लेखक: डॉ. प्रभात कुमार ‘प्रभाकर’
बिहार के बेगूसराय जिले के तेघड़ा, बरौनी और गढ़हरा का नाम लेते ही बहुतों के मन में एक साथ कई दृश्य उभर आते हैं—ऊँचे-ऊँचे मंडप, रात भर जगमगाती रोशनियाँ, श्रीकृष्ण की सजी हुई प्रतिमाएँ, झांकियाँ, भजन-कीर्तन, मीना बाजार, झूले, दुकानों की कतारें और दूर-दूर से उमड़ती भीड़। लेकिन इस पूरे दृश्य के पीछे केवल एक धार्मिक आयोजन का इतिहास नहीं है। इसके पीछे लगभग एक शताब्दी की सामाजिक स्मृति है, जिसमें महामारी का भय है, आस्था है, सामुदायिक प्रयास है, रेलवे की बस्तियों का विस्तार है, बदलते समय के साथ मेले का बदलता स्वरूप है और सबसे बढ़कर एक ऐसी लोकपरंपरा है, जिसे पीढ़ियों ने अपने ढंग से सँभाला है।
तेघड़ा, बरौनी और गढ़हरा: महामारी से जन्मी आस्था
तेघड़ा के श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का इतिहास वर्ष 1928 से जुड़ता है। उपलब्ध स्थानीय इतिहास और समाचार अभिलेखों में यह उल्लेख मिलता है कि 1927 में तेघड़ा क्षेत्र प्लेग की महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ था। उस समय महामारी के भय ने सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था। लोगों के बाजार और घर छोड़कर दूसरी जगह जाने की बातें भी पुराने विवरणों में मिलती हैं। बीमारी से बचने के लिए अनेक धार्मिक और पारंपरिक उपाय किए गए, लेकिन भय का वातावरण बना रहा। इसी कठिन समय से जन्माष्टमी के इस आयोजन की शुरुआत की कथा जुड़ी हुई है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, 28 फरवरी 1927 को भारत भ्रमण पर निकली चैतन्य महाप्रभु की कीर्तन मंडली तेघड़ा पहुँची। मंडली ने क्षेत्र की स्थिति देखी और श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाने की सलाह दी। इस प्रसंग का उल्लेख अनेक स्थानीय वृत्तांतों में मिलता है, हालांकि इसे इतिहास के निर्विवाद दस्तावेज की बजाय स्थानीय परंपरा के रूप में समझना अधिक सावधानीपूर्ण होगा।
पहले मंडप से शताब्दी तक का सफर
इस परंपरा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 1928 है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, इसी वर्ष स्टेशन रोड क्षेत्र में पहली बार श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन किया गया। इस आरंभिक आयोजन से स्वर्गीय बंसी अथवा वंशी पोद्दार, विश्वेश्वर लाल और लखन साह के नाम जुड़े हुए हैं। एक पुराने विवरण में स्टेशन रोड स्थित शिव मंदिर के समीप आयोजन का उल्लेख है, जबकि नवीन रिपोर्टों में स्टेशन रोड के एक मंडप से शुरुआत बताई गई है। इसलिए इतना कहना अधिक उपयुक्त है कि 1928 में तेघड़ा के स्टेशन रोड क्षेत्र में एक मंडप से इस जन्मोत्सव की सार्वजनिक परंपरा का आरंभ हुआ। यहाँ इतिहास के साथ लोकविश्वास भी जुड़ गया। स्थानीय मान्यता रही कि जन्मोत्सव शुरू होने के बाद प्लेग का प्रकोप धीरे-धीरे कम हुआ और लोगों की आस्था श्रीकृष्ण जन्मोत्सव से गहरी होती चली गई।
