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    Home » पालघर की दर्दनाक घटना से उठे कई सवाल
    Headlines मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय संवाद विशेष

    पालघर की दर्दनाक घटना से उठे कई सवाल

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 21, 2020No Comments5 Mins Read
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    अतुल सिन्हा

    पूरी दुनिया बेशक कोरोना के आतंक और दहशत में डूबी हो, लेकिन इस हालत में भी इंसानों की हैवानियत के दर्दनाक किस्से अगर सामने आ रहे हों, तो इसे क्या कहेंगे? आप देशभर में लॉकडाउन लागू कराते रहिए, मौत और महामारी के डर से लोगों को घरों में रहने के निर्देश देते रहिए, लेकिन जिस देश में अब भी भीड़तंत्र कहर बरपाने से बाज न आ रहा हो, वहां कोरोना जैसी महामारी से लड़ना कितना मुश्किल है, समझा जा सकता है।
    प्रधानमंत्री बार बार कह रहे हैं कि घर में रहें, सड़कों पर न निकलें, महामारी का कोई मजहब नहीं होता लेकिन अब भी लोग हैं कि मानते नहीं। तो क्या प्रधानमंत्री की अपील उन लोगों तक नहीं पहुंच रही, या फिर लोग उन्हें अब भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं? महाराष्ट्र के पालघर की दर्दनाक घटना ने कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं।

    पहले से ये सवाल तो लगातार उठ ही रहे थे कि आखिर इतनी पाबंदियों के बावजूद लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर कैसे आ जा रहे हैं, कैसे इतने सारे तबलीगी जमात के लोग इतने दिनों तक इकट्ठे रहते हैं और देशभर में फैल जाते हैं, कैसे तमाम मंदिरों और इबादतगाहों में अब भी सैकड़ों लोग जमा हो जाते हैं, कैसे हज़ारों मजदूर बिना अपनी जान की परवाह किए पैदल ही हजारों किलोमीटर की यात्रा करके अपने घरों के लिए निकल पड़ते हैं और कैसे पुलिस और डॉक्टरों की टीम पर भीड़ हमला कर देती है, कैसे निहंगों की हिंसक टोली पुलिसवालों पर तलवारों से हमला कर देती है और अब कैसे पालघर में तीन साधुओं को भीड़ बुरी तरह से पीट पीट कर मार डालती है?

    दरअसल, इस देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं पिछले सात-आठ सालों में जिस तरह बढ़ी और इसके शिकार तमाम वो लोग हुए जिन्होंने कोई गुनाह नहीं किया, जो किसी न किसी अफवाह के शिकार हुए और जिन्हें धर्म के हिंसक ठेकेदारों ने अपनी वीभत्स मानसिकता का शिकार बनाया, लेकिन आज के इस दौर में चोर-डाकू समझकर साधुओं को पुलिस के सामने इस तरह मार डाला जाए, ये बात गले से नहीं उतरती।

    दरअसल, पालघर जिला आदिवासी बहुल है और खबरों के मुताबिक वहां डाकुओं का खासा आतंक रहा है। अक्सर वहां के आदिवासियों और स्थानीय नागरिकों की मुठभेड़ डाकुओं से या असामाजिक तत्वों से होती है। पुलिस की भूमिका वहां अक्सर संदेहों में होती है। पुलिस वालों के लिए चोरी डकैती रोकने की जगह कई बार ऐसे गिरोहों को संरक्षण देने के आरोप भी लगते रहे हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि वहां तैनात पुलिसवाले अपराधियों के प्रभाव में ज्यादा रहते हैं?

    कोरोनावीरों’ की तरह जिन पुलिसकर्मियों का देश सम्मान कर रहा है, ऐसे संकट के दौर में सख्ती से लॉकडाउन लागू कराने को लेकर, लोगों की मदद करने को लेकर, गरीबों को खाना खिलाने को लेकर जो मानवीय चेहरा पुलिसवालों का दिख रहा है, वहां ये भी ताज्जुब की ही बात है कि पालघर में उनसे मदद की गुहार करने वाले और उनका हाथ थाम कर चलने वाले तीन निहत्थे साधु भीड़ के हवाले कर दिए जाते हैं, पुलिस तमाशा देखती है और सैकड़ों लोगों की भीड़ इन्हें पीट-पीटकर मार देती है। साधुओं का आखिर क्या कुसूर था, क्यों लोग उनसे इस कदर खफा थे या क्यों लोग कथित तौर पर डाकू मानकर इन्हें इस निर्ममता से मारते रहे और क्यों पुलिस कुछ नहीं कर पाई?
    खास बात ये है कि पूरे देश में लॉकडाउन है। महाराष्ट्र की हालत सबसे ज्यादा खराब है। वहीं से सबसे ज्यादा लॉकडाउन का उल्लंघन करने की खबरें भी आ रही हैं। मुंबई के तमाम इलाकों में अब भी लोगों की भीड़ सड़कों पर दिखती है, तमाम बाजारों में भीड़ नज़र आती है और बांद्रा स्टेशन के बाहर हजारों मजदूर जमा हो जाते हैं। इसे सियासी चश्में से देखें तो क्या ये इसलिए है कि वहां अब भाजपा की सरकार नहीं है या शिवसेना-कांग्रेस की सरकार से हालात संभाले नहीं संभल रहे या वहां प्रधानमंत्री की अपील को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा? लेकिन राजस्थान और पंजाब में भी तो भाजपा की सरकार नहीं है, वहां तो सबसे पहले लॉकडाउन हुआ लेकिन सड़कों पर भीड़ की खबर तो वहां इक्का दुक्का ही आईं। फिर महाराष्ट्र में ही ऐसा क्यों है?

    पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस से लेकर तमाम सियासी पार्टियां ये सवाल उठा रही  हैं कि आखिर महाराष्ट्र में ये क्या हो रहा है? राज्य के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री दोषियों को सजा देने जैसे घिसे पिटे जुमले ही बोल रहे हैं, लेकिन वहां की कानून व्यवस्था की हालत को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि आने वाला वक्त वहां सत्ता के लिए बने नए सियासी समीकरण बिगाड़ सकता है। फिर से वहां के ‘स्वाभाविक दोस्तों’ के बीच नज़दीकियां बढ़ने के आसार दिखने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अगर कोरोना नहीं होता तो मध्य प्रदेश के बाद महाराष्ट्र की ही बारी रही है। ऐसे में अब कोरोना के आतंक का उस तरह असर न दिखना, लॉकडाउन का ठीक तरह से पालन न हो पाना और साधुओं का भीड़तंत्र का शिकार बन जाना… कहीं न कहीं कुछ संदेह ज़रूर पैदा करता है।

     

     

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