

भाजपा नेता अनिल सिंह का खुला पत्र
खुला पत्र लिखने से मेरा राजनीतिक नुकसान हो सकता है, लेकिन मेरे नुकसान से कार्यकर्ताओं का सम्मान, एवं पार्टी का स्वाभिमान बना रहेगा तो इससे बड़ा राजनीतिक गौरव मेरे लिए कुछ भी नहीं !
भाजपा में संगठन सर्वोपरि था, आज संगठन से ऊपर व्यक्ति (नेता) हो गए हैं!
भारतीय जनता पार्टी की संस्कृति, विचारधारा और संगठनात्मक कार्यशैली की पहचान उसके समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। लेकिन आज एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि संगठन में कौन विचारधारा के प्रति समर्पित कार्यकर्ता या केवल नेताओं की परिक्रमा करके पद हासिल करने वाले।
आज स्थिति यह दिखाई दे रही है कि वर्षों तक संगठन और विचारधारा के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता निराश बैठे हैं, जबकि नेताओं के इर्द-गिर्द रहने वाले, उनके व्यक्तिगत कार्यक्रमों में सक्रिय रहने वाले और उनकी सेवा में लगे रहने वाले लोग संगठनात्मक पदों पर पहुँच रहे हैं।
सत्ता और संगठन के विस्तार के नाम पर दूसरे दलों से आने वाले लोगों को भी बिना पर्याप्त संगठनात्मक परख के महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंप दी जाती हैं। सवाल यह है कि क्या केवल चुनाव जिताने की क्षमता ही संगठनात्मक पद पाने की योग्यता होनी चाहिए? क्या विचारधारा, निष्ठा, अनुभव और वर्षों के संघर्ष का कोई महत्व नहीं रह गया है?
एक समय था जब कोई कितना भी प्रभावशाली, धनवान या बाहुबली व्यक्ति किसी जनपद में बड़े नेता का कार्यक्रम कराने का प्रयास करता था, तो उसे मंडल अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष की जानकारी और सहमति के बिना आगे बढ़ना आसान नहीं था। संगठन की अपनी गरिमा थी, पदाधिकारियों का सम्मान था और कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
आज स्थिति यह है कि बड़े-बड़े नेता स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम कर लेते हैं, केक काटे जाते हैं, आयोजन होते हैं और कई बार संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को इसकी जानकारी तक नहीं होती। यह बदलाव आखिर किस दिशा में ले जा रहा है?
यदि संगठन को चलाने की समझ रखने वाले इतने विधायक और सांसद हैं, तो जिला से लेकर प्रदेश तक संगठन के सभी दायित्व उन्हीं के हाथों में क्यों न सौंप दिए जाते? और जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संगठन के लिए काम किया है, उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर क्यों न दिया जाता? शायद तब यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि संगठन में कितने लोग वास्तव में संगठन चलाना चाहते हैं और कितने लोग केवल अपने आसपास व्यक्तिगत सेवा करने वाले लोगों की टीम चाहते हैं।
आज कार्यकर्ता की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वह अपनी बात किससे कहे? कितने जनप्रतिनिधि और पदाधिकारी कार्यकर्ताओं के फोन उठाते हैं? कितने उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनते हैं? कई जगह कार्यकर्ता अपने ही नेताओं तक पहुँचने के लिए परेशान है। नेता अपने सीमित दायरे में व्यस्त हैं, अधिकारी अपनी कार्यशैली में व्यस्त हैं और जमीनी कार्यकर्ता अपनी समस्याओं के साथ अकेला खड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कार्यकर्ता को चुनाव से पहले देवतुल्य कहा जाता है, सरकार बनने के बाद वही कार्यकर्ता उपेक्षित क्यों हो जाता है?
भाजपा की असली ताकत उसके कार्यालय, भवन, सोशल मीडिया के व्यूज, गाड़ियाँ या बड़े-बड़े कार्यक्रम नहीं हैं। उसकी असली ताकत वह कार्यकर्ता है, जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का झंडा और विचारधारा नहीं छोड़ी।
संगठन में पद किसी की व्यक्तिगत कृपा से नहीं, बल्कि योग्यता, अनुभव, समर्पण, विचारधारा और संगठनात्मक योगदान के आधार पर मिलने चाहिए।
नेताओं को यह समझना होगा कि कार्यकर्ता उनके दरवाजे पर खड़ा कोई व्यक्तिगत सेवक नहीं, बल्कि संगठन की रीढ़ है।
सच कड़वा हो सकता है, लेकिन आत्ममंथन जरूरी है। यदि समय रहते संगठन ने अपने समर्पित कार्यकर्ताओं का सम्मान और महत्व वापस नहीं लौटाया, तो संगठन और कार्यकर्ता के बीच बढ़ती दूरी पर गंभीरता से विचार करना होगा।
याद रखिए, भाजपा कार्यकर्ताओं से बनी है, केवल नेताओं से नहीं। संगठन सर्वोपरि था, है और रहना चाहिए।
वर्तमान परिस्थित में मन का दर्द बाहर आ ही जाता है,कुछ पहले बीजेपी कार्यकर्ता अंतरात्मा की आवाज से नारा लगाते थे…
मंगल भवन अमंगल हारी,
देश के नेता अटल बिहारी।
पूरे देश में एक चिंगारी
अटल बिहारी, अटल बिहारी।
ये नारा नहीं कार्यकर्ताओं का अपने नेता के लिए हृदय से प्रार्थना था।
यही नहीं कमल निशान को भारत के समस्त लोगों की पहचान बनाने वाले कार्यकर्ता निष्ठा से चिल्लाते दिखते थे…
घर की इज्जत घर की शान,
कमल निशान कमल निशान।
भाई बहनों की पहचान,
कमल निशान, कमल निशान
व्यापारी भाईयों की पहचान,
कमल निशान कमल निशान।
पढ़े लिखो का है शान,
कमल निशान कमल निशान।
लाल किले पर कमल निशान,
माँग रहा है हिंदुस्तान।
लेकिन बीजेपी की संस्कृति बदली, विचारधारा बदली और वह सब बदल गया जो भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं का मान सम्मान एवं स्वाभिमान की रक्षा करता था। हो सकता है मैंने जो लिखा है वह किसी को पीड़ादायक लगे लेकिन जो कमल लाल किले पर जा पहुँचा है वो पुन: गिरे न इसलिए यह मन बेचैन होकर लिख दिया !