1928 का वह पहला मंडप आज के विशाल मेले से तुलना करें तो बहुत छोटा रहा होगा। लेकिन इतिहास की दृष्टि से उसका महत्व उसके आकार में नहीं, उसकी शुरुआत में था। बाद के वर्षों में आयोजन का विस्तार हुआ। उपलब्ध विवरण बताते हैं कि 1929 में मेन रोड स्थित मुख्य मंडप में स्वर्गीय सूर्य नारायण पोद्दार ‘हाकिम’, नूनू पोद्दार, हरिलाल आदि लोगों के नेतृत्व में जन्मोत्सव मनाया गया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्रों में नए मंडप जुड़ते गए। पूर्वी क्षेत्र में भी आयोजन शुरू हुआ और आगे चलकर तेघड़ा के विभिन्न हिस्सों में जन्मोत्सव की समितियाँ सक्रिय होती गईं। तेघड़ा के जन्मोत्सव का इतिहास इसलिए भी रोचक है कि यह किसी एक वर्ष में विशाल मेले में परिवर्तित नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे बढ़ा। एक मंडप से कई मंडप हुए, पूजा की परिधि बढ़ी और उसके साथ मेला भी फैलता गया।
विस्तार और मंडप निर्माण की अनूठी परंपरा
पुराने समाचार विवरणों में 1980 और 1990 के दशक में नए क्षेत्रों में मंडपों के जुड़ने का उल्लेख मिलता है। बाद के वर्षों में प्रखंड कार्यालय परिसर और दूसरे हिस्सों में भी आयोजन होने लगा। वर्ष 2000 के बाद मेले का विस्तार स्टेशन रोड से आगे नए प्रखंड कार्यालय की दिशा में हुआ। आज उपलब्ध रिपोर्टों में तेघड़ा का मेला लगभग आठ किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ बताया जाता है और लगभग 15 मंडपों का उल्लेख मिलता है। 2023 और 2024 की रिपोर्टों में भी लगभग आठ किलोमीटर के क्षेत्र में 14 से 15 मंडपों की जानकारी दी गई थी। 2026 में यह आयोजन अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है और प्रशासन तथा पूजा समितियाँ इसे विशेष रूप से आयोजित करने की तैयारी कर रही हैं।
इस विस्तार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तेघड़ा का जन्मोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा। इसके साथ मंडप निर्माण की एक विशिष्ट परंपरा विकसित हुई। विभिन्न मंडपों को अलग-अलग रूप देने की कोशिश की जाती है। कई बार देश के प्रसिद्ध भवनों, महलों, मंदिरों या स्थापत्य रूपों की प्रतिकृतियाँ बनाई जाती हैं। इसके लिए स्थानीय ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों से आने वाले कारीगर भी काम करते हैं। जन्माष्टमी आने से कई सप्ताह पहले मंडप निर्माण की गतिविधियाँ शुरू हो जाती हैं और मेले के दिनों में वही मंडप लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। तेघड़ा के इतिहास को समझने के लिए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ मेला और पूजा एक ही चीज नहीं हैं। पूजा उसका धार्मिक केंद्र है, जबकि मेला उसके आसपास विकसित हुआ सामाजिक-सांस्कृतिक संसार है।
बरौनी: रेलवे बस्तियों में पनपी सामूहिक परंपरा
