लेखक: देवानंद सिंह
नेपाल की विनाशकारी बाढ़ ने केवल हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर नहीं किया है, बल्कि दुनिया के सामने जलवायु न्याय का एक पुराना और गंभीर सवाल भी खड़ा कर दिया है। नेपाल द्वारा भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े उत्सर्जक देशों से जलवायु-संबंधी नुकसान के लिए मुआवजे की मांग इसी सवाल को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नए सिरे से उठाती है।
जलवायु न्याय और साझा जिम्मेदारी
नेपाल का तर्क है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उसका योगदान बेहद कम है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम उसे भारी कीमत चुकाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। पिघलते ग्लेशियर, अतिवृष्टि, बाढ़ और भूस्खलन हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। इसलिए आपदा के बाद मिलने वाली सहायता को केवल दान मानने के बजाय जलवायु न्याय और साझा जिम्मेदारी के नजरिये से देखने की नेपाल की मांग को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक अध्ययन और पारदर्शी प्रक्रिया की आवश्यकता
लेकिन इस मांग के साथ एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी विशेष बाढ़ या आपदा के लिए किसी एक देश को सीधे जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक और कानूनी रूप से आसान नहीं है। जलवायु परिवर्तन आपदाओं की तीव्रता और संभावना बढ़ा सकता है, लेकिन स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां, नदी प्रबंधन, अनियोजित निर्माण और भूमि उपयोग भी नुकसान को बढ़ाते हैं। इसलिए मुआवजे का आधार भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक अध्ययन और पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया होनी चाहिए।
भारत की भूमिका और साझा प्रयास
भारत के लिए यह विषय विशेष रूप से संवेदनशील है। नेपाल हमारा पड़ोसी और घनिष्ठ साझेदार है। भारत स्वयं जलवायु समानता, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी की बात करता रहा है। इसलिए नेपाल की आपदा को केवल ‘मुआवजे की मांग’ के रूप में देखने के बजाय भारत को राहत, पुनर्वास, आपदा पूर्व चेतावनी, नदी प्रबंधन और हिमालयी पर्यावरण संरक्षण में अपनी भूमिका और मजबूत करनी चाहिए।
साझा जिम्मेदारी और लॉस एंड डैमेज
साथ ही, नेपाल को भी यह समझना होगा कि जलवायु न्याय की लड़ाई किसी एक-दो देशों के खिलाफ अभियान नहीं बननी चाहिए। विकसित और विकासशील—सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है कि ‘लॉस एंड डैमेज’ जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाया जाए और आपदा से प्रभावित कमजोर देशों तक सहायता वास्तव में पहुंचे।
सहयोग और न्यायपूर्ण जलवायु वित्त ही समाधान
हिमालय की सुरक्षा दक्षिण एशिया की सुरक्षा है। नेपाल की बाढ़ को केवल नेपाल की त्रासदी मानना भूल होगी। यह भारत, चीन और पूरे दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी है। जरूरत आरोपों की राजनीति की नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और न्यायपूर्ण जलवायु वित्त की है। नेपाल की आवाज को सुना जाना चाहिए, लेकिन उसका समाधान टकराव में नहीं, सहयोग और जलवायु न्याय की विश्वसनीय व्यवस्था में तलाशना होगा।

