लोकतंत्र की नाजुकता का ज्वलंत उदाहरण है आपातकाल
देवानंद सिंह
25 जून का दिन भारत के इतिहास में काले दिवस के रूप में दर्ज है, क्योंकि इसी दिन 1975 की रात को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया था। आज देश उसी काले दिवस की 50वीं वर्षगांठ ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मना रहा है। आपातकाल के रूप में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक असाधारण कदम उठाते हुए भारतीय संविधान, नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर दिया था। आपातकाल के साथ ही प्रेस पर सेंसरशिप, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों का दमन शुरू हो गया। आज, जब देश उस आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो यह न केवल इतिहास को याद करने का दिन है, बल्कि यह आत्मविश्लेषण करने का भी अवसर है कि किस प्रकार एक चुनी हुई प्रधानमंत्री ने सत्ता की भूख में लोकतंत्र का गला घोंट दिया।

1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। बांग्लादेश युद्ध में भारत की विजय और पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों की आत्मसमर्पण ने उन्हें एक लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित किया, लेकिन कुछ ही वर्षों में हालात बदलने लगे। देश भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। महंगाई चरम पर थी, बेरोजगारी बढ़ रही थी और भ्रष्टाचार जनमानस को परेशान कर रहा था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन बिहार से शुरू होकर एक राष्ट्रीय जनांदोलन में बदल गया था। इंदिरा गांधी की लोकप्रियता खतरे में थी और सत्ता उनके हाथ से खिसकती नज़र आ रही थी।

उनकी सत्ता को झटका तब लगा, जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने पाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव के दौरान सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था। इस फैसले ने उनकी वैधता को सीधे चुनौती दी और उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता था, लेकिन इंदिरा ने सत्ता से हटने के बजाय संविधान और लोकतंत्र को अपने राजनीतिक भविष्य की बलि चढ़ा दी। उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा करवाई, वह भी बिना मंत्रिमंडल की सलाह के। 25 जून की रात को ही देशभर में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, जॉर्ज फर्नांडीस जैसे हज़ारों नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू कर दी गई, जिसमें अखबारों की खबरों को सरकारी अनुमति के बिना प्रकाशित नहीं किया जा सकता था।

सत्ता का केंद्रीकरण ऐसा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी संजय गांधी के इशारे पर देश की नीतियां बदलने लगे, जबकि संजय गांधी न तो निर्वाचित थे और न ही किसी संवैधानिक पद पर थे। देश की राजनीति के सुपर प्राइम मिनिस्टर बन बैठे। परिवार नियोजन के नाम पर जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया, जिसमें लाखों लोगों को बिना उनकी सहमति के नसबंदी कर दिया गया। दिल्ली के तुर्कमान गेट जैसे इलाकों में जबरन पुनर्वास और बुलडोज़िंग की गई, जिसमें कई लोग मारे गए। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने संसद में बहुमत का इस्तेमाल कर संविधान को इस कदर बदल डाला कि भारत एक तरह से सत्तावादी गणराज्य में बदल गया।

19 महीनों के बाद, अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक दबाव में इंदिरा गांधी ने मार्च 1977 में चुनाव की घोषणा की। उन्हें विश्वास था कि जनता उनके कड़े लेकिन जरूरी फैसलों को समर्थन देगी, लेकिन परिणाम इसके उलट आया। देशभर में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। यह स्वतंत्र भारत में पहली बार था, जब एक गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई। इंदिरा गांधी और संजय गांधी खुद चुनाव हार गए।
आपातकाल केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नाजुकता का ज्वलंत उदाहरण है। यह दिखाता है कि एक सशक्त नेता, जब संस्थानों को अपने अधीन कर लेता है और जनता की आवाज़ को कुचल देता है, तब लोकतंत्र कितनी जल्दी तानाशाही में बदल सकता है।

आज 50 वर्ष बाद भी, भारत में कई बार लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव, प्रेस की स्वतंत्रता पर नियंत्रण, और असहमति की आवाज़ को राष्ट्रविरोधी कहकर खारिज करना जैसे उदाहरण देखने को मिलते हैं। ये संकेत हैं कि आपातकाल केवल एक संवैधानिक स्थिति नहीं, बल्कि एक मानसिकता भी है, और यह कभी भी लौट सकती है,

यदि, हम सतर्क न रहें। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र केवल एक बार मतदान करने से नहीं चलता, बल्कि यह सतत निगरानी, असहमति का सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों की सजगता से फलता-फूलता है। हमारी पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह न केवल उस अंधकार को याद रखे, बल्कि यह सुनिश्चित करे कि वैसी त्रासदी कभी दोहराई न जाए।