तेघड़ा की इस परंपरा का विस्तार धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों से जुड़ता गया। यही वह बिंदु है जहाँ बरौनी और गढ़हरा की जन्माष्टमी की कथा सामने आती है। आज इन तीनों स्थानों के मेलों को लोग एक बड़े संयुक्त जन्माष्टमी क्षेत्र के रूप में देखते हैं, लेकिन इनके इतिहास को एक ही घटना से शुरू हुआ मान लेना सही नहीं होगा। तेघड़ा की सार्वजनिक जन्मोत्सव परंपरा 1928 से जुड़ी है, जबकि बरौनी के रेलवे क्षेत्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की एक अलग परंपरा बाद के दशकों में विकसित हुई। बरौनी की कहानी अपने आप में खास है। रेलवे के विस्तार के साथ बरौनी एक महत्वपूर्ण रेल क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ और यहाँ विभिन्न समुदायों तथा अलग-अलग प्रदेशों से आए रेलकर्मियों की बस्तियाँ बनीं।
इसी वातावरण में रेलवे सुरक्षा बल से जुड़ा एक ऐसा जन्माष्टमी आयोजन सामने आया, जिसने बाद में अपनी अलग पहचान बनाई। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, बरौनी आरपीएफ पोस्ट पर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की परंपरा की शुरुआत 1970 के आसपास या उससे कुछ पहले की अवधि से जोड़ी जाती है। उस समय बरौनी आरपीएफ पोस्ट के प्रभारी सब-इंस्पेक्टर सगीर उद्दीन चिश्ती थे। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने सौहार्दपूर्ण वातावरण में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने की पहल की। यह प्रसंग इस पूरे इतिहास में विशेष महत्व रखता है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव किसी एक धार्मिक समुदाय की भागीदारी तक सीमित न रहकर रेलवे जैसे बहुभाषी और बहुक्षेत्रीय कार्यस्थल में सामूहिक आयोजन का रूप लेता गया।
बरौनी से फैली आरपीएफ की परंपरा
बरौनी की आरपीएफ परंपरा से जुड़े विवरणों के अनुसार, यहाँ के आयोजन को देखकर समस्तीपुर, सोनपुर, छपरा, बनारस, गोरखपुर और लखनऊ सहित अन्य रेलवे सुरक्षा बल पोस्टों में भी जन्माष्टमी उत्सव आयोजित किए जाने लगे। इन दावों का आधार स्थानीय और समाचार रिपोर्टें हैं; इसलिए इन्हें आरपीएफ की आधिकारिक अखिल भारतीय संस्थागत परंपरा का निर्णायक इतिहास मानने के बजाय बरौनी से जुड़ी स्थानीय स्मृति और प्रकाशित विवरण के रूप में देखना उचित है। बरौनी के रेलवे क्षेत्र का जन्माष्टमी उत्सव छह दिनों तक चलने वाले आयोजन के रूप में प्रसिद्ध हुआ। समय के साथ इसमें पूजा के साथ मेला, झांकियाँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मनोरंजन के अनेक साधन जुड़ते गए।
पुराने आयोजन को याद करने वाले लोगों के अनुसार एक समय यहाँ कव्वाली, जागरण, आर्केस्ट्रा, गीत-नाटक जैसे कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र थे। 1991 से 1994 के बीच आयोजन की विशेष लोकप्रियता का उल्लेख भी स्थानीय समाचार सामग्री में मिलता है। बाद के वर्षों में भी अलग-अलग अधिकारियों के कार्यकाल में यह उत्सव जारी रहा। बरौनी के जन्माष्टमी मेले का एक और पहलू रेलवे की जमीन से जुड़ा है। समय के साथ रेलवे प्रशासन और स्थानीय आयोजकों के बीच मेले के आयोजन की व्यवस्था बदली। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, आरटीआई से मांगी गई जानकारी के बाद रेलवे विभाग की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि रेल इकाई पूजा कर सकती है, लेकिन मेला आयोजन की प्रक्रिया अलग होगी और रेलवे की जमीन के उपयोग के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनानी होगी। इसके बाद मेला आयोजन में टेंडर व्यवस्था का प्रवेश हुआ।
