दावा, विवाद और दस्तावेज़
आंकड़ों के आईने में सच्चाई
देवानंद सिंह
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के फैसले को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। विपक्ष ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताते हुए सरकार पर निशाना साधा, जबकि सरकार ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मुद्दा करार दिया है। खासकर कपड़ा उद्योग को लेकर छिड़ी बहस ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में अमेरिकी टैरिफ से भारतीय वस्त्र उद्योग संकट में है, या फिर यह केवल राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा साझा किए गए एक वीडियो ने इस बहस को और तेज कर दिया। वीडियो में राहुल गांधी एक कपड़ा फैक्ट्री का दौरा करते दिखते हैं, जहां फैक्ट्री मालिक यह कहते नजर आते हैं कि उनकी यूनिट बंद होने की कगार पर है। राहुल गांधी ने इस उदाहरण के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय कपड़ा उद्योग की कमर तोड़ दी है और रोजगार पर सीधा असर पड़ा है।
लेकिन केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अमेरिकी टैरिफ का भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। उनका तर्क है कि किसी एक फैक्ट्री या व्यक्ति के अनुभव के आधार पर पूरे उद्योग की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। गिरिराज सिंह ने यह भी कहा कि राहुल गांधी द्वारा पेश किया गया वीडियो चयनित और भ्रामक है, जो पूरे सेक्टर की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता।
सरकार का कहना है कि भारत की असली ताकत उसके निर्यात के विविधीकरण में है। बीते कुछ वर्षों में भारत ने अपनी निर्यात नीति को एक देश या एक बाजार तक सीमित न रखकर 40 से अधिक नए देशों तक विस्तार किया है। इसके परिणामस्वरूप, हाल के वर्षों में 25 से ज्यादा देशों में भारतीय कपड़ा निर्यात में वृद्धि दर्ज की गई है। यह रणनीति अमेरिकी टैरिफ से काफी पहले अपनाई जा चुकी थी, जिससे भारत को किसी एक देश की व्यापारिक नीति पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।
सरकारी आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि कोविड के बाद टेक्सटाइल सेक्टर में गतिविधियां तेज हुई हैं। बाजार में 1.8 करोड़ नई सिलाई मशीनों का आना इस बात का संकेत है कि घरेलू उत्पादन और रोजगार दोनों में बढ़ोतरी हुई है। सरकार के अनुसार, इससे करीब 3 करोड़ रोजगार सृजित हुए हैं और आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और बढ़ेगा। अनुमान है कि इस दशक के अंत तक टेक्सटाइल सेक्टर में 5 करोड़ से अधिक नई नौकरियां पैदा होंगी।
निवेश के मोर्चे पर भी सरकार आत्मविश्वास से भरी नजर आती है। वर्ष 2025 में टेक्सटाइल सेक्टर में लगभग 65 हजार करोड़ रुपये का निवेश हुआ है। अगर भारत की अर्थव्यवस्था या कपड़ा उद्योग वास्तव में “डेड” होता, जैसा कि विपक्ष के कुछ बयान संकेत देते हैं, तो इतने बड़े पैमाने पर निवेश संभव नहीं होता। निर्यात के आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। दिसंबर 2024 में जहां कपड़ा निर्यात 27,710 करोड़ रुपये था, वहीं 2025 में यह 6.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 29,492 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
यह पूरा विवाद दरअसल एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या आर्थिक मुद्दों पर राजनीतिक बहस तथ्यों और दीर्घकालिक नीतियों के आधार पर होनी चाहिए, या फिर प्रतीकात्मक घटनाओं और भावनात्मक उदाहरणों के सहारे? किसी एक फैक्ट्री की समस्या वास्तविक हो सकती है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन उससे पूरे उद्योग के भविष्य का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं है।
आज जरूरत इस बात की है कि टेक्सटाइल जैसे रोजगार-प्रधान सेक्टर पर राजनीति से ऊपर उठकर गंभीर और तथ्यपरक चर्चा हो। सरकार को जहां जमीनी स्तर पर संघर्ष कर रही इकाइयों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए, वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह आलोचना के साथ-साथ रचनात्मक सुझाव दे। तभी यह बहस देश और उद्योग—दोनों के हित में सार्थक साबित हो

