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    Home » निचली अदालतों की जल्दबाजी पर सुको सख्त, आरोपी की मौत की सजा को 30 साल कैद में बदला
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    निचली अदालतों की जल्दबाजी पर सुको सख्त, आरोपी की मौत की सजा को 30 साल कैद में बदला

    Devanand SinghBy Devanand SinghJanuary 19, 2022No Comments2 Mins Read
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    नई दिल्ली. हत्या और बलात्कार जैसे अपराध से जुड़े मामलों में फैसला सुनाने में निचली अदालतों की जल्दबाजी पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं. कोर्ट का कहना है कि आरोपी को अपनी सजा की मात्रा के संबंध में बहस करने के लिए पर्याप्त समय और मौका दिए जाने की बात कही है. कोर्ट साल 2017 के एक मामले पर सुनवाई कर रहा था, जहां एक आरोपी की मौत की सजा को 30 साल की जेल में बदला गया. जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और बीवी नागरत्ना की पीठ ने यह टिप्पणी की है.

    मध्य प्रदेश में साल 2017 में सामने आए 11 वर्षीय लड़की की हत्या औऱ बलात्कार मामले में कोर्ट ने आरोपी की मौत की सजा को 30 साल कैद में बदल दिया. कोर्ट ने कहा कि सजा निर्धारित करने में निष्पक्ष सुनवाई का उल्लंघन किया गया था, क्योंकि उसे सजा सुनाए जाने पहले कोर्ट की तरफ से मौका नहीं दिया गया. कोर्ट ने कहा कि खासतौर से मौत की सजा से जुड़े मामले में व्यक्ति को सजा की मात्रा पर बहस करने के लिए पर्याप्त समय और मौका दिया जाना चाहिए.
    कोर्ट ने कहा कि यह न्याय के साथ मजाक है, क्योंकि अपील करने वाले को खुद का बचाव करने का उचित मौका नहीं दिया गया. यह सही केस है, जो हत्या औऱ बलात्कार समेत मामलों में निचली अदालतों के जल्दबाजी में फैसला सुनाने की प्रवृत्ति को दिखाता है. अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है. कहा गया कि एक ही दिन में दोष सिद्ध होने और सजा सुनाने के आदेश जारी होने के संबंध में CrPC की धारा 235(2) का मकसद यह है कि आरोपी को अपने लिए मिली सजा के बारे में बात करने का मौका मिले.

    बेंच ने कहा कि आऱोपी को मौका देने के लिए दोष सिद्ध होने और सजा दिए जाने में दो हिस्सों में सुनवाई होना जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि आरोपी पहली बार अपराध करने वाला था, अनुसूचित जनजाति के गरीब परिवार से था, सुधार की संभावनाओं जैसे हालात पर निचली अदालत की तरफ से विचार नहीं किया गया.

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