गढ़हरा: रेलवे कॉलोनी और ग्रामीण ठाकुरबाड़ी का संगम
अब गढ़हरा की ओर चलें। गढ़हरा और बरौनी का संबंध ऐतिहासिक रूप से रेलवे क्षेत्र से गहरा रहा है। यहाँ जन्माष्टमी का स्वरूप भी समय के साथ बदलता रहा। रेलवे कॉलोनी और आरपीएफ क्षेत्र में जन्मोत्सव के आयोजन का उल्लेख मिलता है, वहीं गढ़हरा के ग्रामीण क्षेत्रों में ठाकुरबाड़ी और अन्य स्थानीय धार्मिक स्थलों के आसपास भी जन्माष्टमी समारोह विकसित हुए हैं। इसलिए गढ़हरा की जन्माष्टमी को केवल रेलवे के मेले से जोड़ना अधूरा होगा। आज यहाँ रेलवे क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र—दोनों की अपनी-अपनी आयोजन परंपराएँ दिखाई देती हैं। गढ़हरा रेलवे क्षेत्र के मेले की अपनी अलग स्मृतियाँ हैं। स्थानीय समाचार रिपोर्टों में पुराने समय के कव्वाली, जागरण, आर्केस्ट्रा और गीत-नाटक कार्यक्रमों का उल्लेख मिलता है।
गढ़हरा के ग्रामीण क्षेत्र में ठाकुरबाड़ी से जुड़ा जन्माष्टमी मेला अपेक्षाकृत अलग सामाजिक आधार पर विकसित हुआ। 2024 की रिपोर्ट में गढ़हरा मठ टोला की ठाकुरबाड़ी में छह दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव और मेले का उल्लेख है। पूजा, भजन, जागरण, मीना बाजार और झूले इसके प्रमुख आकर्षण रहे। गढ़हरा, बारो, सलेमपुर, आशिकपुर, अमरपुर, निपनिया और सिमरिया जैसे आसपास के क्षेत्रों से लोगों के पहुँचने का भी उल्लेख किया गया है। 2025 में गढ़हरा में दो अलग स्थानों पर जन्माष्टमी आयोजन की जानकारी प्रकाशित हुई—वार्ड 17 स्थित ठाकुरबाड़ी परिसर और रेलवे कॉलोनी के पुराने परित्यक्त आरपीएफ बैरक परिसर में। इससे यह स्पष्ट होता है कि गढ़हरा में जन्माष्टमी की परंपरा एक ही आयोजन तक सीमित नहीं है।
सांस्कृतिक संगम: तीन स्थान, एक पहचान
तेघड़ा, बरौनी और गढ़हरा को एक साथ देखने पर जन्माष्टमी के इस पूरे क्षेत्र का विकास एक रोचक सामाजिक भूगोल सामने रखता है। तेघड़ा में इसकी जड़ें 1928 के उस सार्वजनिक जन्मोत्सव में हैं, जिसकी स्मृति आज शताब्दी के करीब पहुँच चुकी है। बरौनी में रेलवे क्षेत्र के माध्यम से बाद के दशकों में एक अलग जन्मोत्सव परंपरा उभरी। गढ़हरा में रेलवे कॉलोनी और ग्रामीण ठाकुरबाड़ी—दोनों ने अपने-अपने ढंग से इस उत्सव को अपनाया। समय के साथ ये आयोजन भौगोलिक रूप से भी एक-दूसरे के निकट दिखाई देने लगे और लोगों की दृष्टि में इनका एक साझा जन्माष्टमी परिक्षेत्र बन गया। यही कारण है कि आज लोग कई बार “तेघड़ा-बरौनी-गढ़हरा जन्माष्टमी मेला” को एक साथ बोलते हैं।
