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    Home » 28 साल से पुनर्वास की राह देख रहे चाटीकोचा के विस्थापित, टेलिंग पॉन्ड की धूल और रेडिएशन पर बढ़ी चिंता
    झारखंड सरायकेला-खरसावां

    28 साल से पुनर्वास की राह देख रहे चाटीकोचा के विस्थापित, टेलिंग पॉन्ड की धूल और रेडिएशन पर बढ़ी चिंता

    Aman OjhaBy Aman OjhaMay 10, 2026No Comments4 Mins Read
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    राष्ट्र संवाद संवाददाता

     

    जादूगोड़ा के यूसिल प्रभावित गांव चाटी कोचा के ग्रामीणों को 28 साल के बाद भी पुनर्वास का लाभ नहीं मिला लगभग 67 परिवार अभी भी पुनर्वास को लेकर परेशान है।

    यूसिल प्रबंधन के द्वारा कई बार वादा करने के बाद भी अभी तक उन्हें न्याय नहीं दिया गया विस्थापितों को।

    जिला के नए उपायुक्त के आने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद जगी है कि विस्थापितों को न्याय मिलेगी ।

    इससे पहले कई उपायुक्त आए लेकिन कोई भी न्याय नहीं दिला पाए हैं पोटका के विधायक संजीव सरदार के द्वारा भी विस्थापित के मामले को लेकर मुख्यमंत्री से मिलकर यूसिल प्रबंधन की शिकायत भी की गई है लेकिन धीरे-धीरे यहां लोग यहां कई तरह के परेशानियों से जूझ रहे हैं।

    जादूगोड़ा के टेलिंग पॉन्ड को लेकर अब एक नई चिंता सामने आ रही है। आसपास के ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों जोआ र के अध्यक्ष घनश्याम विरुली का कहना है कि तेज हवा के दौरान टेलिंग पॉन्ड क्षेत्र से उड़ने वाली महीन धूल गांवों तक पहुंचती है। लोगों का आरोप है कि यही धूल धीरे-धीरे स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रही है। हालांकि, आधिकारिक एजेंसियां लगातार सुरक्षा मानकों के पालन का दावा करती रही हैं।

    टेलिंग पॉन्ड के नजदीक रहने वाले ग्रामीणों सालुंका हेंब्रम कहना है कि गर्मी और तेज हवा के दिनों में वातावरण में धूल की मात्रा बढ़ जाती है। स्थानीय ग्रामीणों लोगों का दावा है कि यह धूल आसपास के घरों, खेतों और जल स्रोतों तक पहुंचती है।

    कुछ स्वतंत्र अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भी टेलिंग पॉन्ड क्षेत्र की धूल और मिट्टी में रेडियोधर्मी तत्वों की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई गई है।

    सामाजिक कार्यरता

    आशीष ने बताया जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में क्षेत्र के आसपास रेडिएशन स्तर सामान्य से अधिक होने की बात कही थी। वहीं कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भी रेडियोधर्मी धूल को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

    ग्रामीणों का कहना है कि कई परिवारों में लगातार खांसी, सांस लेने में दिक्कत और त्वचा संबंधी समस्याएं देखी जा रही हैं। हालांकि, इन बीमारियों का सीधा कारण क्या है, इस पर आधिकारिक स्तर पर स्पष्ट सहमति नहीं है।

    स्थानीय सामाजिक संगठनों का आरोप है कि टेलिंग पॉन्ड के चारों ओर पर्याप्त हरित घेरा (ग्रीन बफर जोन ) और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने के कारण धूल नियंत्रण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

    यूसिल और संबंधित एजेंसियों का कहना है कि टेलिंग पॉन्ड की नियमित निगरानी की जाती है तथा रेडिएशन स्तर सुरक्षित सीमा के भीतर है। कंपनी का दावा है कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय अपनाए जाते हैं।

    अब उठ रहे बड़े सवाल

    क्या टेलिंग पॉन्ड के आसपास एयर क्वालिटी और धूल कणों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए किया जाता हे।

    क्या गांवों में रियल-टाइम रेडिएशन डिस्प्ले सिस्टम लगाया जाना चाहिए?

    क्या स्थानीय लोगों को निगरानी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए?

    स्थानीय संगठनों का कहना है कि जब तक पूरी पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक लोगों की आशंकाएं खत्म होना मुश्किल है।

    जादूगोड़ा में उठ रहे ये सवाल अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे लोगों के स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों से जुड़ते जा रहे हैं।

    विस्थापित समिति के पूर्व सचिव भीम चंद्र हंसदा न्याय के आस में अब तक स्वर्ग सिधार चुके हैं।

    आसपास के नदी नाले पूरी तरह से प्रदूषित हो चुके हैं यूसील प्रबंधन के द्वारा मूलभूत सुविधा भी ग्रामीणों को नहीं दी जा रही है।

    विस्थापि समिति के सदस्यों का कहना है कि अगर जल्द से जल्द हमें पुनर्वास का लाभ नहीं मिलेगा तो टेलिंग पौंड का जाम करेंगे काम ठप किया जाएगा हमारे पूजा स्थल भी पूरी तरह से प्रदूषित हो रही है।

    ज्वार संगठन के अध्यक्ष घनश्याम बिर्लू का कहना है कि यूसिल प्रबंधन के द्वारा बार-बार वादा खिलाफी की जा रही है अब संगठन आर पार की लड़ाई लड़ने को तैयार है लोग रेडिएशन से तिल मिल कर करने को विवश हे।

    यूसील प्रबंधन के द्वारा पुनर्वास को लेकर तीन जगह चयनित किया गया है भाटीन गांव ,झरिया गांव और बेनासोल कई बार नापी भी हुई है लेकिन ग्रामीणों के विरोध के कारण पुनर्वास नहीं करने दिया जा रहा है। ।ग्रामीणों का आरोप हे कि रेडिएशन से प्रभावित गांवों में पहले लगातार स्वास्थ्य कैंप मेडिकल कैंप नहीं लगाया जाता हे।

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