एसआरआई पर असहमति लोकतंत्र के मूल स्वरूप पर उठते संदेह और अविश्वास की गहरी परछाईं
देवानंद सिंह
भारत का लोकतांत्रिक ढांचा जितना विशाल है, उतना ही संवेदनशील भी। इसकी पूरी इमारत जिस स्तंभ पर आधारित है, वह है मतदाता सूची। यह कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं, बल्कि नागरिकता और संवैधानिक अधिकारों की बुनियादी पुष्टि। इसी सूची में दर्ज नाम तय करते हैं कि अधिकार किसके हाथों में जाएगा, सत्ता किस दिशा में मुड़ेगी और लोकतंत्र की धड़कन किस गति से चलेगी। ऐसे समय में, जब चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआरआई) की शुरुआत की, तो राजनीतिक परिदृश्य में हलचल का पैदा होना स्वाभाविक था, पर जो हलचल दिख रही है, वह केवल एक तकनीकी प्रक्रिया पर असहमति नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल स्वरूप पर उठते संदेह और अविश्वास की गहरी परछाईं है।
एसआरआई को लेकर जो बहस चल रही है, वह महज़ इस बात पर नहीं कि मतदाता सूची अपडेट होनी चाहिए या नहीं, बल्कि इस पर है कि यह अद्यतन किस तरह हो रहा है, किसकी निगरानी में हो रहा है, किन अधिकारों का प्रयोग करते हुए हो रहा है, और इससे कौन प्रभावित हो सकता है। विपक्ष का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी, जल्दबाज़ी में और संविधान की सीमाओं को अनदेखा करते हुए लागू की जा रही है, जबकि चुनाव आयोग का दावा है कि यह एक जरूरी कदम है, क्योंकि देश भर में प्रवास, मृत्यु, दोहरी प्रविष्टियों और पहचान विसंगतियों के कारण मतदाता सूची में निरंतर सुधार अनिवार्य है। दोनों के दावों के बीच जो टकराव है, वह अब केवल राजनीतिक बयानबाज़ी की लड़ाई नहीं; वह देश की चुनावी प्रक्रिया की आत्मा के इर्द-गिर्द घूमने वाला गंभीर विवाद है।
समाजवादी पार्टी की ओर से फखरुल हसन चांद ने जिस कठोर शब्दावली में एसआरआई की आलोचना की है, उससे स्पष्ट है कि विपक्षी दल इस प्रक्रिया को केवल खामियों वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि एक तरह की संवैधानिक अतिक्रमण के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है, अंतिम फैसला अभी आया नहीं है, फिर भी चुनाव आयोग एसआरआई को तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है। उनका सबसे बड़ा सवाल यह है कि आयोग को आखिर यह अधिकार किस कानून से मिलता है कि वह नागरिकों से अतिरिक्त फॉर्म भरवाकर उनकी नागरिकता या मतदाता होने की स्थिति की पुनर्पुष्टि करे। क्या यह नागरिकता की जांच का नया रास्ता है? क्या यह मताधिकार के साथ-साथ पहचान को भी संशय के घेरे में डाल देने वाली प्रक्रिया है? और यदि नहीं, तो अलग-अलग राज्यों में अलग मानक क्यों लागू हो रहे हैं? यह असमानता किस संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप है?
ये सवाल साधारण नहीं हैं, क्योंकि वे सीधे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता की ओर संकेत करते हैं। आयोग को हमेशा से ऐसी संस्था माना गया है जो राजनीतिक प्रभावों से परे रहकर नियमों का पालन करती है, पर जब उस पर ही पक्षपात और अस्पष्टता का आरोप लगे, तो यह देश के लोकतांत्रिक वास्तुशिल्प में पहली दरार की तरह देखा जाता है। समाजवादी पार्टी की चिंता इसीलिए ज्यादा गहरी है, क्योंकि वे इसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर लक्षित निष्कासन की प्रक्रिया के रूप में देख रहे हैं, जो खास वर्गों गरीबों, अल्पसंख्यकों और विपक्षी समर्थकों को प्रभावित कर सकती है।
राजद का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत संतुलित है, पर वह भी प्रक्रिया में जल्दबाज़ी पर सवाल उठाता है। मृत्युंजय तिवारी का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का इंतजार करेंगे, क्योंकि यही विवाद का मूल समाधान है। इस रुख में एक अर्थ यह भी छिपा है कि विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी शोर-शराबे से अलग संवैधानिक चुनौती के रूप में देख रहा है। आखिरकार, मताधिकार मौलिक अधिकार न सही, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण है। यदि, इसकी पुष्टि की प्रक्रिया ही विवादित हो जाए, तो चुनावों की निष्पक्षता पर कैसे भरोसा किया जाए?
