प्रशांत किशोर की ‘रणनीति राजनीति’ पर बड़ा सवाल: क्या सदमे में हैं PK या नई पारी की तैयारी?
राष्ट्र संवाद संवाददाता।
हालिया चुनाव परिणामों ने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर (PK) की भूमिका और प्रभाव पर नए सिरे से चर्चा छेड़ दी है। कभी खुद को ‘चुनाव जिताने वाली मशीन’ कहलवाने वाले PK के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि वे सदमे में हैं या फिर नई रणनीति के साथ वापसी की तैयारी कर रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि PK के दावे और हकीकत के बीच की दूरी अब पहले से कहीं ज्यादा उजागर हो गई है। बेहद आक्रामक बयानबाज़ी के साथ अपनी ‘बड़ी भूमिका’ का ढोल पीटने वाले PK के लिए आज का माहौल असहज है। विश्लेषकों के अनुसार, “2014 की जीत का पूरा श्रेय अपने सिर पर टांगकर चलने वाले अब समझ गए हैं कि जनता वोट रणनीति देखकर नहीं, नेतृत्व देखकर देती है।”
जनता के मूड, मेहनत और माहौल का चुनावी नतीजों पर असर तो होता है, लेकिन कुछ विशेषज्ञ राजनीति में ऐसे घूमते दिखाई देते थे जैसे पूरा देश उनके इशारे पर चलता हो। मगर चुनावी नतीजों ने फिर साबित कर दिया कि किरदार बदल सकते हैं, कहानी नहीं—और कहानी हमेशा जनता की इच्छा और नेतृत्व के भरोसे से लिखी जाती है।
आज स्थिति यह है कि जो खुद को चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा ‘गेमचेंजर’ बताते थे, वही अब अपने दावों के बोझ तले दबे दिखाई दे रहे हैं। जनता ने साफ संदेश दिया है कि चमक चाहे जितनी हो, वास्तविक शक्ति नेतृत्व की होती है—पोस्टरबाज़ों, ब्रांड विशेषज्ञों और रणनीति बेचने वालों की नहीं।
अब नजरें इस बात पर हैं कि प्रशांत किशोर इस चुनौती को एक झटका मानकर शांत हो जाएंगे या इसे नए उभार की शुरुआत में बदल देंगे।