यह कोई एक समिति या एक ही वर्ष में बना हुआ एकल मेला नहीं है, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर विकसित हुई कई परंपराओं का ऐसा सांस्कृतिक संगम है, जिसे समय ने एक-दूसरे से जोड़ दिया है। 2023 की एक रिपोर्ट में गढ़हरा से तेघड़ा तक लगभग दस किलोमीटर के क्षेत्र में श्रद्धालुओं की आवाजाही और इन तीनों स्थानों के संयुक्त आकर्षण का उल्लेख किया गया था। इस संयुक्त पहचान को लेकर एक लोकप्रिय दावा यह भी है कि तेघड़ा-बरौनी-गढ़हरा का जन्माष्टमी मेला मथुरा-वृंदावन के बाद देश में दूसरे स्थान पर आता है। कुछ स्थानीय और समाचार रिपोर्टों में इसे इसी तरह प्रस्तुत किया गया है। 1993 और 1994 में बीबीसी लंदन के हिंदी समाचार में इस क्षेत्र के मेले को दूसरे स्थान पर बताए जाने का दावा भी स्थानीय लोगों की स्मृतियों में मिलता है।
शताब्दी वर्ष: प्रशासनिक तैयारी और सामुदायिक विरासत
तेघड़ा की जन्माष्टमी का सबसे बड़ा ऐतिहासिक तथ्य यही है कि एक छोटे से मंडप से शुरू हुई परंपरा आज शताब्दी की दहलीज पर पहुँच चुकी है। 2026 में प्रशासनिक स्तर पर भी इसके शताब्दी वर्ष को लेकर बैठकें और तैयारियाँ हुई हैं। सुरक्षा, यातायात, साफ-सफाई, पेयजल, चिकित्सा और बिजली जैसी व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई है। इससे पता चलता है कि यह आयोजन अब केवल धार्मिक समितियों का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि स्थानीय प्रशासन के लिए भी एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक आयोजन बन चुका है। इतिहास की एक और खूबसूरत बात यह है कि बड़े आयोजन किसी एक पीढ़ी के प्रयास से जीवित नहीं रहते। तेघड़ा में जिन लोगों ने 1928 में पहला मंडप बनाया, वे आज हमारे बीच नहीं हैं। जिन लोगों ने 1929 और उसके बाद के वर्षों में आयोजन को आगे बढ़ाया, उनकी जगह अगली पीढ़ियाँ आईं।
फिर भी इन मेलों की सबसे बड़ी शक्ति आज भी उनकी सामुदायिकता है। मेले में कोई केवल पूजा करने नहीं आता। वह रिश्तेदारों से मिलता है, पुराने परिचितों से मिलता है, बच्चों को झूले पर बैठाता है, मिठाई खिलाता है, मंडप देखता है और कई बार वर्षों पुरानी स्मृतियों में लौट जाता है। बाहर रहने वाले लोग अपने घर आते हैं। जिन गलियों में सामान्य दिनों में जीवन धीमा दिखाई देता है, वे जन्माष्टमी के दिनों में अचानक जीवंत हो उठती हैं। यही कारण है कि तेघड़ा, बरौनी और गढ़हरा की जन्माष्टमी को केवल धार्मिक उत्सव कहना उसके इतिहास को छोटा कर देना होगा। यह इस क्षेत्र की सामाजिक स्मृति का भी उत्सव है। Janmashtami celebrations across India share similar community spirit.
इसमें 1927 की महामारी की स्मृति है, 1928 के पहले मंडप की स्मृति है, वंशी पोद्दार, विश्वेश्वर लाल और लखन साह जैसे आरंभिक आयोजकों की स्मृति है, बाद की पीढ़ियों की मेहनत है, रेलवे क्षेत्र की अपनी कहानी है और गढ़हरा की ठाकुरबाड़ी तथा ग्रामीण क्षेत्रों की अपनी परंपरा है। आज जब तेघड़ा अपना शताब्दी वर्ष देख रहा है, तब पीछे मुड़कर देखने का यह उपयुक्त समय है कि हम केवल मेले की भव्यता न देखें, उसकी यात्रा भी समझें। एक मंडप से शुरू हुई कहानी पंद्रह मंडपों तक पहुँची। एक स्थानीय आयोजन आसपास के क्षेत्रों की अनेक जन्माष्टमी परंपराओं से जुड़ गया। बरौनी के रेलवे क्षेत्र ने इसे अपना अलग रूप दिया। गढ़हरा ने रेलवे और ग्रामीण दोनों संसारों में इसकी अपनी पहचान बनाई।

