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    Home » कल तक जो साथ रहे, आज कर रहे मल्लयुद्ध कोरोना काल में लाश और बदमाश की राजनीति कहीं खून खराबा न कर दे
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    कल तक जो साथ रहे, आज कर रहे मल्लयुद्ध कोरोना काल में लाश और बदमाश की राजनीति कहीं खून खराबा न कर दे

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 26, 2020No Comments7 Mins Read
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    कड़वा सच
    जय प्रकाश राय
    बिरसानगर में अधिवक्ता एवं भाजपा कार्यकर्ता प्रकाश यादव की हत्या के मुद्दे को लेकर सड़क एवं सोशल मीडिया पर पक्ष विपक्ष के बीच छिड़ा मल्लयुद्ध रुकने का नाम नहीं ले रहा है जो अब खतरनाक रुप ले रहा है। इसमेंं जिस तरह की भाषा और गाली गलौज का प्रयोग हो रहा हैं वह शहर के आपसी सौहाद्र्र , बौद्धिकता और राजनीतिक जागरुकता के सर्वथा विपरीत है। दिवंगत प्रकाश यादव एक अधिवक्ता भी थे और उनको लेकर वरीय अधिवक्ता तथा स्पेशल पीपी जय प्रकाश ने कहा भी कि इस मामले में राजनीति से दिवंगत अधिवक्ता की छवि खराब हो रही है। इस मामले में अधिवक्ताओं को किसी राजनीतिक मदद की जरुरत नहीं है। लेकिन ऐसा लगता है कि विगत चुनाव की राजनीति में पछाड़ खाने के बाद फिर से जमीन पकडऩे के लिये एक ओर जहां भाजपा से जुड़े लोग इस मुद्दे को हाथ से जाना देना नही ंचाहते। । वहीं विधायक पक्ष के लोग भी पिछले छह माह में चुनाव के बाद आई सुस्ती को रिचार्ज होने का बुस्टर मान बैठे हैं। बीच में छोटे और युवा समर्थक ऐसी टिप्पणी कर रहे हैं कि शांति व्यवस्था भंग होने का खतरा भी हो गया है। पुलिस प्रशासन को इस मामले में विधि व्यवस्था के नाते हस्तक्षेप करने की आवश्यता भी है।
    इस मल्लयुद्ध में शामिल अधिकांश लोग पिछले दो-तीन दशकों में एक मंच साझा करते आए हैं. उनके बीच दोस्ती भी रही है और दल बंटने के बाद विरोध भी देखा गया है। भाजपा के पुनर्गठन के बाद और उसके पहले जमशेदपुर में आये बिखराव के मद्देनजर जो समीकरण बने हैं वह हर हाल में प्रकाश यादव की हत्या को मु्द्दा बनाकर अभियुक्त अमूल्यो कर्मकार के साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं जैसा कानपुर में विकास दुबे को लेकर मेरा- तेरा किया गया था। कल तक साथ रहने वाले लोग ऐसी भाषा और ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं जो कटुता की हद पार कर रहा है और मौका मिले तो लगता है एक दूसरे के साथ आमने सामने कुश्ती भी कर बैठें। जमशेदपुर की यह बैद्धिकता विहीन, जातिसूचक और बाप दादा को उघटने -पघटने की नई संस्कृति देखी जा रही है।
    . भाषा का स्तर अब सीधे-सीधे गाली गलौज और एक दूसरे को भावनात्मक रुप से चोट पहुंचाने का हो गया है। संगठन के बड़े लोग मूक द्रष्टा बने हुए हैं जबकि इसमें वयानबीर लोग यह नहीं समझ रहे कि राजनीति में इस्तेमाल कर किसी को कैसे फेंका जाता है। सोशल मीडिया में ये फालोअर अपने जिन तथाकथित आकाओं के लिए लड़ रहे हैं वे सबकुछ होता देख रहे हैं. उनकी भूमिका इस समय सबसे ज्यादा बढ़ जाती है क्योंकि यदि कोई अनहोनी घट गयी तो खामियाजा मल्लयुद्ध में शामिल कार्यकर्ताओं एवं उनके परिवार को ही भोगना होगा. प्रकाश यादव के बाद फिर किसी लाश की राजनीति शुरू होगी. कुछ दिन नया मल्लयुद्ध चलेगा लेकिन वह कार्यकर्ता और उसका परिवार उसके बाद कहां रहेगा कोई पूछने वाला नहीं होगा। हर कार्यकर्ता का अपना परिवार है। उसकी चिंता कौन करेगा? कुछ अनहोनी होने के बाद झेलना उसी परिवार को पड़ेगा।
