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    Home » कर्तव्य और संस्कार का अद्वितीय संगम, जब मुख्यमंत्री ने निभाया पुत्र और जनसेवक दोनों का धर्म
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    कर्तव्य और संस्कार का अद्वितीय संगम, जब मुख्यमंत्री ने निभाया पुत्र और जनसेवक दोनों का धर्म

    दिशोम गुरु की विदाई, एक युग का अंत
    News DeskBy News DeskAugust 17, 2025No Comments3 Mins Read
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    कर्तव्य और संस्कार का अद्वितीय संगम, जब मुख्यमंत्री ने निभाया पुत्र और जनसेवक दोनों का धर्म

    दिशोम गुरु की विदाई, एक युग का अंत

    अमन शांडिल्य

    झारखंड के संघर्ष इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय अब स्मृतियों में बदल गया। दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जाना केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे आंदोलन की क्षति है। जिनकी आवाज़ ने कभी जंगल-पहाड़ों से उठकर संसद के गलियारों तक दस्तक दी, जिनके नेतृत्व ने झारखंड को अस्तित्व दिलाया, वे आज भले ही देह रूप में हमारे बीच न हों, लेकिन उनके विचार और संघर्ष जीवित हैं।

     

     

    *पिता से मिले जीवन के पाठ*

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए शिबू सोरेन केवल पिता नहीं थे, बल्कि जीवन के पहले शिक्षक थे। उन्होंने बचपन से देखा कि कैसे गुरुजी हर अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, चाहे इसके लिए जेल ही क्यों न जाना पड़े। एक बचपन की घटना आज भी यादगार है — जब लंबे समय बाद पिता घर लौटे, तो नन्हें हेमंत ने कहा, “पिताजी, इतनी देर क्यों की?” और गुरुजी ने जवाब दिया, “पुत्र, यह देर तुम्हारे आने वाले कल के लिए थी।” यही संस्कार आज हेमंत के शासन और निर्णयों में झलकते हैं।

    संस्कार की मिसाल: सर मुंडन की परंपरा

    दशकर्म के अवसर पर मुख्यमंत्री ने राजकीय प्रोटोकॉल और व्यक्तिगत पद की गरिमा से ऊपर उठकर पुत्र का धर्म निभाया। उन्होंने परंपरा के अनुसार सर मुंडन कराया, जो सादगी, श्रद्धा और संस्कार का प्रतीक था। उस पल वे न मुख्यमंत्री थे, न राजनीतिक नेता — वे सिर्फ एक पुत्र थे, जो अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को निभा रहे थे। इस दृश्य ने याद दिलाया कि पद चाहे कितना भी ऊँचा हो, संस्कार सदैव सर्वोपरि होते हैं।

    *अंतिम संस्कार के 10 मार्मिक क्षण*

    1. मुखाग्नि से पहले पिता के पार्थिव शरीर के पास मौन खड़े रहना।

    2. पहली लकड़ी रखते समय हाथों का अनायास कांपना।

    3. आंसुओं को रोकने का असफल प्रयास।

    4. मां और भाइयों को ढांढस बंधाना।

    5. दूर-दराज से आए ग्रामीणों का हाथ थामकर आभार व्यक्त करना।


    6. अधिकारियों से धीमे स्वर में राज्य के जरूरी मामलों पर बात करना।

    7. चिता की लपटों के बीच अंतिम दृष्टि में ठहराव।

    8. गंगा जल अर्पित करते समय मौन प्रार्थना — “आपके सपनों को अधूरा नहीं छोड़ूंगा।”

    9. ग्रामीणों के बीच बैठकर संवेदनाएं स्वीकार करना।

    10. अगले ही दिन शासन कार्यों में लौटकर निर्णय लेना।

    *कर्तव्य का आदर्श*

    महाभारत में श्रीकृष्ण ने सिखाया था — “राजा का धर्म है कि वह प्रजा की सेवा में कभी विचलित न हो।” मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसी आदर्श को जीवन्त किया। निजी शोक के बीच उन्होंने न केवल परिवार का सहारा बना, बल्कि प्रशासन की गति भी थमी नहीं।

     

    *जनता के लिए सीख*

    इस घटना ने यह स्पष्ट किया कि एक सच्चे नेता की पहचान भाषणों में नहीं, बल्कि कठिनतम समय में निभाए गए कर्मों में होती है। हेमंत सोरेन का आचरण यह संदेश देता है कि राजधर्म और पुत्र धर्म, दोनों को साथ लेकर चलना ही एक सच्चे जननेता की असली पहचान है।

    *दिशोम गुरु की विरासत*

    झारखंड आंदोलन के अगुवा

    तीन बार मुख्यमंत्री

    आदिवासी भूमि और अधिकारों के प्रबल रक्षक

    केंद्रीय कोयला मंत्री के रूप में योगदान

    गांव-गांव पैदल जाकर जनता की समस्याओं से जुड़ना

    *हेमंत सोरेन की प्राथमिकताएं*

    आदिवासी कल्याण और शिक्षा सुधार

    रोजगार सृजन और कौशल विकास

    स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर निवेश

    पारदर्शी और जवाबदेह शासन

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