लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
सोनम वांगचुक के आमरण अनशन पर राजनीति गरमाई
सोनम वांगचुक, लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता, पिछले कई दिनों से दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठे थे। उनकी मांग लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और क्षेत्र की पारिस्थितिकी संरक्षण की थी, जिसके लिए वे सोनम वांगचुक लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। 17 जुलाई को उनके अनशन का 20वां दिन था, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके स्वास्थ्य को लेकर केंद्र सरकार को निर्देश दिए। लेकिन अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने उन्हें अनशन स्थल से जबरन हटा दिया। इस कार्रवाई ने देशभर में राजनीतिक हलचल मचा दी है।
सोनम वांगचुक: एक परिचय
सोनम वांगचुक लद्दाख के एक प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्होंने सेकमोल (SECMOL) की स्थापना की, जो एक वैकल्पिक शिक्षा संस्थान है। उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। वे लद्दाख की पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए लंबे समय से आवाज उठाते रहे हैं।
लद्दाख की संवैधानिक मांग
लद्दाख के लोग लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए। इससे स्थानीय जनजातीय समुदायों को अपनी जमीन, संस्कृति और संसाधनों पर अधिक अधिकार मिलेंगे। सोनम वांगचुक इस मांग के प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्होंने आमरण अनशन का रास्ता अपनाकर केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की।
दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
17 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने और उनके मानवाधिकारों की रक्षा करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि अनशनकारी के जीवन का अधिकार सर्वोपरि है।
झामुमो नेता सुप्रियो भट्टाचार्य का तीखा हमला
रांची: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने शनिवार को प्रेस वार्ता कर सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षाविद सोनम वांगचुक के आमरण अनशन के दौरान हुई कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। देश में अमृतकाल नहीं, बल्कि विषकाल का दौर चल रहा है।
सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि 17 जुलाई को सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का 20वां दिन था और उसी दिन दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके स्वास्थ्य को लेकर केंद्र सरकार को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अगले ही दिन सुबह बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस पहुंची और उन्हें अनशन स्थल से हटाया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार को उनके स्वास्थ्य की इतनी चिंता थी तो पिछले कई दिनों तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया।
झामुमो नेता ने आरोप लगाया कि संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले की गई यह कार्रवाई संयोग नहीं है। उन्होंने कहा कि 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार संविधान का 131वां संशोधन लाने की तैयारी में है। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है तथा जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने और लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने के लिए किया जा रहा है।
प्रेस वार्ता में सुप्रियो भट्टाचार्य ने केंद्र सरकार से लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट
इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए नागरिक समाज को सजग रहना होगा। सोनम वांगचुक की आवाज को दबाने का प्रयास संविधान की भावना के खिलाफ है। झामुमो सहित कई विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संसद में उठाने का ऐलान किया है।

