लेखक: देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद है। यहीं कानून बनते हैं, सरकार से जवाब मांगा जाता है और जनता की समस्याओं पर गंभीर विमर्श होता है। संसद केवल सत्ता पक्ष का मंच नहीं है, बल्कि विपक्ष की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है कि वह सरकार को तथ्यों और तर्कों के आधार पर कठघरे में खड़ा करे। लेकिन यदि संसद में बहस की जगह लगातार हंगामा, नारेबाजी और कार्यवाही बाधित करना ही विरोध का प्रमुख माध्यम बन जाए, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र और देश की जनता का होता है।
कार्यवाही बाधित करना: लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती
सोमवार को लोकसभा और राज्यसभा में एक बार फिर यही स्थिति देखने को मिली। विपक्ष के लगातार विरोध के कारण सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। परिणामस्वरूप ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) संशोधन विधेयक-2026‘ और ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक-2026‘ जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर निर्धारित समय पर चर्चा नहीं हो सकी। यह केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे सदन की विफलता मानी जाएगी। संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर अधिक जानकारी उपलब्ध है।
यह स्वीकार करना होगा कि विपक्ष का विरोध करना पूरी तरह वैध और लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि किसी विधेयक पर आपत्ति है, उसके प्रावधानों से असहमति है या सरकार की मंशा पर सवाल हैं, तो विपक्ष को उन्हें पूरी मजबूती से उठाना चाहिए। लेकिन संसदीय लोकतंत्र में सबसे प्रभावी हथियार बहस है, व्यवधान नहीं। संसद की कार्यवाही रोक देने से न तो कानून बेहतर बनते हैं और न ही जनता के सवालों का समाधान होता है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा की पीठासीन व्यवस्था की ओर से बार-बार सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटकर चर्चा में भाग लेने की अपील की गई। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कहा कि विधेयकों पर बड़ी संख्या में संशोधन और चर्चा के नोटिस प्राप्त हुए हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि चर्चा का अवसर उपलब्ध था। यदि ऐसा था, तो फिर बहस छोड़कर हंगामे का रास्ता चुनना विपक्ष की रणनीति पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
संसद में हर मिनट की कार्यवाही पर जनता का धन खर्च होता है। जब सदन बार-बार स्थगित होता है, तो केवल समय ही नष्ट नहीं होता, बल्कि करोड़ों नागरिकों से जुड़े विधायी कार्य भी प्रभावित होते हैं। देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को नारे लगाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आवाज सदन में प्रभावी ढंग से उठाने के लिए चुनती है। विपक्ष की असली ताकत सदन में उसके तर्क, तथ्य और सरकार से पूछे गए कठिन सवाल हैं, न कि लगातार कार्यवाही बाधित करना।
हालांकि, निष्पक्ष दृष्टिकोण यह भी कहता है कि केवल विपक्ष को दोष देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। सत्ता पक्ष का दायित्व है कि वह विपक्ष को पर्याप्त समय दे, उसकी आपत्तियों को गंभीरता से सुने और संवेदनशील मुद्दों पर संवाद का माहौल बनाए। यदि सरकार संवाद से बचती है, तो टकराव की स्थिति बनती है। इसलिए स्वस्थ संसदीय परंपरा के लिए दोनों पक्षों का सहयोग आवश्यक है।
फिर भी, जब सदन में चर्चा के लिए समय निर्धारित हो, अध्यक्ष स्वयं बहस का आग्रह करें और विपक्ष के पास अपनी बात रखने का पूरा अवसर हो, तब लगातार हंगामा करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में सरकार को कठघरे में खड़ा करने का सबसे प्रभावी माध्यम संसद के भीतर तथ्यपूर्ण बहस है, न कि उसे ठप कर देना।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता पक्ष संवाद के लिए अधिक उदार बने और विपक्ष विरोध को रचनात्मक दिशा दे। संसद की गरिमा तभी बनी रहेगी जब सत्ता और विपक्ष दोनों यह समझेंगे कि वे एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी अवश्य हैं, लेकिन लोकतंत्र के साझेदार भी हैं।
विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन यदि वही विरोध संसद को चलने ही न दे, तो सबसे बड़ा नुकसान सरकार का नहीं, बल्कि लोकतंत्र और देश की जनता का होता है। यही संदेश आज की परिस्थितियों से सबसे स्पष्ट रूप में सामने आता है।

