
आस्था, अभिव्यक्ति और मर्यादा के बीच उलझता सनातन विमर्श
श्रीराम की मर्यादा और श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा पर विवाद आखिर क्यों?
देवानंद सिंह
सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापकता, विविधता और उदारता है। यहां भगवान श्रीराम मर्यादा, न्याय और आदर्श शासन के प्रतीक हैं, तो भगवान श्रीकृष्ण प्रेम, करुणा, माधुर्य और शरणागति के उपास्य हैं। श्रीराम की सीधी मुद्रा और श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा दोनों के अपने आध्यात्मिक अर्थ और सांस्कृतिक महत्व हैं। एक की महानता बताने के लिए दूसरे की विशेषताओं को कमतर आंकना आखिर किस धार्मिक विवेक का परिचायक है?
कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के श्रीराम और श्रीकृष्ण की मुद्राओं को लेकर दिए गए बयान के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उसने एक बार फिर धार्मिक अभिव्यक्ति की मर्यादा पर बहस छेड़ दी है। मामला इतना बढ़ा कि शास्त्री को सफाई देने के साथ क्षमा याचना भी करनी पड़ी। सवाल यह नहीं है कि किसी कथावाचक को अपनी धार्मिक व्याख्या रखने का अधिकार है या नहीं, सवाल यह है कि क्या ऐसी व्याख्या करते समय शब्दों और भावों की संवेदनशीलता का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए?
पिछले तीन वर्षों में हिंदू देवी-देवताओं के कथित अपमान की 28 घटनाओं का दावा भी चिंता पैदा करता है। हालांकि, ऐसे आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि और प्रत्येक घटना के संदर्भ की जांच जरूरी है। किसी भी धर्म की आस्था को जानबूझकर चोट पहुंचाना निंदनीय है, लेकिन हर असहमति को अपमान बताकर विवाद खड़ा करना भी उचित नहीं।
धर्म समाज को जोड़ने का माध्यम है, विभाजन का नहीं। संतों और कथावाचकों की जिम्मेदारी सामान्य वक्ताओं से कहीं अधिक है, क्योंकि उनके शब्द लाखों श्रद्धालुओं को प्रभावित करते हैं। इसी तरह भक्तों की भी जिम्मेदारी है कि वे सोशल मीडिया की अधूरी क्लिप और भ्रामक पोस्ट के आधार पर निर्णय न लें।
श्रीराम और श्रीकृष्ण में श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की दो अनुपम आध्यात्मिक धाराएं हैं। आस्था का सम्मान हो, अभिव्यक्ति में मर्यादा रहे और विवाद की जगह संवाद को मिले प्राथमिकता। यही सनातन की वास्तविक शक्ति है।

