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    Home » बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की बढ़ती ताकत
    Headlines संपादकीय

    बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की बढ़ती ताकत

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 8, 2026Updated:February 8, 2026No Comments4 Mins Read
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    भारत–अमेरिका व्यापार समझौता: वैश्विक समीकरणों में भारत की बढ़त

    देवानंद सिंह :-

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सोमवार रात हुई टेलीफोन वार्ता ने भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों में एक निर्णायक मोड़ ला दिया। इस बातचीत के बाद अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करने का ऐलान हुआ। इतना ही नहीं, अमेरिका से भारत आयातित होने वाली वस्तुओं पर किसी भी प्रकार का टैरिफ न लगाने की सहमति भी बनी। दोनों नेताओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस समझौते की जानकारी दी, जिसे भारत की कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक्स’ पर लिखा कि “मेड इन इंडिया” उत्पादों पर टैरिफ में कटौती भारत के लिए खुशी का विषय है और इसके लिए उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप का आभार जताया। मोदी ने यह भी रेखांकित किया कि जब दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दो सबसे बड़े लोकतंत्र मिलकर काम करते हैं, तो इसका लाभ दोनों देशों की जनता को मिलता है। यह वक्तव्य केवल औपचारिक धन्यवाद नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की भूमिका का संकेत भी है।
    इस समझौते के राजनीतिक निहितार्थ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। मंगलवार को हुई एनडीए संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “विश्व पटल के केंद्र में भारत का आना इस सदी की सबसे बड़ी घटना है।” उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जब अमेरिका ने टैरिफ लगाया था, तब कुछ लोग भारत की वैश्विक स्थिति पर सवाल उठा रहे थे, लेकिन आज वही लोग निरुत्तर हैं। मोदी ने सांसदों से आह्वान किया कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर उद्योगपतियों, मैन्युफैक्चरर्स और निर्यातकों से संवाद करें, निर्यात बढ़ाने के लिए सकारात्मक माहौल बनाएं और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दें।
    आर्थिक दृष्टि से यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। भारत अमेरिका को हर साल लगभग 80.8 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जबकि अमेरिका से 44.4 अरब डॉलर का आयात करता है। इस तरह भारत के पक्ष में करीब 36.4 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस है। दवा सामग्री, टेलीकॉम उपकरण, कीमती पत्थर, पेट्रोलियम उत्पाद, सोना-आभूषण, कपास, लोहा-इस्पात, बिजली के उपकरण और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों में भारत की मजबूत उपस्थिति है। पिछले तीन महीनों से 50 प्रतिशत टैरिफ के कारण जिन निर्यातकों के सामने अनिश्चितता बनी हुई थी, अब उन्हें न केवल राहत मिलेगी, बल्कि कारोबार में नई ऊर्जा भी आएगी।
    इस डील का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत को अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलेगी। जहां पाकिस्तान और इंडोनेशिया पर 19 प्रतिशत, बांग्लादेश और वियतनाम पर 20 प्रतिशत तथा चीन पर 34 प्रतिशत टैरिफ है, वहीं भारत के लिए 18 प्रतिशत का टैरिफ उसे तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में खड़ा करता है। इससे “मेड इन इंडिया” उत्पादों की मांग बढ़ने और नए निवेश के अवसर खुलने की संभावना है।
    व्यापारिक संगठनों और उद्योग जगत ने इस समझौते का स्वागत किया है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि भारत अमेरिका से रक्षा उपकरण, कृषि उत्पाद और पेट्रोलियम आयात करेगा। इन शर्तों का पूरा विवरण समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर के बाद ही सामने आएगा। फिर भी, मौजूदा संकेत बताते हैं कि यह सौदा दोनों देशों के लिए ‘विन-विन’ स्थिति पैदा करता है।
    इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक रणनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूरोपीय यूनियन के साथ हाल ही में हुआ मुक्त व्यापार समझौता, घरेलू स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी पूंजी निवेश का प्रावधान, और अब अमेरिका के साथ यह व्यापारिक समझौता—ये सभी कदम एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं। अंतिम क्षण तक धैर्य बनाए रखना और सही समय पर सही चाल चलना मोदी की राजनीतिक शैली का परिचायक रहा है।
    कुल मिलाकर, भारत–अमेरिका व्यापार समझौता केवल टैरिफ में कटौती भर नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और आत्मविश्वास का प्रतीक है। यदि सरकार और उद्योग मिलकर गुणवत्ता, नवाचार और प्रतिस्पर्धा पर ध्यान दें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत न केवल तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बने, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में निर्णायक भूमिका भी निभाए। यही इस समझौते का सबसे बड़ा संदेश और महत्व है।

     

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