश को बढ़ावा देना है। गांधी की प्रासंगिकता केवल तस्वीरों, किताबों और स्मारकों तक सीमित नहीं है। उनकी वास्तविक प्रासंगिकता हमारे व्यवहार में है झूठ के बीच सच चुनने में, नफरत के बीच संवाद की राह बनाने में और मतभेद के बावजूद इंसानियत को कायम रखने में। हर 2 अक्टूबर तस्वीर पर फूल चढ़ाना आसान है, लेकिन कठिन है उन मूल्यों को अपने जीवन में उतारना। गांधी जैसा बनने का दावा नहीं, बस इतना प्रयास कि सत्य की तलाश बनी रहे, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठती रहे और असहमति के बीच भी मनुष्यता का दामन न छूटे। गांधी केवल इतिहास का एक नाम नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और मानवीय मूल्यों की वह सीख हैं, जो आज भी हमारे वर्तमान को आईना दिखाती है। हर 2 अक्टूबर हमें इतिहास से अपने वर्तमान को देखने और अपने भविष्य के लिए बेहतर रास्ता चुनने का अवसर देता है। जय हिंद!