कांग्रेस इस विवाद को दो स्तरों पर देख रही है—एक राजनीतिक और दूसरा संवैधानिक। संदीप दीक्षित ने जो कहा, वह आरोपों को एक अन्य दिशा में ले जाता है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग एक तरह की ‘जिद’ के साथ एसआरआई लागू कर रहा है, जबकि उसका प्रभाव पहले ही दिख चुका है, खासकर बिहार में, जहां कटे हुए नामों की सूची ऐसी थी कि उन पर राजनीतिक लाभ-हानि की आशंका स्पष्ट दिखाई देती थी। उनका आरोप है कि जिन लोगों के नाम हटे, उनमें ज्यादातर विपक्ष से जुड़े समुदायों के थे। यह आरोप बेहद गंभीर है क्योंकि यदि, मतदाता सूची के जरिए चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की आशंका भी पैदा हो जाए, तो लोकतंत्र का पूरा ढांचा हिल जाता है।
दीक्षित ने दूसरे स्तर पर यह भी कहा कि बांग्लादेशी नागरिकों के लौटने के मामलों को एसआरआई से जोड़ना गलत है। यदि, कोई घुसपैठिया मिला है तो उसका स्पष्ट और ठोस सबूत दिया जाए, लेकिन यह प्रक्रिया अवैध नागरिकों की पहचान का उपकरण नहीं है। यह स्पष्ट रूप से उस राजनीतिक प्रयास पर कटाक्ष है जिसमें मतदाता सूची को राष्ट्रवाद और सुरक्षा की बहस से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि एसआरआई का मूल उद्देश्य, यदि, उसे आयोग के शब्दों में देखा जाए, तो केवल तकनीकी सुधार है।
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का बयान और भी संस्थागत है। वे न्यायपालिका पर भरोसा दिखाते हैं और कहते हैं कि अदालत के फैसले के बाद ही पार्टी अपना रुख अंतिम रूप से तय करेगी। इससे यह संकेत मिलता है कि विपक्ष के भीतर एक धारा ऐसी भी है, जो इस पूरे विवाद को संवैधानिक विवेक से देखने की पक्षधर है और मानती है कि सर्वोच्च न्यायालय ही वह संस्था है, जो इस प्रक्रिया की वैधता का अंतिम निर्धारण कर सकती है।
यह विवाद अब इस सवाल पर केंद्रित हो गया है कि मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया किस सीमा तक चुनाव आयोग के अधिकार में आती है। क्या आयोग को यह अधिकार है कि वह नागरिकों से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे? क्या यह मतदाता अधिकार को संदेह के घेरे में डालने जैसा नहीं है? और क्या यह प्रक्रिया देश में मौजूद विविधता, असमानता और सामाजिक जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए सभी वर्गों पर समान रूप से लागू की गई है? विपक्ष का आरोप है कि नहीं। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से अस्पष्ट है, पारदर्शी नहीं है, राजनीतिक रूप से संदिग्ध है और इससे मताधिकार का अनावश्यक हनन हो सकता है।
इसके विपरीत चुनाव आयोग का दावा है कि मतदाता सूची का अद्यतन लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। आयोग कहता है कि प्रवास, मृत्यु, पहचान विसंगतियों, दोहरी प्रविष्टियों और काल्पनिक नामों का सुधार किए बिना एक साफ-सुथरी सूची संभव नहीं। और यदि सूची साफ नहीं, तो चुनावों की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित होगी? समस्या यह है कि आयोग इस पूरी प्रक्रिया को किस प्रकार लागू कर रहा है, यही विवाद का मूल आधार है। सुधार और शुद्धिकरण के बीच की पतली रेखा राजनीति में बेहद संवेदनशील हो जाती है, खासकर तब जब चुनावी परिणामों की दिशा मात्र कुछ प्रतिशत वोटों से बदल सकती हो।
इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पक्ष इसका कानूनी आयाम है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना होगा कि क्या चुनाव आयोग को एसआरआई जैसी प्रक्रिया लागू करने का अधिकार है। अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या यह अद्यतन प्रक्रिया राज्य सरकारों की सहमति के बिना की जा सकती है, क्या यह मताधिकार को बाधित करती है, और क्या यह संविधान के अनुच्छेद 324 की सीमा में आती है या उससे बाहर चली जाती है। अदालत का फैसला न केवल एसआरआई की वैधता तय करेगा, बल्कि भविष्य की हर चुनावी प्रक्रिया की दिशा भी निर्धारित करेगा।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह विवाद किसी एक राज्य, दल या चुनाव तक सीमित नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र की आत्मा का प्रश्न है। यदि, मतदाता सूची ही विवादित हो जाए, तो चुनावों पर विश्वास कैसे कायम रहेगा? यदि बड़े पैमाने पर नाम हटते हैं और संदेह यह हो कि हटाने का आधार तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक था, तो अविश्वास की लहर समाज में फैलने में देर नहीं लगेगी। यही वह डर है जो विपक्ष को बेचैन कर रहा है, और यही वह चुनौती है जिसके सामने चुनाव आयोग खड़ा है, उसकी हर कार्रवाई अब केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि विश्वास का परीक्षण बन चुकी है।
अंततः यह पूरा विवाद भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करेगा। एसआरआई एक तकनीकी अभ्यास है या संवैधानिक जोखिम, इस पर बहस जारी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह मतदाता सूची जैसे संवेदनशील दस्तावेज़ पर केंद्रित है, जिसमें किसी भी बदलाव के दूरगामी राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक प्रभाव हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, चुनाव आयोग की पारदर्शिता और राजनीतिक दलों की ईमानदारी इन्हीं तीन स्तंभों पर आने वाले समय में तय होगा कि एसआरआई लोकतंत्र को सशक्त करेगा या उसे अविश्वास की खाई की ओर ले जाएगा।
लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि हर नागरिक बिना भय, बिना शंका और बिना अनिश्चितता के मतदान कर सके। इसलिए मतदाता सूची पर किया गया हर प्रयोग केवल तकनीकी निर्णय नहीं है, यह विश्वास है। यह विश्वास ही है, जो चुनावों को केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनादेश बनाता है, और जब विश्वास की बात हो, तब पारदर्शिता, वैधता और समानता तीनों को सर्वोच्च स्थान देना ही देश और संविधान के हित में है।