    लगभग तीन दशक तक जमशेदपुर का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास नजदीक से देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ है. उसके अनुभव साफ बताते हैं कि आज जो लोग इस मल्लयुद्ध में शामिल हैं उनमें अधिकांश का करियर इसी अवधि में शुरू हुआ है. उनमें यह उग्रता कब और कैसे आ गयी, पता ही नहीं चला। हाल तक इनमें अधिकांश एक-दूसरे के साथ ही झंडा ढोते और नारेबाजी करते नजर आया करते थे. एक चुनाव ने झंडा बदल दिया और नारेबाजी का अंदाज भी. रही सही कसर सोशल मीडिया पूरी कर रही है. कोई एक पोस्ट आता नहीं कि उसके बाद हमला शुरू हो जाता है. बिलो बेल्ट लड़ाई होने के कारण शहर का माहौल दूषित होता जा रहा है. प्रकाश यादव की हत्या से हर कोई दुखित ,आहत है. दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए लेकिन इसकी आड़ में राजनीति चमकाने और शहर का माहौल खराब करने का जो खेल खेला जा रहा है वह चिंताजनक है. कोरोना के इस काल में जब समाज का हर वर्ग दुखित आहत परेशान है. हाल तक जो लोग अभाव में जीने वालों के बीच राशन , भोजन का पैकेट वितरित कर रहे थे, अचानक उन लोगों को वे कैसे भूल सकते हैँ। क्या उन लोगों की दशा में सुधार हो गया है? लोग अपनी जिम्मेदारी को कैसे भूल सकते हैं। लाश की राजनीति करने के मौका बहुत मिलेगा, कोरोना काल में यह मनोवृति आम लोगों को रास नही ंआ रही है।
    जिस अमूल्यो कर्मकार को लेकर यह मल्ल युद्ध छिड़ा हुआ है, उसका उदय भी इसी ढाई दशक के दौरान हुआ है। अमूल्यो कर्मकार की छवि एक जमीन माफिया की आज की नही ंहै। वह लंबे समय से बिरसानगर में जमीन का जायज नाजायज धंधा चला रहा था। वह कई संगठनों को संचालित करता था और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करता था। इस दौरान हर बड़ा राजनीतिक व्यक्ति उसके कार्यक्रमों में शामिल होता रहा है। आज उन कार्यक्रमों के फोटो सोशल मीडिया में वायरल किये जा रहे हैं। दूसरे पक्ष की नजदीकी दर्शाने के लिये एक फोटो डालने पर दस फोटो पहले पक्ष से जुड़े लोगों के साथ डाल दिया जा रहा है। प्रकाश यादव के परिवार को सरकार कैसे मुआवजा दे, कैसे उसके तीन छोटे छोटे बच्चों का और माता सहित परिवार का पालन पोषण हो, यह सोशल मीडिया पर कहीं दिखाई नहीं देता। इंडियन एसोसिएशन आफ लायर्स के ए के राशिदी तथा जिला बार एसोसिएशन की ओर से कुछ सदस्यों ने मृतक के परिवार को एक करोड़ की क्षतिपूर्ति की मांग की है। अच्छा होता प्रकाश यादव के परिवार का कुछ कल्याण किया जाता तो इससे राजनीति सकारात्मक रुप से चमकती और स्थाई भी कही जाती। लेकिन यहां तो तू तू मैं मैं के बीच एक दूसरे पर ही भड़ास निकालने गुस्सा उतारने तथा अमूल्यो कर्मकार का संरक्षक साबित करने की होड़ लग गयी है।
    पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान से जो तल्खी शुरु हुई वह बढती ही जा रही है। यह माना जा रहा है कि शहर में पिछले एक लंबे अरसे से जिन राजनीतिक लोगों का एक छत्र राज कायम था, जिनके इशारे पर थाना, पुलिस, प्रशासन काम करने को उद्दत होते थे, उसमें क्षरण आ गया है और ऐसे लोगों की पूछ कम हो गयी है जिसको वे इस बहाने एक बार फिर साबित करने पर आमादा हो गये हैं। जमशेदपुर में जो राजनीतिक बदलाव आया वह लोगों का गुस्सा और असंतोष था। इस तरीके से इस गुस्से और असंतोष को दूसरे पक्ष पर डालने की हो रही कोशिशों को जनता देख रही है। विधायक के चुनाव में अमूल्यो कर्मकार ने अपना पाला बदला। उसे बिरसानगर मंडल का प्रभारी बनाकर जनमोर्चा ने जो गलती की वैसी गलतियां आज राजनीति में ऊपर से नीचे तक हो रही हैं जिसके झारखंड भाजपा में ही कई उदाहरण हैं। लेकिन इस मुद्दे को लेकर जो तू तू मैं मैं और एक दूसरे पर गंदे शब्दों का प्रयोग शुरु हुआ है, वह कहीं से स्वीकार नहीं होता। अमूल्यो कर्मकार को लेकर छिड़ी कुश्ती में भले ही पूर्व मुख्यमंत्री ने वर्तमान विधायक को पटक दिया हो लेकिन वर्तमान विधायक ने कहा है कि अभी साढे चार साल का समय बाकी है।उन्होंने ट्वीटर पर लिखा है , उनके साथ कोई अपराधी नहीं रह सकता। वह स्वमेव खुद को उनसे अलग समझें, लेकिन दूसरा पक्ष अपने साथ घूमने वाले दबंग लोगों को देखे। अभय सिंह को भी संयम दिखाते हुए वयान देना चाहिये क्योंकि कल तक वे अपने नये साथियों की आंखों के किरकिरी थे। उनकी बैद्धिकता और नपी तुली वयानवीरता की लोग कद्र करते थे।
    लेखक हिंदी दैनिक चमकता आईना के संपादक हैं

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