
त्योहारों की रौनक के साथ सुरक्षा, स्वच्छता और सद्भाव की भी हो गारंटी, यह मांग आज बिहार के हर नागरिक की है। दीवाली, काली पूजा और छठ महापर्व बिहार की सांस्कृतिक चेतना, आस्था और सामाजिक एकता के प्रतीक हैं। इन पर्वों पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक और अधिकारियों को दिए गए निर्देश निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन किसी भी सरकार की असली परीक्षा बैठकों में लिए गए फैसलों से नहीं, बल्कि जमीन पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन से होती है।
त्योहारों की रौनक के साथ सुरक्षा, स्वच्छता और सद्भाव की भी हो गारंटी
बिहार में त्योहारों का मौसम केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी की भी परीक्षा है। दीपावली की रोशनी, काली पूजा की आस्था और छठ महापर्व की पवित्रता तभी सार्थक होगी, जब आम नागरिक भयमुक्त वातावरण में अपने पर्व मना सकें। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने लोक सेवक आवास में आयोजित समीक्षा बैठक के दौरान विधि-व्यवस्था, सुरक्षा, स्वच्छता और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर जो निर्देश दिए हैं, वे समय की जरूरत हैं।
खासकर दूसरे राज्यों और विदेशों में रहने वाले लाखों बिहारी जब त्योहारों पर अपने घर लौटते हैं, तो उनकी अपेक्षा केवल अपनों से मिलने की नहीं होती, बल्कि वे अपने राज्य में बेहतर व्यवस्था, सुरक्षित माहौल और सकारात्मक बदलाव भी देखना चाहते हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थलों पर चौबीसों घंटे पुलिस गश्त, पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती तथा क्विक रिस्पांस टीम को सक्रिय रखने का निर्देश इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन यह व्यवस्था केवल कागजों और आदेशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पुलिस की मौजूदगी ऐसी होनी चाहिए कि अपराधियों में कानून का भय और आम लोगों में सुरक्षा का विश्वास पैदा हो।
छठ महापर्व और प्रशासनिक जवाबदेही
छठ महापर्व बिहार की पहचान है। यह ऐसा पर्व है जिसमें जाति, वर्ग और आर्थिक हैसियत की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं और आस्था का सामूहिक स्वर सबसे ऊंचा सुनाई देता है। ऐसे में छठ घाटों की सफाई, रोशनी, पेयजल, चिकित्सा सुविधा, बैरिकेडिंग और यातायात नियंत्रण प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों के घाटों पर स्थानीय तैराकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी एक व्यावहारिक और जरूरी कदम है। विद्युत सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। नंगे तारों और असुरक्षित विद्युत कनेक्शनों पर पहले से रोक लगाना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री ने सक्षम और संपन्न लोगों से 125 यूनिट बिजली सब्सिडी का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की अपील के प्रचार-प्रसार का निर्देश भी दिया है। यह सामाजिक जिम्मेदारी की भावना से जुड़ा विषय है। हालांकि, ऐसी अपील के साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि जरूरतमंद परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी बाधा के मिलता रहे।
बिहार सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है कि त्योहारों के दौरान की गई तैयारियां स्थायी प्रशासनिक सुधार का आधार बनें। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, जिलाधिकारी स्वयं व्यवस्थाओं की निगरानी करें और जनप्रतिनिधियों के सुझावों को गंभीरता से लिया जाए। किसी हादसे के बाद जांच और मुआवजे की घोषणा से बेहतर है कि हादसा होने ही न दिया जाए।
अंततः त्योहारों की सफलता केवल रोशनी, सजावट और भीड़ से नहीं मापी जाती। इसकी असली कसौटी यह है कि कोई श्रद्धालु घाट पर असुरक्षित महसूस न करे, किसी यात्री को स्टेशन पर परेशानी न हो, किसी परिवार की खुशियां प्रशासनिक लापरवाही की भेंट न चढ़ें और समाज में आपसी भाईचारा बना रहे। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश तभी सार्थक होंगे, जब प्रशासन आदेशों की औपचारिकता से आगे बढ़कर धरातल पर परिणाम दिखाएगा। बिहार को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां त्योहारों पर सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार हो।
लेखक: देवानंद सिंह

