लेखक: देवानंद सिंह
शुद्धीकरण पर राजनीति नहीं, संविधान की कसौटी
हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सभा स्थल के कथित ‘शुद्धीकरण’ को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। राहुल गांधी ने इसे दलितों के अपमान और संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए प्रधानमंत्री से प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग की है। दूसरी ओर, इस पूरे मामले की वास्तविकता और इसमें शामिल लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होना भी उतना ही आवश्यक है। क्योंकि लोकतंत्र में किसी भी गंभीर आरोप का फैसला राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि कानून और जांच के आधार पर होना चाहिए।
यदि वास्तव में किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर किसी सार्वजनिक स्थल का ‘शुद्धीकरण’ किया गया है, तो यह महज राजनीतिक विरोध का मामला नहीं रह जाता। यह सामाजिक समानता और नागरिक गरिमा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है। संविधान ने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया है। इसलिए सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। भारत का संविधान
यहां सत्ता पक्ष की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। भाजपा को केवल यह कहकर मामले से किनारा नहीं करना चाहिए कि आरोप राजनीतिक हैं। यदि उसके किसी नेता, कार्यकर्ता या समर्थक की भूमिका सामने आती है, तो संगठन को भी स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। वहीं सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून सभी के लिए समान है। न कार्रवाई राजनीतिक दबाव में हो और न ही किसी राजनीतिक दल को खुश करने के लिए।
लेकिन विपक्ष की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राहुल गांधी और कांग्रेस को इस मुद्दे को दलित सम्मान और संविधान की रक्षा के सवाल के रूप में उठाने का पूरा अधिकार है। मगर विपक्ष को भी आरोपों को तथ्य और प्रमाण के साथ सामने रखना चाहिए। हर सामाजिक घटना को सीधे भाजपा-आरएसएस की विचारधारा से जोड़ देना राजनीतिक बहस को तीखा तो कर सकता है, लेकिन इससे वास्तविक दोषियों तक पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। विपक्ष का काम सरकार से जवाब मांगना है, साथ ही जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए रचनात्मक दबाव बनाना भी है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश के आरोप भी इसी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा हैं। लेकिन ऐसे संवेदनशील मामलों में बयानबाजी की सीमा वहीं खत्म होनी चाहिए जहां से कानून की प्रक्रिया शुरू होती है। किसी संगठन या विचारधारा पर सामूहिक आरोप लगाने के बजाय यह स्पष्ट होना चाहिए कि घटना में वास्तव में कौन लोग शामिल थे, उनकी मंशा क्या थी और क्या कानून का उल्लंघन हुआ।
जातिगत भेदभाव का सवाल किसी एक पार्टी का मुद्दा नहीं है। यह भारतीय समाज की पुरानी और गंभीर समस्या है। दलितों के साथ स्कूल, सार्वजनिक स्थान, पानी, विवाह या सामाजिक व्यवहार में भेदभाव की शिकायतें यदि कहीं सामने आती हैं, तो उनका समाधान राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता, सामाजिक जागरूकता और कठोर कानूनी कार्रवाई से होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों इस घटना को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय संविधान को अपनी कसौटी बनाएं। सत्ता पक्ष यह साबित करे कि कानून के सामने कोई छोटा-बड़ा नहीं है और विपक्ष यह साबित करे कि वह सामाजिक न्याय की लड़ाई को तथ्यों और संवैधानिक मर्यादा के साथ आगे बढ़ा सकता है।
‘शुद्धीकरण’ जैसी कथित घटना यदि सच है तो उसका विरोध होना ही चाहिए, लेकिन उससे भी बड़ा संदेश यह होना चाहिए कि भारत में किसी नागरिक की गरिमा उसकी जाति से नहीं, उसके संवैधानिक अधिकारों से तय होती है। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

