“मोकामा में चली गोलियां, घायल हुआ लोकतंत्र”
दो बाहुबलियों की जंग ने फिर सवाल खड़ा किया ,बिहार में सत्ता की कुंजी अब भी बंदूक के साये में क्यों?
देवानंद सिंह
मोकामा की सियासत एक बार फिर बारूद की गंध से भर उठी है। जन सुराज समर्थक और बाहुबली नेता दुलारचंद यादव की हत्या ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को अचानक हिंसा और भय के घेरे में खड़ा कर दिया है। जिस धरती ने कभी लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी, वहां अब लोकतंत्र गोलियों की आवाज़ में दम तोड़ता दिख रहा है।
चुनाव आयोग की त्वरित कार्रवाई
अधिकारियों का तबादला, निलंबन और रिपोर्ट तलब—यह तो दर्शाती है कि संवैधानिक संस्थान सजग हैं, पर असली सवाल जस का तस है जब राजनीति बाहुबल के भरोसे चुनाव जीती जाए, तो जनता के वोट की ताकत की क्या अहमियत रह जाती है?
मोकामा की कहानी केवल दो बाहुबलियों अनंत सिंह और सूरजभान सिंह की व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि उस विफल राजनीतिक संस्कृति की तस्वीर है, जहां ‘छोटे सरकार’ और ‘सीमाओं से परे प्रभाव’ लोकतंत्र के प्रतीक बन गए हैं।
दुलारचंद की हत्या ने यह साबित किया है कि मोकामा में अब भी ‘बैलेट बनाम बुलेट’ की जंग खत्म नहीं हुई। प्रशासनिक सख्ती से व्यवस्था सुधर सकती है, पर लोकतंत्र तब तक सुरक्षित नहीं होगा जब तक राजनीति अपराध से पूरी तरह अलग नहीं होती।
बिहार की राजनीति के लिए यह सिर्फ एक हत्या नहीं यह लोकतंत्र की परीक्षा है।

