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    Home » अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: खड़ीबोली के प्रथम महाकाव्यकार
    मेहमान का पन्ना संपादकीय

    अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: खड़ीबोली के प्रथम महाकाव्यकार

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 15, 2026No Comments5 Mins Read
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    गणेश शंकर विद्यार्थी
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    खड़ीबोली हिंदी के प्रथम महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की पुण्यतिथि पर प्रमोद दीक्षित मलय का विशेष आलेख पढ़ें।

    • प्रमोद दीक्षित मलय

    हिंदी साहित्य इतिहास का आधुनिक काल खंड भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है, जिन्होंने हिंदी साहित्य की विविध विधाओं पर न केवल स्वयं खड़ीबोली में रचनाएं लिखीं बल्कि अन्यान्य लेखकों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित भी किया। पत्र-पत्रिकाओं का संपादन करते हुए लेखकों को अभिव्यक्ति हेतु अवसर और मंच उपलब्ध कराया। फलत: खड़ीबोली में कविताएं और गद्य रचनाओं का लेखन होने लगा। कविता लेखन को ब्रजभाषा से निकाल कर खड़ीबोली हिंदी के क्षेत्र में अंकुरित-पुष्पित करने का महनीय कार्य जिस व्यक्तित्व ने किया और खड़ीबोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ लिख साहित्य सागर को समृद्ध किया, वे लेखनी के धनी अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ थे, जिनका निधन देश के स्वतंत्रता प्राप्ति के पांच महीने पहले 16 मार्च, 1947 को निजामाबाद (आजमगढ़) हुआ था। मां भारती के साधक हरिऔध की पुण्यतिथि के अवसर पर उनका स्मरण समीचीन है।
    अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का जन्म 15 अप्रैल, 1865 को आजमगढ़ जनपद के निजामाबाद गांव में हुआ था। पिता पं. भोला सिंह उपाध्याय और माता रुक्मिणी देवी का प्यार-दुलार पाते शिशु की किलकारियां घर-आंगन में गूंजती रहतीं। जब वह केवल पांच वर्ष के थे, तब उनके चाचा ने फारसी सिखाना आरम्भ कर दिया था।‌ बाद में पाठशाला जाना हुआ और मिडिल कक्षा उत्तीर्ण कर आगे की पढ़ाई हेतु काशी के प्रसिद्ध क्वींस कालेज में प्रवेश लिया। पर बनारस की जलवायु बालक अयोध्या को रास न आई, और वह अस्वस्थ हो गये। उचित चिकित्सा से वह स्वस्थ तो हो जाते किंतु जल्दी ही पुनः अस्वस्थ हो जाते। इस कारण परिवार ने काशी से गांव निजामाबाद बुला कर घर पर पढ़ाई-लिखाई का समुचित प्रबंध कर दिया। उनमें सीखने का भाव कूट-कूट कर भरा था, शिक्षक द्वारा सिखाए पाठ वह यथाशीघ्र सीख-समझ लेते। इस तरह घर पर अध्ययन करते हुए संस्कृत, बांग्ला, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी पर समान अधिकार प्राप्त कर लिया। वर्ष 1883 में मिडिल स्कूल निजामाबाद में हेडमास्टर नियुक्त हो गये और अगले ही वर्ष 1884 में निर्मला कुमारी के साथ विवाह बंधन में बंध दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया। बचपन से ही प्रकृति की स्नेह-छांव मिली थी, घर पर ग्रंथों का पठन-पाठन होने से बालक अयोध्या में भी साहित्यिक अभिरुचि पनपने लगी और वह ब्रजभाषा में कविता करने लगे थे।‌ अध्ययन के प्रति रुचि और जिज्ञासा के चलते खूब पढ़ते। आगे 1889 में आप राजस्व विभाग में परीक्षा उत्तीर्ण कर कानूनगो पद पर नियुक्त हुए और लगभग चार दशक तक कार्य करके 1932 में अवकाश ले लिया। इसी मध्य आप साहित्य के क्षेत्र में एक चर्चित व्यक्तित्व बनकर उभरे। 