

दुनिया भर के युवाओं में क्यों बढ़ रहा असंतोष?
– महेन्द्र तिवारी
दुनिया तेजी से बदल रही है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हो रही है। बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हो रहे हैं और अर्थव्यवस्थाओं के विकास के दावे किए जा रहे हैं। इसके बावजूद दुनिया के अनेक देशों में युवा पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। रोजगार की कमी, महँगाई, महँगा आवास, शिक्षा का बढ़ता खर्च और आर्थिक असुरक्षा ने युवाओं के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। यही कारण है कि उनकी चिंताएँ अब व्यक्तिगत परेशानी तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनती जा रही हैं।
हाल के दिनों में जर्मनी और फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों में युवाओं के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों ने इस समस्या को दुनिया के सामने रखा है। इन आंदोलनों में युवाओं ने बेहतर शिक्षा, रोजगार के अवसर, किफायती आवास और जीवनयापन की बढ़ती लागत से राहत देने की माँग की है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि आर्थिक विकास के आँकड़े और आम नागरिकों के जीवन की वास्तविक परिस्थितियाँ हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया के युवाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 12.4 प्रतिशत हो गई। लगभग 6.7 करोड़ युवा बेरोजगार थे। रिपोर्ट यह भी बताती है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में युवाओं के लिए रोजगार प्राप्त करना पहले की तुलना में कठिन हुआ है। उत्तरी अमेरिका में युवा बेरोजगारी की दर वर्ष 2023 के 8.3 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 9.8 प्रतिशत हो गई। उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप में यह दर लगभग 15 प्रतिशत रही।
इन आँकड़ों का अर्थ केवल इतना नहीं है कि युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है। इसके पीछे एक बड़ी समस्या रोजगार की गुणवत्ता भी है। अनेक युवा अपनी योग्यता के अनुरूप काम पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुछ को अस्थायी रोजगार मिलता है, जबकि दूसरे कम वेतन पर काम करने को विवश हैं। नौकरी मिलने के बाद भी यह निश्चित नहीं होता कि उनकी आय नियमित रहेगी और भविष्य सुरक्षित होगा।
जब शिक्षा पूरी करने के बाद भी आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन हो जाता है, तो युवाओं में निराशा बढ़ना स्वाभाविक है।
युवाओं की आर्थिक चिंताओं का दूसरा बड़ा कारण जीवनयापन की बढ़ती लागत है। भोजन, परिवहन, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और आवास पर होने वाला खर्च लगातार उनके बजट को प्रभावित करता है। विशेष रूप से बड़े शहरों में किराये की ऊँची दरों के कारण कम आय वाले युवाओं के लिए स्वतंत्र रूप से रहना कठिन होता जा रहा है।
यूरोप में हाल के प्रदर्शनों के दौरान आवास और महँगाई का मुद्दा प्रमुखता से उठा। जब किसी युवा की आय का बड़ा हिस्सा केवल किराया और आवश्यक वस्तुओं पर खर्च हो जाता है, तो बचत करना, परिवार शुरू करना अथवा अपने भविष्य के लिए निवेश करना कठिन हो जाता है।
यह समस्या केवल यूरोप तक सीमित नहीं है। भारत सहित अनेक विकासशील देशों के बड़े शहरों में भी युवाओं को शिक्षा, रोजगार और आवास के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। आर्थिक स्वतंत्रता का सपना तब अधूरा रह जाता है, जब नियमित आमदनी के बावजूद बुनियादी जरूरतें पूरी करना चुनौती बन जाए।
31 अक्टूबर 2026 को जर्मनी के 34 शहरों में युवाओं के नेतृत्व में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाने, जीवनयापन की लागत कम करने तथा अनिवार्य सैन्य सेवा का विरोध करने जैसी माँगें उठाईं। अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, हालाँकि कुछ स्थानों पर हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएँ भी हुईं।
फ्रांस में भी युवाओं और अन्य सामाजिक समूहों ने शिक्षा व्यवस्था, सार्वजनिक सेवाओं, महँगाई और रोजगार की समस्याओं को लेकर विरोध जताया। इन आंदोलनों में एक साझा भावना दिखाई देती है। युवाओं को लगता है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त गंभीरता से नहीं सुना जा रहा है और नीतियाँ बनाते समय उनकी आवश्यकताओं को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जाता।
इन घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र में अपनी बात रखने का एक माध्यम है। सरकारों को हिंसा रोकने के साथ उन आर्थिक और सामाजिक कारणों पर भी विचार करना चाहिए, जिनसे असंतोष पैदा हो रहा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन ने रोजगार की दुनिया में नए अवसर पैदा किए हैं, लेकिन इनके कारण कुछ पारंपरिक नौकरियों के स्वरूप में भी बदलाव आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के युवाओं द्वारा किए जाने वाले लगभग 6.1 प्रतिशत रोजगार ऐसे क्षेत्रों में हैं, जिन पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े बदलावों का अधिक प्रभाव पड़ सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी नौकरियों का अंत हो जाएगा। बल्कि अनेक कार्यों की प्रकृति बदल सकती है और नए कौशलों की आवश्यकता बढ़ सकती है। समस्या तब पैदा होती है, जब शिक्षा और प्रशिक्षण व्यवस्था इस परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को समय पर नहीं ढाल पाती।
इसलिए युवाओं को केवल प्रमाणपत्र देने के बजाय व्यावहारिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता, रचनात्मक सोच और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करने पर जोर देना चाहिए। साथ ही, काम कर रहे लोगों के लिए भी नए कौशल सीखने के अवसर उपलब्ध होने चाहिए।
भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है। लेकिन इस संभावना को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए पर्याप्त और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना आवश्यक है। शिक्षा प्राप्त युवाओं की आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं। वे आर्थिक स्वतंत्रता, सुरक्षित भविष्य और अपनी योग्यता के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर चाहते हैं।
यदि आर्थिक विकास के साथ गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं बढ़ते, तो युवाओं की अपेक्षाओं और वास्तविक अवसरों के बीच दूरी बनी रह सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का अभाव, महिलाओं के लिए काम की सीमित उपलब्धता और असंगठित क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा की कमी भी गंभीर प्रश्न हैं।
सरकारों को उद्योगों के विस्तार, छोटे कारोबार को प्रोत्साहन, कौशल विकास और रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, युवाओं को अपने विचार व्यक्त करने और नीतिगत चर्चाओं में भाग लेने के अवसर मिलने चाहिए।
युवाओं की आर्थिक चिंताओं का समाधान बहुआयामी प्रयासों से ही संभव है। सरकारों को रोजगार सृजन के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सामाजिक सुरक्षा पर पर्याप्त निवेश करना होगा। उद्योगों को भी ऐसे कार्यस्थल विकसित करने चाहिए, जहाँ उचित वेतन, सुरक्षित वातावरण और आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध हों।
इसके साथ ही, युवाओं की समस्याओं को समझने के लिए उनसे नियमित संवाद आवश्यक है। उनकी शिकायतों को केवल असंतोष या अनुशासनहीनता मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि वह नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझे और उन्हें नीतियों में स्थान दे।
युवाओं की आर्थिक चिंताएँ वास्तव में समाज और शासन के सामने खड़ा एक बड़ा प्रश्न हैं। यदि आज उनकी शिक्षा, रोजगार और भविष्य की सुरक्षा पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका प्रभाव आने वाले वर्षों की सामाजिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति पर पड़ सकता है। दुनिया के देशों को यह समझना होगा कि युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान के सक्रिय भागीदार भी हैं। उनके सपनों को अवसरों में बदलना ही समावेशी विकास की वास्तविक कसौटी है।

