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    Home » मन में झूठ फ़रेब
    मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय शिक्षा साहित्य

    मन में झूठ फ़रेब

    News DeskBy News DeskJuly 21, 2022No Comments2 Mins Read
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    मन में झूठ फ़रेब

    सत्यवान ‘सौरभ’

    कैसी ये सरकार है, कैसा है कानून ।
    करता नित ही झूठ है, सच्चाई का खून ।।

    मानवता बुझ-सी गई, बढ़ी घृणा की आँच ।
    वक्त झूठ का चल रहा, सहमा-सहमा साँच ।।

    बुनकर झूठ फरेब के, भला बिछे हो जाल ।
    सच्ची जिसकी साधना, होय न बांका बाल ।।

    सच्चे पावन प्यार से, महके मन के खेत ।
    दगा झूठ अभिमान से, हो जाते सब रेत ।।

    आखिर मंजिल से मिले, कठिन साँच की राह ।
    ज्यादा पल टिकती नहीं, झूठ गढ़ी अफवाह ।।

    सच कहते ही हो रहा, आना-जाना बंद ।
    तभी लोग हैं कर रहे, ज्यादा झूठ पसंद ।।

    सिसक रही हैं चिट्ठियां, छुप-छुपकर साहेब ।
    जब से चैटिंग ने भरा, मन में झूठ फ़रेब ।।

    सच से आंखें मूंद ली, करता झूठ बखान ।
    गिने गैर की खामियां, दिया न खुद पर ध्यान ।।

    (सत्यवान ‘सौरभ’ के चर्चित दोहा संग्रह ‘तितली है खामोश’ से।

     

    सच बैठा है मौन

    आखिर सच ही गूँजता, खोले सबकी पोल ।
    झूठे मुँह से पीट ले, कोई कितने ढोल ।।

    जिसने सच को त्यागकर, पाला झूठ हराम ।
    वो रिश्तों की फसल को, कर बैठा नीलाम ।।

    वक्त कराये है सदा, सब रिश्तों का बोध ।
    पर्दा उठता झूठ का, होता सच पर शोध ।।

    रिश्तों के सच जानकर, सब संशय हैं शांत ।
    खुद से खुद की बात से, मिला आज एकांत ।।

    एक बार ही झूठ के, चलते तीर अचूक ।
    आखिर सच ही जीतता, बिन गोली, बन्दूक ।।

    झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन ।
    घेरे घोर उदासियाँ, सुनता उसकी कौन ।।

    चूस रहे मजलूम को, मिलकर पुलिस-वकील ।
    हाकिम भी सुनते नहीं, सच की सही अपील ।।

     

    (सत्यवान ‘सौरभ’ के चर्चित दोहा संग्रह ‘तितली है खामोश’ से। )

     

     

     

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