1914 में खड़ीबोली हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ प्रकाशित हुआ और आपकी कीर्ति कौमुदी से हिंदी साहित्याकाश जगमगा उठा। इस महाकाव्य कृति पर आपको कालांतर में तत्कालीन प्रसिद्ध सम्मान मंगला प्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ, जिससे आपकी यश पताका देश में चतुर्दिक फहरने लगी। हिंदी साहित्य सम्मेलन 1924 के आयोजन में आपको सभापति बनाकर गौरवान्वित हुआ। आगे आपको विद्या वाचस्पति एवं कवि सम्राट की मानद उपाधि भेंटकर साहित्य समाज ने आनन्द का अनुभव किया।
    अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के रचना संसार की सीमा व्यापक है। आपके लेखन का आरम्भ ब्रजभाषा में कविता करने से अवश्य हुआ पर आप उस धारा से निकल खड़ीबोली हिंदी के प्रांजल प्रवाह में सम्मिलित हो गये। ठेठ हिन्दी का ठाठ और अधखिला फूल जैसे उपन्यास भेंट कर हिंदी का गौरव बढ़ाया तो रुक्मिणी परिणय और प्रद्युम्न विजय प्रभृति नाटकों की रचना की। लोकोक्ति एवं मुहावरों का प्रयोग करते हुए लोकभाषाबोली का रस ग्रहण कर चोखे-चौपदे तथा चुभते-चौपदे, रस कलश आदि रचनाएं लोक के हाथों में अर्पित की। लेकिन उनकी ख्याति प्रिय प्रवास के रचनाकार के रूप में ही रही। 17 सर्गों में विभाजित ‘प्रिय प्रवास’ में राधा-कृष्ण के प्रेम एवं वियोग का अद्भुत वर्णन हुआ है जो पाठक के हृदय को आर्द्र कर देता है। सीता-राम के जीवन चरित्र का चित्रांकन 18 सर्गों में आबद्ध ‘वैदेही वनवास’ में मिलता है जो 1940 में छपा। वर्ष 1937 में मुद्रित 15 सर्गों का महाकाव्य ‘पारिजात’ एक उल्लेखनीय कृति है। मौलिक लेखन के साथ ही हरिऔध जी ने अनुवाद के क्षेत्र में भी उपस्थिति दर्ज कराई और मर्चेंट आप वेनिस का खड़ीबोली हिंदी में अनुवाद किया- वेनिस का बांका, जो खूब सराहा गया।
    अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की भाषा में विविधता है। एक ओर वह संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली का अत्यधिक प्रयोग करते दिखते हैं, तो वहीं दूसरी ओर वह उर्दू-फारसी के शब्दों से भी खूब दोस्ती निभाते हैं। देसज शब्द और लोकोक्तियों के प्रयोग से वह पाठक को अपनी माटी की महक से परिचित कराते हैं तो ब्रजभाषा के प्रयोग से मधुरता और कोमलता का दर्शन भी कराते हैं। प्रकृति चित्रण से दृश्यों की सजीव प्रस्तुति मन को रससिक्त करती है। कविता के पारम्परिक संस्कृत भाषा के इंद्रवज्रा, शार्दूल विक्रीडित, शिखरिणी, मदाक्रांता छंदों पर काव्य रचना करते हैं तो छप्पय, दोहा, कवित्त और सवैया को भी नहीं भूलते। इसीलिए पाठक उनकी रुचिर रचनाओं में रमता चला जाता है।
    वर्ष 1932 में आपने कानूनगो पद से अवकाश लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में अवैतनिक प्राध्यापक पद का कार्यभार ग्रहण किया और 1942 में सेवानिवृत्त हुए। तत्पश्चात आप अपने गांव निजामाबाद आ गये और निरंतर लेखन साधना में सक्रिय रहे। अपनी जन्मभूमि में ही 16 मार्च, 1947 को आपने अंतिम सांस ले नश्वर देह मां भारती के चरणों में समर्पित कर दी। हिंदीखडी बोली के प्रथम महाकाव्यकार के रूप में सदा-सर्वदा स्मरण किए जाते रहेंगे। भारत सरकार ने हरिऔध जी पर एक विशेष डाक टिकट आजमगढ़ डाक प्रदर्शनी के दौरान 2 मार्च, 2013 को जारी किया था, जो स्मरणीय है।
    ••
    लेखक शिक्षक एवं शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं। बांदा, उ.प्र.
    मोबा. 9452085234

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